भाषा-साहित्य

क्या खोजता है? – मोहन झा

कविता

मोहन झा

श्रृंगनगपतिजयी मानव!
चन्द्र मंगल पग धरे, क्या खोजता है?
मर्त्यजीवन अर्थ खोजो,
व्यर्थ विचरण व्योम में, क्या खोजता है?

लथपथ मनुजता व्यूह में निःशस्त्र एकल;
छिन्न कर दे व्यूह को जो हैं कहाँ अब पार्थ केशव,खोजता है?

बीज शोणित नग्न ताण्डव कर रहा अब;
असुर शोणित सोख ले जो
है कहाँ खप्पर शिवा,कुछ खोजता है?

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कर रहा कर क्रूर कलुषित स्वसा शुचि सम्मान को;
कृपाण काली की कहाँ जो कर सके कर क्रूर खण्डित, खोजता है?

शिशु करुण क्रन्दन धरा दिक् व्योम गुञ्जित;
विधा वर्षण सुधा की मनुजता हो पुष्ट मानव तुष्ट जिससे, खोजता है?

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श्रृंगनगपतिजयी मानव!
चन्द्र मंगल पग धरे क्या खोजता है?

मोहन झा, कोलकाता.

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