धर्म-कर्म

Mahashivratri Special: भगवान शिव को भांग गांजा धतूरा आदि नशीला पदार्थ चढ़ाना है पाप

भगवान शिव का नाम लेकर गांजा , भांग , चरस आदि फूंकने वाले ध्यान दें

Mahashivratri Special: भगवान शिव को भांग,गांजा आदि नशीले पदार्थ चढ़ाने व खाने की बात कर सनातन धर्म एवं महादेव का उपहास करने वाले हो जायें सावधान। शिवभक्त धूम्रपान का सेवन करते हैं । कोई भांग पीता है तो कोई निषेध नशों का भी सेवन करता है। इसके पीछे तर्क दिया जाता है कि यह तो शिव की बूटी है। ‘शिव की बूटी’ नाम पर बहुत से लोग तरह-तरह के नशे का सेवन करते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या भगवान शिव खुद धूम्रपान करते थे। क्या वे चरस-गांजे का सेवन करते थे। क्योंकि उनकी बहुत-सी ऐसी तस्वीरें भी हैं जिनमें वे धूम्रपान करते नजर आते हैं। भांग के सेवन को लेकर तो तमाम कथाएं और भजन आदि खूब प्रचलित हैं। भांग और धतूरे को तो भगवान शिव पर अर्पण भी किया जाता है। जब भी इस बात को लेकर सवाल उठते हैं तो तमाम लोग धर्म का मामला कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। यहां क्लिक कर व्हाट्सएप चैनल से जुड़े

जब भी धर्म या आध्यात्म की बातें होती हैं तो कई सारे सवालों की बौछार पहले होने लगती है। मसलन, भगवान नीले या हरे रंग क्यों हैं, भगवान कृष्ण की 16 हजार 108 पत्नियां क्यों हैं, भगवान राम ने बाली को पेड़ के पीछे से क्यों मारा, भगवान राम ने सीता को निर्वासित क्यों किया, भगवान कृष्ण को ईश्वर क्यों मानते हैं…आदि…आदि एक नहीं सैकड़ों-हजारों सवाल उछलने लगते हैं। अगर कोई इन सवालों के जवाब देने का प्रयास करता भी है तो तमाम तरह के तर्क उठने लगते हैं। क्योंकि सवाल इतने और अलग-अलग विषयों के उठते हैं कि कोई धर्मग्रंथों और आध्यात्म का ज्ञाता ही इनके जवाब दे सकता है।

जिनके माध्यम से लोगों की ज्यादातर जिज्ञासाओं को शांत किया जाता है.।और इन सवालों के जवाब हमारे पौराणिक ग्रंथों के आधार पर आज भगवान शिव को भांग गांजा धतूरा आदि नशीला पदार्थ चढ़ाने को ले कर सरे जबाव  देने का प्रयास किया है आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक” ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र एवं वैदिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ । लोकल, देश और दुनिया की ख़बर, देखने के लिए यूटूब – Gaam Ghar News को सब्सक्राइब कीजिए.

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भूतभावन भगवान् भोलेनाथ नशे की किसी भी पदार्थ का सेवन करते हों, ऐसा हमको आजतक किसी भी शास्त्र में नहीं दिखा । विजया शब्द का अर्थ भांग भी होने से भंगेड़ी लोग वेद में आये विजया शब्द का अर्थ भांग करते हैं, जबकि भगवान् शिव के धनुष का नाम विजया है और सभी आचार्यों ने अपने भाष्य में धनुष ही अर्थ किये हैं ।

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मूलमंत्र में भी विजया के बाद धनुष का उल्लेख होता है
“विज्यं धनु: कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ२ उत।”
शिवपुराण , लिंगपुराण , स्कंदपुराण , पद्मपुराण आदि में भगवान शंकर के चरित्र आये हैं किन्तु उसमें भांग , गांजा , धतूरा आदि नशीली वस्तु खाने या पीने का वर्णन कहीं भी नहीं है । यहां तक कि भगवान् आद्य शंकराचार्य रचित शिवमानस-पूजा-स्तोत्र में भगवान् शिव को चढ़ने वाले सभी पदार्थों का कल्पना किया गया है परन्तु उसमें गांजा, भांग आदि का नाम कहीं भी नहीं आया है।
देवाधिदेव महादेव तो जगत के रक्षार्थ हलाहल विष का पान किया था न कि नशीला पदार्थ।

इसीलिये अपने दुर्व्यसन को भगवान् शिव पर आरोपित करने का पाप न करें, क्योंकि आपका सर्वनाश करने के लिये तो आपका दुर्व्यसन ही पर्याप्त है तो व्यर्थ में प्रलयंकर भगवान् हर का अपराधी क्यों बनना।

जबकि हमारे धर्मशास्त्रों में तो कहा गया है

“विजया कल्पमेकं च दश कल्पं च नागिनी।
मदिरा कल्पसहस्राणि धूमसंख्या न विद्यते ।।”
अर्थात् – भांग खाने वाला एक कल्प ,संखिया खाने वाला दश कल्प , शराब पीने वाला हजारों कल्प तथा धूम्रपान करने वाला पता नहीं कितने कल्पों तक नरक गामी होता है इसकी संख्या नहीं है ।

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मैं निवेदन करना चाहता हूं कथा करने वाले व्यास,कर्मकाण्ड करने वाले ब्राह्मण,तथा मठ मंदिर के पुजारी,संत महात्माओं से कि इस विषय में प्रकाश डालते हुए इस बात को आम जनमानस को समझायें कि यह विसंगति भारत वर्ष जब गुलाम हुआ तब आई।
यह केवल और केवल सनातन धर्म का उपहास और देवों के देव महादेव को हास्य का पात्र बनाने के लिए हम पर थोपा गया।
अतः आप समस्त भक्तों से करबद्ध निवेदन है कि अपने सनातन धर्म का उपहास न करें एवं देवाधिदेव भगवान शिव जी को हास्य का पात्र न बनायें ।

Gaam Ghar News Desk

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