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भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के

जुनून की कोई कीमत नहीं होती: दादा साहेब फाल्के के जीवन से सीख

PATNA: भारतीय सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के का जन्म ‘’धुंडीराज गोविंद फाल्के’’ के रूप में 30 अप्रैल, 1870 को महाराष्ट्र के त्र्यंबक में हुआ था।  और उन्होंने भारतीय सिनेमा को अपनी पहली चलचित्र, राजा हरिश्चंद्र दिया । 19 साल के करियर में उन्होंने 95 फीचर फिल्मों और 27 शॉर्ट फिल्मों में काम किया । उनकी आखिरी फिल्म, गंगावतरण (1937) दादासाहेब द्वारा बनाई गई एकमात्र फिल्म थी जिसमें साउंड और डायलॉग्स थे । 16 फरवरी, 1944 को उनका निधन हो गया ।

Dadasaheb Phalke Award and Phalke on a 1971 stamp of India

उनके निधन के बाद, भारत सरकार ने 1969 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार नाम से उनके नाम पर एक पुरस्कार शुरू किया। देविका रानी को पहली बार इस अवॉर्ड से नवाजा गया था। भारतीय डाक ने 13 अप्रैल 1971 को उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।

Oil Painting के एक प्रतिभाशाली कलाकार होने के बावजूद, गोधरा में एक छोटे शहर के फोटोग्राफर के रूप में अपना करियर शुरू किया, क्योंकि उन्होंने खुद को प्रसिद्ध जे जे स्कूल ऑफ आर्ट से प्रशिक्षित किया था। उन्हें फोटोग्राफी, प्रोसेसिंग और प्रिंटिंग में भी महारत हासिल थी। उन्होंने अपने कौशल का इस्तेमाल किया, और नाटक कंपनियों के लिए मंच के पर्दे को पेंट करने का व्यवसाय शुरू किया। इससे उन्हें नाटक निर्माण में कुछ बुनियादी प्रशिक्षण मिला और उन्हें नाटकों में कुछ छोटी भूमिकाएँ मिलीं। दादा साहेब फाल्के ने बड़ौदा के दौरे पर आए एक जर्मन जादूगर से कुछ जादुई तरकीबें भी सीखीं। इससे उन्हें अपने फिल्म निर्माण में फोटोग्राफी में ट्रिक का उपयोग करने में मदद मिली। दादासाहेब दादर, बॉम्बे चले गए क्योंकि 1908 में उनका व्यवसाय बढ़ गया, प्रेस का नाम बदलकर ‘लक्ष्मी आर्ट प्रिंटिंग वर्क्स’ कर दिया गया। दादासाहेब 1909 में लक्ष्मी प्रिंटिंग का काम छोड़कर आवश्यक रंग मुद्रण मशीनरी खरीदने के लिए जर्मनी गए। वह लगभग 40 साल के थे और अपने लिए करियर और कमाई के स्रोत के रूप में एक जगह खोजने के लिए संघर्ष कर रहे थे। सिनेमा को लेकर उनकी दीवानगी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने फिल्म बनाने के लिए अपनी पत्नी की गहने तक दांव पर लगा दिए थे। इसके अलावा वह अपनी फिल्म की नायिका की तलाश में रेड लाइट एयिया तक भी पहुंच गए थे। लाख मुसीबतों के बावजूद वह फिल्म बनाकर ही माने।

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फिल्म देखने के बाद मिली फिल्म बनाने की प्रेरणा: 14 अप्रैल 1911 को दादासाहेब ने ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ फिल्म देखी, गिरगांव, बॉम्बे में। फर्डिनेंड जेक्का की मूक फिल्म, द लाइफ ऑफ क्राइस्ट देखने के बाद दादासाहेब का जीवन बदल गया और फिर दादासाहेब ने अपनी पहली फिल्म बनाने का मन बनाया। लेकिन यह इतना आसान नहीं रहा, उन्हें सबसे ज्यादा परेशानी आई फिल्म की एक्ट्रेस तलाशने में। जी हां, उस समय महिलाओं के लिए कैमरा के सामने काम करना अपमान की बात समझी जाती थी, इसलिए उन्हें अपनी फिल्म में काम करने के लिए कोई महिला कलाकार नहीं मिली, उन्होंने उस समय तवायफों से भी काम के लिए पूछा लेकिन वे भी तैयार नहीं हुईं ऐसे में, उन्होंने एक रसोइये को फिल्म में लीड एक्ट्रेस का रोल दिया।

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दादासाहेब के साथ पत्नी और बेटे ने भी किया फिल्म में काम: दादासाहेब ने अपनी फिल्म में निर्देशन, डिस्ट्रिब्यूशन, और सेट-बिल्डिंग को कंट्रोल किया. और उन्होंने अपनी पहली फिल्म में हरिश्चंद्र की भूमिका भी निभाई । उनकी पत्नी ने कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का काम संभाला और उनके बेटे ने फिल्म में हरिश्चंद्र के बेटे की भूमिका निभाई । इस पूरी फीचर फिल्म को बनाने के लिए दादासाहेब ने 15 हजार रुपये खर्च किए ।

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दादासाहेब फाल्के के सबसे उल्लेखनीय काम: मोहिनी भस्मासुर (1913), सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917) श्रीकृष्ण जन्म (1918), कालिया मर्दन (1919), इन सभी फिल्मों ने उस समय की भारी सफलता देखी। जबकि यह सब सफलता इतनी आसानी से नहीं मिली, उन्हें हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा, कभी पैसे के लिए, कभी व्यापार भागीदारों के साथ, कई बार उन्हें अपने अधिकांश मुनाफे से हाथ धोना पड़ा, कई बार उन्हें एक कर्मचारी के रूप में काम करना पड़ा 1000/- रुपये वेतन पर, जिसे बाद में घटाकर 250/- रुपये प्रति माह कर दिया गया था।

अपने जुनून के लिए उनका सारा संघर्ष, बॉलीवुड नामक एक पंथ के रूप में सामने आया है और इसने एक उद्योग का रूप ले लिया है, जो लाखों परिवारों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार देता है।

हैप्पी बर्थडे दादा साहेब फाल्के। हम आपके बहुत एहसानमंद हैं।

 

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