मिडिल ईस्ट तनाव में भारत चीन तेल भंडार तुलना
होर्मुज स्ट्रेट संकट से सप्लाई बाधित होने की आशंका, चीन के पास छह माह का बफर, भारत के पास सीमित रणनीतिक भंडार।
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच टकराव के बाद होर्मुज स्ट्रेट पर खतरे की आशंका ने एशियाई देशों, खासकर भारत और चीन की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
भारत और चीन दोनों ही मिडिल ईस्ट से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करते हैं, लेकिन तेल भंडारण क्षमता और रणनीतिक रिजर्व के मामले में दोनों देशों की स्थिति अलग-अलग है। चीन के पास अनुमानतः कम से कम छह महीने की जरूरत के बराबर क्रूड ऑयल का भंडार मौजूद है। इसके मुकाबले भारत के पास सीमित रणनीतिक तेल भंडार है, जो करीब तीन से चार सप्ताह की खपत के लिए पर्याप्त माना जाता है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है और तेल की खपत भी तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में भारत अपनी कुल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। जनवरी तक भारत प्रतिदिन करीब 2.74 मिलियन बैरल तेल मिडिल ईस्ट से आयात कर रहा था, जो कुल आयात का लगभग 55 प्रतिशत है।
होर्मुज स्ट्रेट का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि भारत का लगभग 40 से 50 प्रतिशत कच्चा तेल इसी मार्ग से होकर आता है। यदि इस समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक रुकावट आती है, तो भारत को आपूर्ति और कीमत दोनों स्तर पर झटका लग सकता है। हालांकि सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारत की लगभग 60 प्रतिशत आपूर्ति वैकल्पिक मार्गों से होती है, जिससे तत्काल संकट की आशंका कम है।
चीन की तुलना में भारत की रणनीतिक भंडारण क्षमता कम है, जिससे वह आपूर्ति झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता है। वहीं जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी मिडिल ईस्ट पर निर्भर हैं, लेकिन उनके पास 200 से अधिक दिनों का रिजर्व उपलब्ध है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट में लंबी अवधि तक व्यवधान रहा, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है। इसका असर यूरोप और अमेरिका पर भी पड़ेगा, भले ही वे सीधे तौर पर मिडिल ईस्ट से कम आयात करते हों।
फिलहाल भारत ने स्थिति पर नजर बनाए रखी है और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैकल्पिक स्रोतों व भंडारण रणनीतियों पर काम जारी है। लेकिन अगर संघर्ष लंबा खिंचता है, तो तेल के खेल में चीन की तुलना में भारत को ज्यादा चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।




