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विनोद आनंद की कृति विषकन्या का प्रेम, मिथक और मुक्ति महाख्यान’

विनोद आनंद का मिथकीय महाख्यान: विष, प्रेम और मुक्ति की अमर गाथा: 'विषकन्या का प्रेम' एवं 'शकुंतला की मातृ-चेतना'

हिंदी साहित्य के विशाल आकाश में समय-समय पर ऐसी कृतियाँ अवतरित होती हैं, जो न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार विनोद आनंद का यह नवीनतम लघु उपन्यास संकलन इसी परंपरा की एक सशक्त कड़ी है। लगभग १००-१०९ पृष्ठों के इस लघु कलेवर में लेखक ने उन अनुत्तरित प्रश्नों को स्वर दिया है, जो सदियों से इतिहास और मिथकों की परतों के नीचे दबे हुए थे। शिवोहम प्रकाशन द्वारा प्रस्तुत यह कृति मात्र कथा नहीं, बल्कि देह से विदेह तक, विष से अमृत तक और सत्ता से संवेदना तक की एक विराट यात्रा है।

प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र, विशेषकर चाणक्य नीति और ‘कथासरित्सागर’ जैसे ग्रंथों में ‘विषकन्या’ का चित्रण सदैव एक ‘जीवंत अस्त्र’ के रूप में हुआ है। वह एक ऐसी अभागिन स्त्री थी जिसे बचपन से अल्प मात्रा में विष देकर तैयार किया जाता था ताकि वह शत्रु राजाओं के विनाश का माध्यम बन सके। वह सौंदर्य और मृत्यु का एक भयावह संगम थी। विनोद आनंद ने इस पारंपरिक और रूढ़िवादी छवि को ध्वस्त करते हुए उस ‘हथियार’ के भीतर धड़कते हुए एक नारी-हृदय की खोज की है।

उपन्यासकार यहाँ यह मौलिक प्रश्न उठाते हैं कि क्या राज्य की सुरक्षा और साम्राज्यवादी लिप्सा के लिए किसी मासूम के अस्तित्व को ‘विषमय’ कर देना नैतिक है? लेखक ने माधवी (विषकन्या) के माध्यम से उस पीड़ा को स्वर दिया है जिसे इतिहास ने सदा मौन रखा।

कथानक का विस्तार ऐतिहासिक और काल्पनिक राज्यों—धारांश और नागऋद्धि—के द्वंद्व पर आधारित है। धारांश के राजा विक्रमकेतु नीति और धर्म के प्रति समर्पित हैं, किंतु उनकी राजनीति ‘करुणा’ से रिक्त है। दूसरी ओर, नागऋद्धि के राजा दण्डवाहन युद्ध की विभीषिका से थके हुए एक योद्धा हैं।

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कथा का प्रथम चरण माधवी के बचपन से शुरू होता है। माता-पिता की मृत्यु के उपरांत अनाथ माधवी को राज्य के वैद्य सुभुक्ति द्वारा विष-प्रशिक्षण दिया जाता है। लेखक ने इस प्रक्रिया के चित्रण में जिस सूक्ष्मता का परिचय दिया है, वह पाठक को झकझोर देती है। माधवी का शरीर तो विष के अनुकूल हो जाता है, परंतु उसकी चेतना निरंतर विद्रोह करती है। जब वह दर्पण में स्वयं को देखती है, तो उसका प्रश्न “क्या मैं मानव हूँ, या मृत्यु का जीवंत रूप?” आधुनिक स्त्री-विमर्श की पराकाष्ठा है, जहाँ स्त्री को पुरुष प्रधान व्यवस्था द्वारा केवल एक ‘उपकरण’ समझा जाता है।

उपन्यास का द्वितीय और सर्वाधिक महत्वपूर्ण चरण माधवी का ‘मणिदीपा’ बनकर दण्डवाहन के दरबार में प्रवेश करना है। यहाँ लेखक ने श्रृंगार और करुणा का अद्भुत सामंजस्य बिठाया है। दण्डवाहन, जो स्वयं युद्धों से ऊब चुका है, माधवी के नृत्य में छिपे दुःख को पहचान लेता है।

संवादों की गहराई इस कृति को विशेष बनाती है। जब दण्डवाहन माधवी से उसके दुःख का कारण पूछता है, तो माधवी का उत्तर—”दुःख वह है, राजन, जो किसी को कहने का अधिकार नहीं”—उसकी विवशता को उजागर करता है। वह ऐतिहासिक क्षण, जब माधवी शत्रु राजा को मारने के बजाय स्वयं विष-पान कर लेती है, उपन्यास का क्लाइमेक्स मात्र नहीं, बल्कि ‘प्रेम की विजय’ का उद्घोष है। माधवी का यह बलिदान सिद्ध करता है कि प्रेम में वह शक्ति है जो जन्मजात विष को भी अमृत में बदल सकती है।
विनोद आनंद ने अपनी लेखनी को केवल भौतिक प्रेम तक सीमित नहीं रखा। माधवी की मृत्यु के पश्चात दण्डवाहन का राजपाट त्याग कर हिमालय की शरण में जाना उपन्यास को आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाता है। स्मृति बनाम मुक्ति के संवाद—”शरीर का त्याग सरल है, पर स्मृति का त्याग कठिन”—प्रेम की उस अवस्था को दर्शाते हैं जहाँ व्यक्ति आसक्ति और विरक्ति के बीच झूलता है।

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भारतीय दर्शन के कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को आधार बनाते हुए लेखक ने अंत में माधवी और दण्डवाहन का ‘मधुरा’ और ‘अर्णव’ के रूप में पुनर्मिलन कराया है। यह चक्रीय कथानक यह संदेश देता है कि सच्चा प्रेम काल की सीमाओं से परे है।

इस संकलन का दूसरा लघु उपन्यास ‘शकुंतला की मातृ-चेतना’ पहले भाग की पूरक रचना के रूप में उभरता है। यहाँ लेखक ने ‘मातृत्व’ को केवल संतान-उत्पत्ति तक सीमित न रखकर उसे एक ‘चेतना’ के रूप में स्थापित किया है। शकुंतला का चरित्र भी सत्ता के क्रूर खेल का शिकार है, किंतु वह अपने मातृत्व की शक्ति से विद्रोह करती है। उसका यह संवाद—”विष मेरे शरीर में है, पर प्रेम मेरी आत्मा में”—पूरी कृति का बीज-वाक्य है। यह रचना स्पष्ट करती है कि स्त्री की ‘सृजन शक्ति’ किसी भी ‘संहार शक्ति’ से बड़ी होती है। लेखक यहाँ पुरुष-केंद्रित सत्ता को चुनौती देते हुए स्त्री को ‘मुक्तिदायिनी’ के रूप में चित्रित करते हैं।

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लेखक ने पात्रों को काले-सफेद खांचों में नहीं बाँटा है, बल्कि उन्हें मानवीय कमजोरियों और खूबियों के साथ प्रस्तुत किया है। माधवी आत्म-संघर्ष, विवशता और अंततः सर्वोच्च बलिदान की प्रतीक है। दण्डवाहन एक ऐसा योद्धा है जो सत्ता की निरर्थकता को समझकर प्रेम और अध्यात्म की ओर मुड़ता है। विक्रमकेतु कठोर राजसत्ता का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि वैद्य सुभुक्ति भावनाशून्य विज्ञान की उस शाखा का प्रतीक है जो केवल लक्ष्य-प्राप्ति में विश्वास रखती है।
विनोद आनंद की भाषा-शैली परिष्कृत, तत्सम प्रधान और बिम्बों से अलंकृत है। उन्होंने प्रकृति का प्रयोग प्रतीकों के रूप में किया है—माधवी वृक्ष प्रेम की अमरता का, हिमालय मोक्ष का और विष मानवीय विकारों का रूपक बन गया है।
यद्यपि कथाओं का परिवेश पौराणिक है, किंतु उनके प्रश्न अत्यंत समकालीन हैं। आज के हाइब्रिड युद्ध और शोषण के युग में भी यह कृति हमें चेताती है कि राजनीति में करुणा का समावेश अनिवार्य है। यह स्त्री-स्वायत्तता और मानवीय संवेदना की सशक्त वकालत है।

विनोद आनंद की यह कृति हिंदी साहित्य में दार्शनिक प्रेम-कथाओं की परंपरा को नया जीवन प्रदान करती है। यह मात्र उपन्यास नहीं, बल्कि मिथक, संवेदना और मुक्ति का एक ऐसा महाख्यान है जो पाठक के मन में लंबे समय तक गूँजता रहता है।
शिवोहम प्रकाशन को इस सुंदर प्रस्तुति के लिए और विनोद आनंद को इस कालजयी सृजन के लिए हार्दिक बधाई।

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