नववर्ष संदेश : समय से एक विनम्र संवाद
नववर्ष कोई तारीख नहीं है,
नववर्ष एक प्रश्न है —
कि हम इस वर्ष किस तरह के मनुष्य होंगे?
यह वर्ष आए साधना बनकर,
अहंकार को मौन सिखाए,
मन-मंदिर में दीप जले
और भीतर करुणा मुस्काए।
यह वर्ष आए समाज बनकर —
भूखे पेट में अन्न भरे,
सूनी आँखों में नींद लाए,
और टूटे मनों को जोड़ जाए।
जहाँ जाति, भाषा, धर्म से पहले
मनुष्य मनुष्य दिखे।
यह वर्ष आए शासन बनकर नहीं,
सेवा बनकर आए।
कुर्सी ऊँची न हो —
कर्तव्य ऊँचा हो।
नेता कम बोलें, काम ज़्यादा करें,
और जनता डर से नहीं — अधिकार से बोले।
यह वर्ष आए खेत बनकर,
जहाँ बीज भरोसे में बोया जाए,
और फसल सम्मान में कटे।
जहाँ किसान सिर्फ पेट नहीं,
देश की आत्मा कहलाए।
यह वर्ष आए युवा बनकर —
जो जलाए नहीं, रोशन करे;
जो भागे नहीं, बनाए;
जो भीड़ न बने, दिशा बने।
यह वर्ष आए कलाकार बनकर —
जो बिके नहीं, झुके नहीं,
जो ऐसा बोले कि समय भी ठहर जाए।
यह वर्ष आए गाँव बनकर —
जहाँ विकास का मतलब हो
नल, स्कूल, दवा और हौसला,
और गाँव नक्शे में नहीं — नीति में ज़िंदा हो।
यह वर्ष आए किताब बनकर —
जो हमें पढ़े भी और बदले भी,
जहाँ हर प्रश्न एक राह बने,
और हर राह थोड़ी मानवीय हो।
यदि यह सब न भी हो पाए,
तो कम से कम इतना हो जाए —
कि हम थोड़े अधिक सच बोलें,
थोड़े कम चोट पहुँचाएँ,
और थोड़ा ज़्यादा मनुष्य बन जाएँ।
इसी कामना के साथ —
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ।
✨ — एन. मंडल
लेखक, फिल्म संपादक व निर्देशक
संस्थापक-संपादक, गाम घर डिजिटल मीडिया
समस्तीपुर, बिहार





