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शहीद रामफल मंडल भारतीय इतिहास के उपेक्षित अमर शहीद: डॉ. गौतम

शहीद रामफल मंडल जी: भरतीय इतिहास के न्याय की प्रतीक्षा करता एक अमर शहीद - डॉ. गौतम कुमार

“कुछ लोग जीवन जीकर चले जाते हैं,कुछ लोग मरकर भी सदियों तक जीते हैं।
राष्ट्र के लिए मिटने वाले वीर,इतिहास के पन्नों में नहीं,जन-जन के हृदय में रहते हैं।”
भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं है। यह उन असंख्य वीरों के त्याग, संघर्ष और बलिदान की अमर गाथा है, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। ऐसे ही महान क्रांतिकारी थे शहीद रामफल मंडल जी, जिनका जीवन साहस, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति का अद्वितीय उदाहरण है।

एक साधारण परिवार से निकला असाधारण वीर
शहीद रामफल मंडल जी का जन्म 6 अगस्त 1924 को बिहार के सीतामढ़ी जिले के मधुरापुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम गोखुल मंडल और माता का नाम गरबी मंडल था। सामान्य ग्रामीण परिवेश में पले-बढ़े रामफल मंडल बचपन से ही अन्याय के विरोधी और साहसी स्वभाव के थे।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942) के समय देशभर में स्वतंत्रता की लहर उठी। इसी दौर में रामफल मंडल ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता चुना। उन्होंने विदेशी सत्ता के अत्याचारों के सामने झुकने से इनकार किया और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई।अंग्रेजी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। मात्र 19 वर्ष की अल्पायु में 23 अगस्त 1943 को भागलपुर केंद्रीय कारागार में उन्होंने हंसते-हंसते देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
“वतन की राह में जिसने अपना सब कुछ लुटा दिया,उस वीर ने मौत को भी तिरंगे से सजा दिया।”

बलिदान को राष्ट्रीय सम्मान की आवश्यकता
शहीद रामफल मंडल की कहानी केवल एक व्यक्ति के बलिदान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन हजारों भारतीयों की कहानी है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आंदोलन बनाया। इतिहास का दायित्व है कि वह हर उस वीर को उचित स्थान दे, जिसने राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दिया। किसी भी शहीद का सम्मान केवल एक समारोह या स्मारक तक सीमित नहीं होना चाहिए। उनके विचार, संघर्ष और जीवन गाथा को शिक्षा और समाज की चेतना का हिस्सा बनाना चाहिए। “शहीदों की पहचान केवल उनकी मौत से नहीं होती,उनके सपनों को पूरा करने की जिम्मेदारी से होती है।”

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मेरा विचार है कि
“राष्ट्र का इतिहास तभी पूर्ण माना जाएगा, जब उसमें बड़े नामों के साथ उन गुमनाम और अल्पज्ञात वीरों को भी सम्मान मिलेगा, जिन्होंने स्वतंत्रता की नींव अपने रक्त से मजबूत की। शहीद रामफल मंडल जैसे क्रांतिकारी किसी एक क्षेत्र या समाज की संपत्ति नहीं बल्कि पूरे भारत की अमूल्य धरोहर हैं।”
“आज आवश्यकता है कि सरकार, समाज और शिक्षण संस्थान मिलकर ऐसे वीरों के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करें। शहीदों को सम्मान देना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को राष्ट्र सेवा का संस्कार देना है।”

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इतिहास से एक प्रश्न
आज जब हम स्वतंत्रता का उत्सव मनाते हैं, तो हमें यह भी विचार करना चाहिए कि क्या हर बलिदानी को उसका उचित स्थान मिला है? यदि किसी वीर ने देश के लिए अपना जीवन दिया है तो उसका सम्मान भी उसी व्यापकता से होना चाहिए।
“वक्त बदल सकता है, सत्ता बदल सकती है,
लेकिन देश के लिए दिया गया बलिदान कभी नहीं बदलता।”
शहीद रामफल मंडल जी की शहादत हमें सदैव प्रेरणा देती रहेगी कि साहस, सत्य और राष्ट्रप्रेम के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी इतिहास से विस्मृत नहीं होता।
शहीद रामफल मंडल अमर रहें। भारत माता के सभी वीर सपूतों को शत-शत नमन।
— डॉ. गौतम कुमार, विचारक एवं संपादकीय लेखक

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