- मिथिला और मगध की लोकपरंपराओं में होली का उल्लेख सदियों पुराना है।
- आधुनिक दौर में डिजिटल युग के बावजूद सामूहिकता और लोकगीतों की परंपरा जीवित।

बिहार की होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि इतिहास, लोकस्मृति और सामाजिक परिवर्तन की जीवंत कहानी है। प्राचीन मिथिला और मगध की सांस्कृतिक परंपराओं में होली का उल्लेख सदियों से मिलता है। यह उत्सव फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन से शुरू होकर दूसरे दिन रंगों की उमंग में बदल जाता है। परंतु बिहार में इसकी आत्मा लोकगीतों, सामूहिकता और सामाजिक समरसता में बसती है।
मिथिला क्षेत्र, जो आज के उत्तर बिहार का बड़ा हिस्सा है, वहां होली को ‘फगुआ’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ पारंपरिक फगुआ गीतों में प्रेम, व्यंग्य और सामाजिक टिप्पणी का अनोखा मिश्रण मिलता है। लोककवि विद्यापति की रचनाओं में ऋतु-वर्णन और श्रृंगार के भाव, होली के रंगों से जुड़ते दिखाई देते हैं। वहीं मगध क्षेत्र में ढोल-मांदर की थाप पर गाए जाने वाले गीत ग्रामीण जीवन की सादगी और उत्साह को प्रकट करते हैं।
ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो बिहार की होली कृषि चक्र से भी जुड़ी रही है। रबी की फसल पकने के समय यह उत्सव किसानों के लिए राहत और उल्लास का अवसर बनता था। गांवों में होलिका दहन के लिए सामूहिक रूप से लकड़ी और उपले इकट्ठा किए जाते थे, जो समुदाय की एकता का प्रतीक था। होलिका की अग्नि को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है, जो सामाजिक नैतिकता को मजबूत करती है।
समय के साथ इस उत्सव का स्वरूप बदला है। शहरीकरण और तकनीकी विकास ने होली के रंगों को और व्यापक बनाया है। आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से शुभकामनाएं साझा की जाती हैं, जबकि पहले यह संवाद चौपालों और आंगनों में होता था। फिर भी बिहार के छोटे कस्बों और गांवों में सामूहिक होली की परंपरा अब भी जीवित है, जहां जाति और वर्ग की सीमाएं कुछ समय के लिए धुंधली हो जाती हैं।
हालांकि बदलते समय में कुछ चुनौतियां भी सामने आई हैं। रासायनिक रंगों का उपयोग, जल की बर्बादी और असामाजिक तत्वों की शरारतें उत्सव की गरिमा को प्रभावित करती हैं। इसलिए हाल के वर्षों में प्रशासन और सामाजिक संगठनों ने ‘इको-फ्रेंडली होली’ और संयमित उत्सव का संदेश देना शुरू किया है। प्राकृतिक रंगों और सीमित जल उपयोग की अपील इस दिशा में सकारात्मक कदम है।
बिहार की होली का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामुदायिक सौहार्द है। विभिन्न धर्मों और समुदायों के लोग एक-दूसरे के घर जाकर अबीर-गुलाल लगाते हैं। यह परंपरा सामाजिक सद्भाव को मजबूत करती है। कई स्थानों पर कवि सम्मेलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक भोज का आयोजन होता है, जो उत्सव को केवल रंगों तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बनाता है।
अंततः, बिहार की होली इतिहास और आधुनिकता के संगम का प्रतीक है। यह केवल अतीत की परंपरा नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत अभिव्यक्ति है। यदि हम इसकी मूल भावना—सामूहिकता, सौहार्द और मर्यादा—को बनाए रखें, तो यह उत्सव आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतना ही प्रेरणादायक रहेगा जितना सदियों पहले था।




