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रोसड़ा: कभी कांग्रेस का गढ़, अब कमजोर होती पकड़—महागठबंधन भी…

रोसड़ा में कांग्रेस की खोती पकड़: महागठबंधन के साथ भी कोई सांझी जीत न हो सकी

समस्तीपुर : रोसड़ा विधानसभा सीट के ताज़ा नतीजे जिले में कांग्रेस की घटती राजनीतिक पकड़ का साफ़ संकेत देते हैं। महागठबंधन के तहत राजद और वामदलों के साथ तालमेल के बावजूद कांग्रेस उम्मीदवार बी.के. रवि भारी अंतर से पराजित रहे। भाजपा के बीरेन्द्र कुमार ने 1,22,773 वोट लेकर शानदार जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के बी.के. रवि को 72,240 वोट ही मिले। 50,585 मतों का यह फ़र्क़ बताता है कि केवल गठबंधन का नाम होना कांग्रेस के लिए ठोस समाधान साबित नहीं हुआ।

रोसड़ा कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था। इसका ताज़ा संकेत 2015 का है, जब डॉ. अशोक कुमार ने कांग्रेस के लिए यह सीट जीती थीं। उससे पहले 2005 में यह क्षेत्र राजद के कब्ज़े में रहा। 2020 के चुनाव में यह सीट भाजपा के खाते में चली गई थी, तब कांग्रेस के नागेन्द्र विकल को भाजपा प्रत्याशी से 35,744 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। इस बार हार का अंतर और बढ़कर 50 हजार से अधिक हो गया है — यह कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और जमीनी ताकत में और गिरावट का संकेत है।

विधानसभा क्षेत्र में इस बार कांग्रेस ही अकेला ऐसा प्रमुख विपक्षी घटक था जिसने जिला स्तर पर चुनावी चुनौती पेश की; मगर स्थानीय स्तर पर पार्टी का जनाधार पिछले चुनावों की तुलना में और अधिक खिसकता हुआ दिखाई दिया। महागठबंधन के घटक दलों — खासकर राजद और वामपंथी संगठनों — ने संयुक्त रूप से मैदान पर मौजूदगी दर्ज कराई, पर वोटों का सहज ट्रांसफर कांग्रेस के पक्ष में नहीं दिखा। स्थानीय विश्लेषक इस अंतर को गठबंधन के भीतर कैडर और कार्यकर्ता स्तर पर तालमेल की कमी, तथा स्थानीय भूमि पर अपने वोट बैंक की स्पष्ट पहचान न हो पाने से जोड़ते हैं।

राजनीतिक समीकरणों का विश्लेषण करें तो रोसड़ा की परम्परागत मतदाता संरचना में समय के साथ बदलाव आया है। जो जातीय और वर्गीय समीकरण 2010–2015 के आसपास कांग्रेस के अनुकूल थे, वे धीरे-धीरे टूटते गए। स्थानीय स्तर पर पार्टी संगठन की सक्रियता, बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ता-रैंक का कमजोर होना भी बड़े कारण रहे। भाजपा ने अपने संगठनात्मक नेटवर्क और स्थानीय प्रत्याशी की जमीनदारी का बेहतर इस्तेमाल करते हुए मतदाताओं को आकर्षित किया — जिसका नतीजा इस अंतर के रूप में सामने आया।

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विशेषज्ञों का कहना है कि महागठबंधन का होना सिर्फ़ समीकरणों को सुदृढ़ करने के लिए पर्याप्त नहीं है; उसे जमीन पर जोड़ने के लिए स्थानीय स्तर पर स्पष्ट रणनीति और साझा आयोजन, मतदाता संपर्क तथा आश्वासन देने वाली नीतियों की जरूरत होती है। राजद और वामदलों के समर्थक वोट का बड़े पैमाने पर कांग्रेस के पक्ष में ट्रांसफर नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन के कर्मठ कैडर ने अपने स्तर पर कांग्रेस के लिए पूरी तरह से मोर्चा नहीं सम्हाला।

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लोकल विश्लेषक यह भी मानते हैं कि कांग्रेस को केवल प्रत्याशी बदलने या गठबंधन पर भरोसा करने से अधिक गहरा आत्मावलोकन करना होगा — संगठनात्मक पुनर्गठन, युवा कार्यकर्ता उभारना, और स्थानीय मुद्दों पर लगातार संवाद जरूरी है। अगर पार्टी इन बुनियादी कमियों पर काम नहीं करती है तो महागठबंधन के नाम पर मिली सहमति भी अगले चुनाव में संभवतः कारगर साबित नहीं होगी।

रोसड़ा के परिणाम कांग्रेस के लिए महज एक हार नहीं, बल्कि चेतावनी सिद्ध हो सकते हैं। 2015 की जीत से लेकर 2025 के इस अंतर तक का सफ़र यह दिखाता है कि वोट बैंक का संरक्षण और विस्तार पार्टी के हाथ से निकलता जा रहा है। 2005 में राजद का कब्ज़ा, 2015 में कांग्रेस की वापसी और 2020 तथा 2025 में भाजपा की मजबूत पकड़ — यह सिलसिला बताता है कि क्षेत्र में राजनीतिक नक्सा लगातार बदल रहा है और पारंपरिक गढ़ों को भी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

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आगे के राजनीतिक नतीजे और परिस्थितियाँ इस बात पर निर्भर करेंगी कि कांग्रेस क्या सीख लेती है — क्या वह संगठन को फिर से सजीव कर सकती है, क्या स्थानीय मुद्दों पर मजबूत और स्पष्ट राजनीति बना सकती है, और क्या गठबंधन के साथी दलों के साथ समन्वय को व्यवहारिक रूप में लागू कर पाती है। रोसड़ा का संदेश साफ़ है: सिर्फ बातों और गठबंधन के नाम पर भरोसा करना अब काफी नहीं; जमीनी रणनीति, कैडर सक्रियता और स्थानीय मुद्दों के साथ लगातार जुड़ाव ही भविष्य तय करेगा।

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