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बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से गढ़ा झारखंड आंदोलन: शिबू सोरेन की भूमिका

शिबू सोरेन (Shibu Soren) सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि झारखंडी अस्मिता, आदिवासी प्रतिरोध और सामाजिक न्याय के प्रतीक हैं। उन्होंने अपनी 81 वर्ष की जीवन-यात्रा में क्रांति की कई कहानियाँ गढ़ीं, जिनमें आदिवासी स्वाभिमान, सामाजिक संघर्ष और राजनीतिक चेतना के अनेक अध्याय दर्ज हैं।

जब आदिवासी जीवन पर छाया था अन्याय का अंधेरा
बीसवीं सदी के मध्य भारत का आदिवासी समाज सूदखोरी, महाजनी प्रथा और ज़मींदारी शोषण की त्रासदी से गुजर रहा था। झारखंड के गाँवों में महाजन आदिवासियों को ऊँचे ब्याज पर ऋण देते थे और समय पर चुका न पाने पर उनकी ज़मीनें हड़प लेते थे। यही नहीं, ज़मींदारों और दलालों की गठजोड़ ने आदिवासियों को उनके ही जंगल, ज़मीन और जल से बेदखल कर दिया था।

इसी समय सोबरन सोरेन नामक एक आदिवासी किसान, जो शिबू सोरेन के पिता थे, इस अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए। लेकिन उनकी हत्या कर दी गई। यह घटना शिबू सोरेन के जीवन की दिशा तय कर गई। उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और आदिवासी युवाओं को संगठित कर एक बगावती राह चुनी।

1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का प्रभाव
1971-72 के भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश की आज़ादी ने ‘मुक्ति’ की लहर फैला दी। इसी भावना से 4 फरवरी 1972 को शिबू सोरेन, ए॰के॰ राय और बिनोद बिहारी महतो ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामूमो) के गठन का निर्णय लिया। इस बैठक में “मुक्ति” शब्द की प्रेरणा से अलग झारखंड की माँग को राजनीतिक स्वरूप दिया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को आपातकाल लागू किया। उस दौरान शिबू सोरेन पर गिरफ्तारी का आदेश हुआ, लेकिन वे फरार रहे, और धनबाद के डिप्टी कलेक्टर के.बी. सक्सेना की समझाइश पर 1976 में आत्मसमर्पण कर दिए गए।

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झारखंड आंदोलन की पृष्ठभूमि
झारखंड आंदोलन की जड़ें आदिवासी विद्रोहों में गहरी हैं। 19वीं सदी में बिरसा मुंडा ने अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह किया था, वहीं शिबू सोरेन ने उस व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह किया जिसमें आदिवासी शोषण और महाजनी-सूदखोरी फैली हुई थी। उस समय झारखंड के महाजन उधारदाताओं ने आदिवासियों को ऋण के जाल में फँसाकर उनकी ज़मीनें हड़प रखी थीं। शिबू के पिता सोबरन सोरेन महाजन उत्पीड़न के ख़िलाफ मुखर थे, इसलिए 27 नवंबर 1957 को उनकी हत्या कर दी गई। इस घटना ने शिबू की ज़िंदगी बदल दी; उन्होंने पढ़ाई छोड़कर आदिवासी युवकों का समूह बना लिया और महाजनों के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। 1970 के दशक आते-आते इस आंदोलन की बागड़ोर उनके हाथ में आ गई।

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शिबू सोरेन और आदिवासी संघर्ष
शिबू सोरेन ने महाजन-प्रथा को चुनौती देते हुए ‘धनकटनी आंदोलन’ चलाया। इस आंदोलन में आदिवासी युवा जमींदारों के खेतों से धान की फसल काटते और आदिवासी महिलाएं हसिया लेकर उसे इकट्ठा करतीं; वहीं ग्रामीण तीर-कमान लेकर उनके खेतों की रक्षा करते थे। इस विद्रोह ने शिबू सोरेन को आदिवासी समाज में अपना ‘नायक’ बना दिया, क्योंकि वे सूदखोरी, महाजनी और अन्याय से मुक्ति का रास्ता दिखा सकते थे। शिबू के नेतृत्व में झारखंड के कई इलाकों में महाजन-विरोधी आंदोलनों का दायरा बढ़ा और वे पारसनाथ के घने जंगलों में छिपकर आंदोलन चलाते रहे।

आंदोलन के समय शिबू सोरेन ने परिवार की जिम्मेदारियाँ पत्नी रूपी सोरेन को सौंप दी थीं। उन्होंने आदिवासी अधिकारों के लिए पूरे जीवन संघर्ष किया और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी मोर्चा खोला।

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‘दिशोम गुरु’ की उपाधि और लोकप्रियता
झारखंड में आदिवासी जनमानस ने शिबू सोरेन को ‘दिशोम गुरु’ (राह-प्रदर्शक) की उपाधि दी। उनके नेतृत्व और जन-निष्ठा के चलते आदिवासी समाज में उनका उच्च सम्मान था। वे शराबबंदी, शिक्षा, सामूहिक खेती जैसे सामाजिक सुधारों के लिए भी कार्य करते रहे, जिससे आदिवासी समुदाय में उनका मान-सम्मान और बढ़ा।

राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश
शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखंड आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान मिली। वह कई बार लोकसभा (दमका क्षेत्र) के लिए निर्वाचित हुए और 2020 में राज्यसभा पहुंचे। साथ ही उन्होंने यू.पी.ए. सरकार में केंद्रीय कोयला मंत्री के रूप में भी कार्य किया। उनके दीर्घकालीन संघर्ष और प्रयासों के परिणामस्वरूप 15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन हुआ। शिबू सोरेन का आदिवासी उत्थान और झारखंड निर्माण के लिए निरंतर संघर्ष आज भी आदिवासी राजनीति में मिसाल है।

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