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बिहार की राजनीति: अपराध, बाहुबली और फिल्मी सच्चाई

फिल्मों में बिहार की स्याही सच्चाई

BIHAR POLITICS : बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में दशकों तक ‘बाहुबली’ नेताओं का बोलबाला रहा है। यह वही दौर है जिसे अक्सर ‘जंगलराज’ कहा जाता है, जब समाज में अपराध, धनबल और जातीय संघर्ष चरम पर था। ऐसे में बॉलीवुड निर्माताओं को भी बिहार का यह गुंडाराज पसंदीदा विषय रहा है। समाचारों के अनुसार, 1980–90 के दशक में गोरखपुर के बाहुबली काली प्रसाद पांडेय को उत्तर भारत का सबसे खतरनाक स्ट्रांगमैन माना जाता था। कहा जाता है कि उन्होंने 1987 की फिल्म ‘प्रतिघात’ में विलेन की प्रेरणा दी थी। इस तरह की घटनाओं ने बिहार की राजनीति को एक फिल्मी ड्रामे की तरह साक्षात बना दिया है।

फिल्मों में बिहार की स्याही सच्चाई

बिहार की राजनीति और समाज की कड़वी सच्चाई को दिखाती कई हिंदी फिल्में बनी हैं। इन फिल्मों में अपराध, भ्रष्टाचार और दबंग नेताओं का चित्रण किया गया है।

प्रकाश झा की बिहार-उन्मुख फिल्में

फिल्म निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा ने बिहार पर केंद्रित कई प्रभावशाली फिल्में बनाई हैं, जो समाज के काले सच को उजागर करती हैं। उनकी ‘गंगाजल’ (2003) फिल्म बिहार के निर्मम अपराध पर आधारित कहानी है। यह फिल्म भादलपुर की 1980 के ‘आँखफोड़वा कांड’ जैसी घटनाओं की गूंज है, जिसमें कैदियों की आंखे अंधा करने के लिए फोड़ी गई थीं। हालांकि झा ने माना कि फ़िल्म काल्पनिक है और सीधे उस घटना पर नहीं बनी, लेकिन इसमें ऐसे ही जबर्दस्त अंधा करने के दृश्य दिखाए गए हैं। गंगाजल ने क्राइम, पुलिस की बेईमानी और बाहुबली नेताओं की साज़िशों को पर्दे पर उतारा और इसे सामाजिक मुद्दे की श्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।

झा की दूसरी बड़ी फिल्म ‘अपहरण’ (2005) बिहार में फ़ौरी धन के अपहरण पर केंद्रित है। इसमें नाना पाटेकर द्वारा निभाया गया अपराधी तबरेज़ आलम का किरदार प्रसिद्ध बिहार के बाहुबली सांसद मोहम्मद शाहाबुद्दीन से प्रेरित बताया गया है। जब्त मनी लॉन्ड्रिंग, रॉब-इन-किडनैपिंग जैसे अपराध इस फिल्म की कहानी का हिस्सा हैं। अन्य ओर, झा की ‘मृत्युदंड’ (1997) में उन्होंने महिलाओं के उत्पीड़न और जातिगत अन्याय को चित्रित किया है। फिल्म में तीन साहसी महिलाएं अपने पतियों और समाज के दबंगों के खिलाफ सशक्त होकर लड़ती हैं, जो दिखाता है कि ग्रामीण बिहार में भी महिलाओं की दुर्दशा कितनी गहरी है।

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झा की प्रथम फिल्म ‘दामुल’ (1985) बिहार के बंधुआ मज़दूरों की पीड़ा पर आधारित है। यह कहानी उस जमींदारी-वर्चस्व को बयां करती है जहाँ दलित मजदूरों को ऊँची जाति के जमींदारों ने अपनी गुलामी में बाँध रखा है। दामुल ने सामाजिक यथार्थ को इतने प्रभाव से दिखाया कि इसे सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड से सम्मानित किया गया।

अन्य फिल्में

प्रकाश झा के अलावा भी कई निर्देशकों ने बिहार के बाहुबली नेता-गैंगस्टरों को फिल्मी पर्दे पर उतारा है। उदाहरण के लिए, 1987 में एन. चन्द्रा की ‘प्रतिघात’ में बिहार के कुख्यात बाहुबली नेता काली पाण्डेय जैसे चरित्र को दर्शाया गया। काली पाण्डेय गरीबों की मदद के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उन पर हत्या-अपहरण जैसे संगीन आरोप भी लगे रहे। ऐसा कहा जाता है कि इसी बाहुबली छवि ने प्रतिघात के विलेन चरित्र को जन्म दिया था।

इन फिल्मों की बदौलत बिहार की राजनीति के ‘बाहुबली युग’ की काली सच्चाइयाँ जनता के सामने आई हैं। अपराध, जातिगत विभाजन और राजनीति के गहरे गठजोड़ ने इन फिल्मों को दर्शकों में चर्चित बनाया है।

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OTT प्लेटफ़ॉर्म पर बिहार की राजनीति

बिहार के कलेवर को अब वेब सीरीज ने भी बड़े पर्दे से आगे बढ़कर दिखाया है। प्रमुख OTT प्लेटफ़ॉर्म्स पर बनी इन धारावाहिकों ने बिहार की राजनीति, अपराध और समाज की सजीव झलक पेश की है:

  • महारानी (SonyLIV) – यह राजनीतिक ड्रामा 2021 में शुरु हुआ और इसके तीन सीज़न आ चुके हैं। महारानी बिहार के 1990 के दशक की राजनीति से प्रेरित है, जब लालू प्रसाद यादव ने अपनी गृहिणी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। वस्तुतः, कहानी में एक अनपढ़ गृहिणी को अचानक मुख्यमंत्री बनना पड़ता है, जिससे दर्शकों को उस दौर की उठापटक की झलक मिलती है।

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  • खाकी: द बिहार चैप्टर (Netflix) – यह एक अपराध-थ्रिलर सीरीज है जिसमें शेखपुरा के ईमानदार एसपी अमित लोढ़ा की कहानी है। अमित लोढ़ा नक्सली अपराधी अशोक महतो गैंग के खिलाफ लड़ते हुए कैद से फरार अपराधियों को पकड़ता है। सीरीज बिहार में जातीय टकराव, पुलिस व्यवस्था और राजनीति के गठजोड़ को दिखाती है।

  • रक्तांचल (MX Player) – यह धारावाहिक 1980 के दशक की पूर्वांचल (बिहार-यूपी सीमा क्षेत्र) की कहानियों पर आधारित है। इसमें दो अपराधियों वसीम खान और विजय सिंह के बीच खूनी प्रतिस्पर्धा दिखाई गई है। इन मैफ़ियाओं की सत्ता संघर्ष की कहानी से स्पष्ट है कि उस दौर के बिहार-पूर्वांचल में विकास कार्यों के ठेके भी असल में हिंसक द्वंद से बँटते थे।

  • दुपहिया (Amazon Prime Video) – यह एक सामाजिक व्यंग्य-सीरीज है जो बिहार के एक शांतिप्रिय गाँव ‘धड़कपुर’ की पोल खोलती है। कहानी में दिखाया गया कि धड़कपुर पहले से 25 साल तक अपराध-मुक्त रहा, लेकिन एक शादी के लिए लाए गए मोटरसाइकिल के गायब हो जाने से गाँव में अराजकता फैल जाती है। इस हलके-फुलके अंदाज़ में, ग्रामीण राजनीति और आपसी भरोसे की कसौटी को बयां किया गया है।

  • रंगबाज़: द बिहार चैप्टर (ZEE5) – यह 2025 में आने वाली फिल्म है जो बिहार में अपराधियों के राजनीतिक शिखर तक पहुँचने की कहानी है। फिल्म की केंद्र में हरून अली शाह बैग नाम का गैंगस्टर है, जो क्राइम से पॉलिटिक्स तक का सफ़र तय करता है। वीबो ने बताया है कि यह फिल्म दिखाती है कैसे एक सड़क का गटर लड़का प्रभावी धंधेबाज बनकर अंततः बिहार की सत्ता का दावेदार बन जाता है। फिल्म में दिखाया गया है कि सत्ता हथियाने के लिए कितना खून-खराबा, गठजोड़ और चलन बदलना पड़ता है।

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इन वेब सीरीज़ में देखा गया कि अक्सर बिहार की राजनीति में अपराध और भ्रष्टाचार इतनी गहराई में समा चुके हैं कि यही साम्राज्य एक थ्रिलर की तरह लोगों को आकर्षित करता है।

बिहार की राजनीति और अपराध का यह ताने-बाने फिल्मकारों को हमेशा आकर्षित करता रहा है। ये फिल्में और वेब सीरीज न केवल मनोरंजन करती हैं, बल्कि वहाँ की सच्ची घटनाओं, बाहुबली राज और सामाजिक विषमताओं को उजागर भी करती हैं। कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति को समझने के लिए ये सिनेमा और धारावाहिक एक जीवंत दस्तावेज़ साबित हुए हैं, जिनसे पाठक/दर्शक को गहन अंतर्दृष्टि मिलती है।

स्रोत: ऊपर उद्धृत जानकारी विश्वसनीय समाचार और विश्वकोश (विकिपीडिया, न्यूज़आर्टिकल्स) से ली गई है।

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