लोकतंत्र किसी राष्ट्र की केवल शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि उसकी सामूहिक चेतना, राजनीतिक संस्कृति और संवैधानिक मूल्यों का प्रतिबिंब होता है। किसी भी देश की वास्तविक शक्ति उसकी सेना, अर्थव्यवस्था अथवा प्राकृतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि संविधान के प्रति उसकी आस्था, राजनीतिक नेतृत्व की मर्यादा और नागरिकों की जागरूकता में निहित होती है। जब संविधान सर्वोच्च रहता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है; और जब जाति, परिवार, क्षेत्र तथा व्यक्तिगत स्वार्थ संविधान से ऊपर होने लगते हैं, तब लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।
आज विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों की तरह भारत भी एक महत्वपूर्ण वैचारिक और राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। एक ओर संविधान समान अवसर, समान अधिकार, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक सहभागिता का मार्ग प्रशस्त करता है, वहीं दूसरी ओर राजनीति में परिवारवाद, व्यक्तिवाद, क्षेत्रवाद और जातीय ध्रुवीकरण जैसी प्रवृत्तियाँ लोकतंत्र की मूल भावना को चुनौती देती दिखाई देती हैं।
राजनीतिक विश्लेषण बताता है कि परिवारवाद लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। लोकतंत्र का आधार योग्यता, जनसेवा और जनसमर्थन होना चाहिए, लेकिन जब राजनीतिक दलों में नेतृत्व का हस्तांतरण लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बजाय पारिवारिक विरासत के आधार पर होने लगता है, तब आम नागरिक के लिए अवसरों का दायरा सीमित हो जाता है। लोकतंत्र किसी परिवार, वंश या समूह की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की सामूहिक आकांक्षाओं का मंच है।
इसके साथ ही राजनीति में गिरती मर्यादा भी चिंताजनक विषय है। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष आवश्यक है, लेकिन व्यक्तियों का अपमान, असत्य प्रचार, कटु भाषा और समाज को विभाजित करने वाली राजनीति लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करती है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का आधार नीति, दृष्टि, विकास और जनहित होना चाहिए, न कि नफरत, भ्रम और भावनात्मक उकसावे। जब राजनीतिक विमर्श का स्तर गिरता है, तब लोकतंत्र की गरिमा भी प्रभावित होती है।
लोकतंत्र की सफलता या विफलता का सबसे बड़ा उत्तरदायित्व जनता पर भी है। मतदाता केवल वोटर नहीं, बल्कि लोकतंत्र के वास्तविक संरक्षक हैं। किंतु जब मतदान जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा या तात्कालिक लाभ के आधार पर होने लगे और विकास, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य तथा सुशासन जैसे मुद्दे पीछे छूट जाएँ, तब लोकतंत्र अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है। राजनीतिक दल वही रणनीति अपनाते हैं, जिसे जनता स्वीकार करती है। इसलिए यदि मतदाता जातिवाद, क्षेत्रवाद और झूठे वादों के जाल में फँसते हैं, तो लोकतंत्र भी उसी दिशा में आगे बढ़ता है।
आज झूठे वादों और राजनीतिक भ्रमजाल का दौर भी लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। चुनावी घोषणाएँ और वादे लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन जब वे यथार्थ, संसाधनों और संवैधानिक सीमाओं से परे जाकर केवल जनभावनाओं को प्रभावित करने का साधन बन जाएँ, तब वे लोकतंत्र को मजबूत नहीं बल्कि कमजोर करते हैं। अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए समाज को भ्रमित करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
इतिहास साक्षी है कि वे राष्ट्र अधिक सफल हुए हैं, जहाँ नागरिकों ने संविधान को सर्वोच्च माना, संस्थाओं का सम्मान किया और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की। लोकतंत्र केवल चुनावों से जीवित नहीं रहता; वह सत्य, पारदर्शिता, जवाबदेही, नैतिक राजनीति और जागरूक नागरिकता से सशक्त होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संविधान के प्रति निष्ठा केवल शपथ तक सीमित न रहे, बल्कि शासन, राजनीति और सामाजिक व्यवहार के प्रत्येक स्तर पर दिखाई दे।
1) राजनीतिक दलों को आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना होगा
2) नेताओं को संवाद की मर्यादा बनाए रखनी होगी।
3) जनता को जाति, क्षेत्र, धर्म तथा भावनात्मक नारों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित, चरित्र, योग्यता और जनसेवा के आधार पर निर्णय लेना होगा।
लोकतंत्र का भविष्य संसदों, विधानसभाओं और राजनीतिक दलों से जितना तय होता है, उससे कहीं अधिक मतदान केंद्रों पर खड़े नागरिकों के विवेक से तय होता है। यदि जनता संविधान को सर्वोच्च मानकर जागरूक निर्णय लेगी, तो परिवारवाद, जातिवाद और राजनीतिक भ्रमजाल स्वतः कमजोर पड़ जाएंगे। अन्यथा लोकतंत्र का ढाँचा तो बना रहेगा, लेकिन उसकी आत्मा धीरे-धीरे क्षीण होती जाएगी।
यह समय आत्ममंथन का है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि सत्ता किसके हाथ में होगी, बल्कि यह है कि राजनीति संविधान के मार्ग पर चलेगी या पहचान-आधारित समीकरणों के सहारे। इस प्रश्न का उत्तर किसी एक नेता, दल या सरकार के पास नहीं, बल्कि लोकतंत्र के वास्तविक मालिक—जनता—के पास है।
लेखक:
डॉ. गौतम कुमार
शिक्षाविद्, समाजचिंतक एवं जन-जागरूकता के पक्षधर





