
पटना : बिहार सरकार द्वारा पारंपरिक कला एवं हस्तशिल्प को बढ़ावा देने और नई पीढ़ी को इससे जोड़ने के उद्देश्य से एक महत्त्वपूर्ण पहल की शुरुआत की गई है। Handicraft Development Bihar योजना के तहत राज्य के 10 जिलों में कुल 400 कलाकारों को मिथिला पेंटिंग सहित विभिन्न पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस दो महीने के प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रतिभागियों को प्रतिदिन 300 रुपये का स्टाइपेंड भी दिया जाएगा, ताकि आर्थिक कारणों से कोई भी प्रतिभाशाली व्यक्ति इस अवसर से वंचित न रहे।
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यह प्रशिक्षण कार्यक्रम मधुबनी सहित कुल 13 केंद्रों पर संचालित किया जाएगा। इन केंद्रों पर मिथिला पेंटिंग के अलावा सिक्की कला, सुजनी कढ़ाई और टेराकोटा जैसी बिहार की प्रसिद्ध पारंपरिक शैलियों का भी प्रशिक्षण दिया जाएगा। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य न केवल इन कलाओं को जीवित रखना है, बल्कि उन्हें समकालीन बाजार और डिज़ाइन से जोड़कर कलाकारों की आय के नए स्रोत भी विकसित करना है।
पारंपरिक कला को नई पीढ़ी से जोड़ने की पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल संस्कृति के प्रभाव के कारण पारंपरिक कलाओं से युवाओं का जुड़ाव कम होता जा रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए यह कार्यक्रम तैयार किया गया है, जिसमें युवाओं को प्रशिक्षित करने के साथ-साथ उन्हें रोजगारोन्मुखी भी बनाया जाएगा।
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प्रशिक्षण के दौरान कलाकारों को केवल चित्रकारी या शिल्प निर्माण ही नहीं, बल्कि डिज़ाइन इनोवेशन, रंग संयोजन, बाजार की मांग, उत्पाद की फिनिशिंग और ब्रांडिंग की भी जानकारी दी जाएगी। इससे कलाकार अपनी कला को केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित न रखकर व्यावसायिक स्तर पर भी स्थापित कर सकेंगे।
मधुबनी बना प्रमुख केंद्र
मिथिला पेंटिंग की जन्मस्थली माने जाने वाले मधुबनी जिले को इस योजना का प्रमुख केंद्र बनाया गया है। यहां प्रशिक्षकों के रूप में अनुभवी कलाकारों और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुके कारीगरों को शामिल किया गया है। इससे प्रशिक्षार्थियों को पारंपरिक शैली के साथ-साथ आधुनिक तकनीक और बाज़ार की समझ भी मिलेगी।
मधुबनी के अलावा दरभंगा, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सहरसा, सुपौल, अररिया और पूर्णिया जिलों को भी इस योजना में शामिल किया गया है।
स्टाइपेंड से मिलेगा आर्थिक संबल
कार्यक्रम में शामिल होने वाले प्रत्येक कलाकार को प्रतिदिन 300 रुपये का स्टाइपेंड दिया जाएगा। यह राशि सीधे उनके बैंक खाते में ट्रांसफर की जाएगी। सरकार का मानना है कि इससे कलाकारों को प्रशिक्षण के दौरान दैनिक खर्चों की चिंता से राहत मिलेगी और वे पूरी तरह सीखने पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
कला के साथ रोजगार का रास्ता
हस्तशिल्प विकास विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस योजना का दीर्घकालिक उद्देश्य सिर्फ प्रशिक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इन कलाकारों को स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से जोड़ना भी है। ताकि वे अपने उत्पादों को राज्य और देश के बाहर तक बेच सकें और अपनी आजीविका को मजबूत बना सकें।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में कदम
यह योजना बिहार की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। मिथिला पेंटिंग, सुजनी और सिक्की जैसी कलाएं केवल सजावटी कला नहीं हैं, बल्कि वे समाज की परंपरा, इतिहास और स्त्री-जीवन की भावनाओं को भी अभिव्यक्त करती हैं। इन्हें संरक्षित करना वास्तव में सांस्कृतिक पहचान को बचाना है।
सरकार को उम्मीद है कि इस योजना से न केवल पारंपरिक कलाओं का संरक्षण होगा, बल्कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे और कला के माध्यम से आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा।




