भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी; यह असंख्य ज्ञात-अज्ञात वीरों के त्याग, संघर्ष और बलिदान की परिणति थी। बिहार की धरती ने भी स्वतंत्रता आंदोलन को अनेक ऐसे वीर दिए, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के सामने झुकने के बजाय अपने प्राणों की आहुति देना स्वीकार किया। उन्हीं वीरों में एक नाम है—रामफल मंडल।
23 अगस्त 1943 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसी शहादत की याद दिलाता है, जिसे व्यापक राष्ट्रीय पहचान मिलनी अभी बाकी है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार सीतामढ़ी जिले के मधुरापुर गाँव में जन्मे रामफल मंडल ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया और अंततः भागलपुर केंद्रीय कारागार में फाँसी दी गई। जिस समय देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, उस समय एक युवा ने अपने व्यक्तिगत भविष्य से अधिक महत्व राष्ट्र की स्वतंत्रता को दिया। यह केवल साहस की कहानी नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण की कहानी है।
उम्र छोटी थी, संकल्प विराट रुप
रामफल मंडल का जन्म 6 अगस्त 1924 को सीतामढ़ी जिले के बाजपट्टी क्षेत्र के मधुरापुर गाँव में हुआ था। सामान्य पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले इस युवा ने अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों को समझा और स्वतंत्रता आंदोलन की धारा से जुड़ गए।
1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर जबभारत छोड़ो आंदोलनशुरू हुआ, तब देश के विभिन्न हिस्सों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनाक्रोश तेज हुआ। बिहार भी इस आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र बना। रामफल मंडल इसी दौर में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध सक्रिय हुए। उपलब्ध विवरणों के अनुसार 24 अगस्त 1942 की घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें फाँसी की सजा सुनाई गई। 23 अगस्त 1943 को भागलपुर केंद्रीय जेल में अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें फाँसी दे दी। एक ऐसा युवा, जिसके सामने पूरी जिंदगी पड़ी थी, उसने देश की स्वतंत्रता के लिए मृत्यु को स्वीकार कर लिया। यही शहादत रामफल मंडल को इतिहास में विशिष्ट स्थान देती है।
रामफल मंडल की शहादत का आज के भारत के लिए संदेश
रामफल मंडल की कहानी को केवल अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष की कहानी मानना पर्याप्त नहीं होगा। उनकी शहादत आज के युवाओं को भी अनेक संदेश देती है। आज भारत स्वतंत्र है। अब हमारी लड़ाई किसी विदेशी शासन से नहीं, बल्कि गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, नशे और अवसरों की कमी जैसी चुनौतियों से है।
आज के युवा के हाथ में हथियार नहीं, बल्किशिक्षा, कौशल, संविधान, लोकतांत्रिक अधिकार और तकनीकहोनी चाहिए। रामफल मंडल की सकारात्मक सोच का आधुनिक अर्थ यही है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद युवा अपने लक्ष्य से पीछे न हटे, राष्ट्रहित को प्राथमिकता दे और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बने। उनकी शहादत हमें यह भी सिखाती है किराष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनता; राष्ट्र अपने नागरिकों के त्याग, जिम्मेदारी और चरित्र से बनता है।
सवाल किसी समाज का नहीं, राष्ट्र की स्मृति का है
रामफल मंडल को लंबे समय से धानुक समाज सहित बिहार के विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा श्रद्धापूर्वक याद किया जाता रहा है। उनके सम्मान के लिए समय-समय पर शहीद का दर्जा, प्रतिमा, स्मारक, डाक टिकट और शहादत दिवस को राजकीय स्तर पर मनाने जैसी माँगें उठती रही हैं। लेकिन इस प्रश्न को केवल किसी एक समुदाय की माँग के रूप में देखना उचित नहीं होगा। रामफल मंडल पहले भारत के स्वतंत्रता सेनानी हैं।
उनकी शहादत किसी जाति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की राष्ट्रीय विरासत है। यदि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उनके योगदान को उचित स्थान नहीं मिलता, तो यह केवल एक व्यक्ति की स्मृति की उपेक्षा नहीं होगी; यह हमारे इतिहास की अधूरी तस्वीर होगी।
सम्मान की माँग उठाने वालों को मेरी ओर से साधुवाद
रामफल मंडल की स्मृति को जीवित रखने में अनेक सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भूमिका रही है। अखिल भारतीय धानुक एकता महासंघ, अखिल भारतीय धानुक उत्थान महासंघ, शहीद रामफल मंडल विचार मंच, धानुक समन्वय समिति, अति पिछड़ा सेनासहित विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अलग-अलग समय पर उनके सम्मान की माँग उठाई है। संसद में भी उनके नाम पर डाक टिकट जारी करने की माँग उठ चुकी है। यह प्रयास इस बात का प्रमाण है कि रामफल मंडल की शहादत को व्यापक सार्वजनिक और संसदीय पहचान दिलाने की कोशिश लगातार जारी रही है।
2026 में एन. मंडल द्वारा मुख्यमंत्री से रामफल मंडल को आधिकारिक सम्मान देने की माँग उठाना भी उल्लेखनीय पहल है। ऐसे अनगिनत व्यक्ति है जैसे डॉ. गौतम कुमार, K C शास्त्री,रामचंद्र मंडल, ई॰ शैलेंद्र कुमार, रामनरेश मंडल, डॉ॰ मनोज कुमार गौतम, गणेश मंडल, वीरेंद्र मंडल, मंगनी लाल मंडल, राजदेव रमन, सियाराम मंडल, बलराम मंडल, बिंदेश्वरी मंडल, मुकेश धानुक उर्फ अरमान देव, वीरमणि मंडल, अरविंद धानुक, रामदास धानुक, जितेंद्र धानुक, गणेश रावत, सरयुग रावत, अशोक राय, अजय राय, राजेश मंडल, शंभू शरण पटेल, शीला मंडल, धनिक लाल मंडल, उदय मंडल,धर्मेंद्र कठेरिया, सागर कठेरिया उर्फ निर्मल कुमार, श्याम सिंह कठेरिया आदि उन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं और संगठनों का अभिनंदन किया जाना चाहिए, जिन्होंने रामफल मंडल की स्मृति और सम्मान का प्रश्न लगातार जीवित रखा है। ऐसे प्रयासों की भूरी-भूरी प्रशंसा की जानी चाहिए। यह केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि इतिहास के प्रति जिम्मेदारी भी है।
इस माँग में मेरी भी आवाज
एक शिक्षाविद्,सामाजिक चिंतक,समतामूलक समाज की स्थापना का पक्षधर और लेखक के रूप में मैं भी इस सार्वजनिक विमर्श में अपनी आवाज जोड़ना चाहता हूँ।
मैं, डॉ. गौतम कुमार, भारत सरकार और बिहार सरकार से विनम्र आग्रह करता हूँ कि अमर शहीद रामफल मंडल के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान का आधिकारिक पुनर्मूल्यांकन करते हुए उन्हें उपयुक्त राजकीय एवं राष्ट्रीय सम्मान देने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ। मेरी यह माँग किसी जातीय या राजनीतिक आग्रह के रूप में नहीं, बल्किराष्ट्रीय स्मृति और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के सम्मानके रूप में है।
मेरी पाँच प्रमुख माँगें हैं जो इस प्रकार है। पहली—रामफल मंडल को आधिकारिक रूप से शहीद के रूप में सम्मानित करने की आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जाए।
दूसरी—23 अगस्त को उनके शहादत दिवस के अवसर पर बिहार सरकार द्वारा राजकीय स्तर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जाए और सार्वजनिक अवकाश की माँग पर सकारात्मक निर्णय लिया जाए।
तीसरी—उनके पैतृक गाँव मधुरापुर में राष्ट्रीय स्तर का स्मारक, संग्रहालय अथवा स्मृति केंद्र विकसित किया जाए।
चौथी—उनकी जीवनी और स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को इतिहास एवं नागरिक शिक्षा के उपयुक्त पाठ्यक्रमों में स्थान दिया जाए।
पाँचवीं—केंद्र सरकार से उनके नाम पर डाक टिकट जारी करने की माँग पर सकारात्मक विचार किया जाए।
सरकार की पहल की प्रशंसा भी जरूरी
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उसके सकारात्मक प्रयासों की सराहना भी है।
रामफल मंडल के सम्मान को लेकर बिहार सरकार के स्तर पर पूर्व में सार्वजनिक रूप से सम्मान और शहीद का दर्जा देने की बात कही गई है। यदि सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है और औपचारिक प्रक्रिया को पूर्ण करती है, तो यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम होगा।
विशेष रूप से यदि23 अगस्त 2026के अवसर पर सरकार कोई ठोस निर्णय लेती है, तो यह बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक ऐतिहासिक संदेश होगा।
क्योंकि सरकार जब किसी उपेक्षित स्वतंत्रता सेनानी को सम्मान देती है, तो वह केवल एक परिवार या समुदाय का सम्मान नहीं करती—वहस्वतंत्रता आंदोलन की सामूहिक विरासत का सम्मान करती है।
इसलिए सरकार से अपेक्षा विरोध की नहीं, बल्किसकारात्मक निर्णय कीहै।
शहादत दिवस केवल समारोह नहीं, संकल्प दिवस बने
हर वर्ष 23 अगस्त को यदि केवल माल्यार्पण और श्रद्धांजलि तक कार्यक्रम सीमित रह गया तो रामफल मंडल की शहादत का वास्तविक संदेश नई पीढ़ी तक नहीं पहुँच पाएगा। इस दिन विद्यालयों में विशेष व्याख्यान हों। विश्वविद्यालयों में शोध संगोष्ठियाँ हों। उनके जीवन पर पुस्तकें और वृत्तचित्र तैयार हों। उनके पैतृक गाँव को ऐतिहासिक पर्यटन और शोध के केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।
नई पीढ़ी को बताया जाए कि स्वतंत्रता केवल 15 अगस्त 1947 को प्राप्त हुई कोई सामान्य उपलब्धि नहीं थी।
इसके पीछे ऐसे हजारों युवाओं का बलिदान था, जिनमें रामफल मंडल जैसे वीर भी शामिल थे।
अब इतिहास सरकार के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा है
रामफल मंडल ने अंग्रेजी हुकूमत से अपने जीवन की भीख नहींमाँगी। उन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
आज स्वतंत्र भारत से उनकी कोई व्यक्तिगत माँग नहीं है।
माँग हमारी है।
माँग समाज की है।
माँग इतिहास की है।
और वह माँग है—सम्मान।
शहीद का सम्मान देना किसी सरकार पर उपकार नहीं है। यह राष्ट्र का अपने शहीद के प्रति नैतिक दायित्व है।
यदि बिहार सरकार 23 अगस्त के अवसर पर रामफल मंडल के सम्मान को लेकर कोई ठोस एवं औपचारिक निर्णय करती है, तो मुख्यमंत्रीसम्राट चौधरीऔर बिहार सरकार की इस पहल की खुले मन से प्रशंसा की जानी चाहिए।
क्योंकि इतिहास में कुछ निर्णय केवल प्रशासनिक आदेश नहीं होते—वे आने वाली पीढ़ियों की स्मृति बन जाते हैं।
अंतिम शब्द
जिस वीर ने उन्नीस वर्ष की उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए फाँसी का फंदा स्वीकार किया, उसके सम्मान का प्रश्न अब और लंबित नहीं रहना चाहिए।
रामफल मंडल को सम्मान देना किसी समुदाय को विशेषाधिकार देना नहीं है।
यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम को पूरा सम्मान देना है।
23 अगस्त को केवल शहादत दिवस न मनाया जाए।
इसेराष्ट्रीय कृतज्ञता, इतिहास के पुनर्स्मरण और नई पीढ़ी के संकल्प दिवसके रूप में स्थापित किया जाए।
रामफल मंडल की शहादत अमर है।
उनका संघर्ष अमर है।
उनका राष्ट्रप्रेम अमर है।
अब आवश्यकता केवल इतनी है किस्वतंत्र भारत की सरकारी स्मृति में भी उनका सम्मान उतना ही अमर हो।
अमर शहीद रामफल मंडल को शत्-शत् नमन। — डॉ. गौतम कुमार, शिक्षाविद् एवं लेखक





