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साइबर ठगों का सब्सक्रिप्शन स्कैम, ऑटो-डेबिट से ठगी का जाल

सब्सक्रिप्शन स्कैम: ‘फ्री-ट्रायल’ के नाम पर ऑटो-डेबिट की नई ठगी

पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ ऑनलाइन सेवाओं की सदस्यता लेना बेहद आसान हुआ है। लेकिन इसी सुविधा के साथ एक खतरनाक प्रवृत्ति भी उभरी है—‘फ्री-ट्रायल’ के नाम पर कार्ड या वॉलेट विवरण लेकर बिना स्पष्ट सहमति के ऑटो-डेबिट चालू कर देना। यह साइबर ठगी, जिसे आम बोलचाल में “सब्सक्रिप्शन स्कैम” कहा जा रहा है, अब Cyber Crime के मामलों में तेजी से दर्ज हो रही है। यह केवल आर्थिक नुकसान का प्रश्न नहीं, बल्कि उपभोक्ता विश्वास और डिजिटल पारदर्शिता की भी परीक्षा है।

समस्या की जड़: ‘मुफ्त’ का भ्रम

इस ठगी की बुनियाद “फ्री-ट्रायल” के आकर्षण पर टिकी होती है। उपभोक्ता किसी ऐप या वेबसाइट पर सात दिन या एक महीने के मुफ्त उपयोग के लिए अपना कार्ड, डेबिट कार्ड, या मोबाइल वॉलेट विवरण साझा कर देते हैं। अधिकांश मामलों में शर्तों (Terms & Conditions) को बेहद छोटे अक्षरों में या भ्रामक तरीके से लिखा जाता है। एक छोटा-सा चेकबॉक्स, जो ऑटो-सब्सक्रिप्शन की सहमति देता है, उपयोगकर्ता की नजर से छूट जाता है।

ट्रायल अवधि समाप्त होते ही सिस्टम स्वचालित रूप से मासिक या साप्ताहिक शुल्क काटना शुरू कर देता है। राशि अक्सर इतनी छोटी होती है कि शुरुआत में ध्यान नहीं जाता। लेकिन यही “छोटी-छोटी कटौतियां” महीनों तक चलती रहती हैं, और जब तक उपभोक्ता बैंक स्टेटमेंट की गहन जांच नहीं करता, नुकसान बढ़ता रहता है।

ठगों की कार्यप्रणाली: तकनीक का दुरुपयोग

इस स्कैम में ठग कई आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं:

  1. डार्क-पैटर्न डिजाइन: ‘Cancel’ बटन को छिपा देना या प्रक्रिया को जटिल बनाना।
  2. WhatsApp/सोशल मीडिया फनल: विज्ञापन या चैट के माध्यम से ऑफर देना और भुगतान लिंक भेजना।
  3. QR और e-Mandate का प्रयोग: भविष्य की आवर्ती (recurring) भुगतान प्रक्रिया सक्रिय करना, विशेषकर UPI या नेट-बैंकिंग के जरिये।
  4. फर्जी सपोर्ट चैनल: शिकायत के लिए दिए गए ईमेल या नंबर काम न करना।
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तकनीकी ढांचा जितना मजबूत हुआ है, उतनी ही परिष्कृत यह धोखाधड़ी भी हो गई है। स्केलेबिलिटी (बड़े पैमाने पर फैलाव) के कारण यह मॉडल ठगों के लिए लाभकारी साबित हो रहा है।

पीड़ितों पर प्रभाव: पैसा ही नहीं, मानसिक शांति भी जाती है

आर्थिक हानि के साथ-साथ इस स्कैम का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी गंभीर है। बार-बार अनधिकृत कटौती देखने से उपभोक्ता घबराहट, असुरक्षा और आत्म-दोष का अनुभव करता है। बैंक में शिकायत दर्ज कराना, विवाद (dispute) प्रक्रिया शुरू करना और रिफंड का इंतजार करना—यह सब समय और ऊर्जा दोनों लेता है।

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कई मामलों में उपभोक्ता को अतिरिक्त बैंक-फीस भी चुकानी पड़ती है। प्रोफेशनल जीवन में भी समय की बर्बादी और तनाव का असर दिखता है।

पहचान के संकेत: सतर्कता ही सुरक्षा

कुछ स्पष्ट संकेत इस प्रकार हैं:

  • बैंक स्टेटमेंट में अज्ञात मर्चेंट के नाम से नियमित छोटी कटौतियां।
  • अस्पष्ट या विदेशी मर्चेंट कोड।
  • ट्रायल समाप्ति की कोई स्पष्ट सूचना न मिलना।
  • अनसब्सक्राइब विकल्प का न मिलना या अत्यधिक जटिल होना।

ऐसे संकेत मिलते ही तुरंत कार्रवाई जरूरी है।

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उपभोक्ता स्तर पर बचाव

सबसे प्रभावी उपाय है—नियमित बैंक स्टेटमेंट की समीक्षा। सप्ताह में एक बार लेन-देन देखना आदत बनानी चाहिए। यदि कोई संदिग्ध ऑटो-डेबिट दिखे, तो तुरंत बैंक या पेमेंट ऐप में जाकर संबंधित ‘मंदेट’ रद्द करें।

जहां तक संभव हो, वर्चुअल कार्ड या एक-बार-उपयोग वाले कार्ड नंबर का इस्तेमाल करें। आधिकारिक ऐप-स्टोर और विश्वसनीय वेबसाइट से ही ऐप डाउनलोड करें। सोशल मीडिया लिंक के जरिये भुगतान से बचें।

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अनधिकृत कटौती की स्थिति में तुरंत बैंक में विवाद दर्ज कराएं और स्थानीय साइबर सेल में शिकायत करें। कई मामलों में National Consumer Helpline जैसे मंच भी सहायता प्रदान करते हैं।

नीतिगत स्तर पर आवश्यक कदम

डिजिटल भुगतान व्यवस्था के नियमन में स्पष्टता और पारदर्शिता अनिवार्य है। Reserve Bank of India द्वारा आवर्ती भुगतान (recurring payments) के लिए पूर्व-अनुमोदन और प्री-नोटिफिकेशन के नियम बनाए गए हैं, लेकिन इनके कड़ाई से पालन की आवश्यकता है। ट्रायल समाप्ति से कम-से-कम 48 घंटे पहले स्पष्ट अलर्ट देना अनिवार्य होना चाहिए।

ऑनलाइन मार्केटप्लेस और ऐप-स्टोर्स को ‘अनसब्सक्राइब’ बटन को स्पष्ट और सुलभ बनाना चाहिए। शिकायत निवारण तंत्र को सरल, तेज और पारदर्शी बनाना समय की मांग है।

निष्कर्ष: सामूहिक जिम्मेदारी

सब्सक्रिप्शन स्कैम डिजिटल अर्थव्यवस्था की उस खामी को उजागर करता है, जहां सुविधा और पारदर्शिता के बीच संतुलन बिगड़ जाता है। व्यक्तिगत सतर्कता, बैंकिंग प्रथाओं की सख्ती और नियामक संस्थाओं की सक्रियता—इन तीनों का समन्वय ही इस समस्या का समाधान है।

डिजिटल युग में सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। नियमित स्टेटमेंट-चेक, वर्चुअल कार्ड का प्रयोग और त्वरित शिकायत—यही इस नए साइबर जाल से बचाव के सबसे प्रभावी हथियार हैं।

N Mandal

Naresh Kumar Mandal, popularly known as N. Mandal, is the founder and editor of Gaam Ghar News. He writes on diverse subjects including entertainment, politics, business, and sports, with a deep interest in the intersection of cinema, politics, and public life. Before founding Gaam Ghar News, he worked with several leading newspapers in Bihar.

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