- भारत में रॉकफेलर फाउंडेशन का ऐतिहासिक हस्तक्षेप
- कृषि, ग्रीन रिवोल्यूशन और ग्रामीण समाज
- बिहार – ऐतिहासिक पिछड़ापन और राजनीतिक चेतना
- बिहार में रॉकफेलर फाउंडेशन और ऊर्जा परियोजनाएँ
- बिहार की राजनीति और विकास का नया ढाँचा
- आलोचनात्मक विश्लेषण
- बिहार के लिए वैकल्पिक रास्ता

बीसवीं और इक्कीसवीं सदी का इतिहास यह बताता है कि विकास केवल आर्थिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि वह गहराई से राजनीतिक, वैचारिक और सत्ता-संबंधी प्रक्रिया है। विशेषकर भारत जैसे उत्तर-औपनिवेशिक समाज में, जहाँ राज्य, समाज और वैश्विक पूँजी के रिश्ते लगातार बदलते रहे हैं। इस संदर्भ में रॉकफेलर फाउंडेशन जैसे वैश्विक परोपकारी संस्थान केवल दानदाता नहीं, बल्कि विकास की दिशा, भाषा और प्राथमिकताएँ तय करने वाले प्रभावशाली अभिनेता रहे हैं।
बिहार, जो लंबे समय से गरीबी, असमानता और राज्य-क्षमता की सीमाओं से जूझता रहा है, इन वैश्विक विकास प्रयोगों का एक प्रमुख क्षेत्र रहा है। यह आलेख भारत में रॉकफेलर फाउंडेशन के ऐतिहासिक प्रभाव, बिहार में उसकी ऊर्जा परियोजनाओं के अनुभव और उससे उत्पन्न राजनीतिक, सामाजिक और लोकतांत्रिक प्रश्नों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
भाग – 1 : भारत में रॉकफेलर फाउंडेशन का ऐतिहासिक हस्तक्षेप
1.1 औपनिवेशिक पृष्ठभूमि और ज्ञान-सत्ता
जब रॉकफेलर फाउंडेशन ने भारत में कदम रखा, तब भारत ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था। औपनिवेशिक शासन का मूल उद्देश्य संसाधनों का दोहन और प्रशासनिक नियंत्रण था। इसी ढाँचे में रॉकफेलर फाउंडेशन ने स्वास्थ्य और शिक्षा को ‘प्रशासनिक दक्षता’ के औज़ार के रूप में देखा।
सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों का उद्देश्य केवल मानवीय नहीं था, बल्कि श्रम-शक्ति को स्वस्थ रखना, महामारी से औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की रक्षा करना और शासन को स्थिर बनाए रखना भी था। इस प्रकार स्वास्थ्य ज्ञान सत्ता का उपकरण बना।
1.2 चिकित्सा शिक्षा और संस्थागत निर्माण
रॉकफेलर फाउंडेशन ने भारत में आधुनिक चिकित्सा शिक्षा और पब्लिक हेल्थ की नींव रखी। कोलकाता स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हाइजीन एंड पब्लिक हेल्थ जैसे संस्थानों ने एक नया ‘विशेषज्ञ वर्ग’ तैयार किया।
यह वर्ग:
अंग्रेज़ी-शिक्षित था
पश्चिमी विज्ञान पर आधारित था
राज्य और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से जुड़ा था
परंतु इस प्रक्रिया में:
आयुर्वेद, यूनानी और लोक-चिकित्सा पद्धतियाँ हाशिये पर चली गईं
स्वास्थ्य को सामाजिक अधिकार की बजाय तकनीकी समस्या माना गया
भाग – 2 : कृषि, ग्रीन रिवोल्यूशन और ग्रामीण समाज
2.1 खाद्य संकट और समाधान का मॉडल
स्वतंत्रता के बाद भारत भुखमरी और खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। रॉकफेलर फाउंडेशन ने इस संकट को तकनीकी समस्या के रूप में देखा—जिसका समाधान उच्च उपज वाले बीज, रासायनिक खाद और सिंचाई था।
2.2 ग्रीन रिवोल्यूशन के प्रभाव
ग्रीन रिवोल्यूशन ने:
उत्पादन बढ़ाया
कुछ क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा दी
लेकिन साथ ही:
छोटे किसानों की लागत बढ़ी
कर्ज़ और आत्मनिर्भरता में कमी आई
पर्यावरणीय संकट गहरा हुआ
यहाँ विकास का अर्थ ‘अधिक उत्पादन’ तक सीमित हो गया, ‘समान वितरण’ तक नहीं।
भाग – 3 : बिहार – ऐतिहासिक पिछड़ापन और राजनीतिक चेतना
3.1 बिहार की संरचनात्मक चुनौतियाँ
बिहार में:
भूमि असमानता
जातिगत श्रेणीकरण
कमजोर औद्योगिक आधार
सीमित राजस्व
इन सबने राज्य की विकास क्षमता को सीमित किया।
3.2 सामाजिक न्याय की राजनीति
बिहार की राजनीति ने मंडल आंदोलन के बाद सामाजिक न्याय को केंद्र में रखा। लेकिन आर्थिक और तकनीकी विकास इस राजनीति के हाशिये पर रहा। यही खाली स्थान वैश्विक विकास एजेंसियों के लिए अवसर बना।

भाग – 4 : बिहार में रॉकफेलर फाउंडेशन और ऊर्जा परियोजनाएँ
4.1 ऊर्जा संकट का राजनीतिक अर्थ
बिहार में बिजली केवल सुविधा नहीं, सत्ता का प्रतीक रही है। चुनाव, सरकार और शासन—सब बिजली से जुड़े रहे हैं।
4.2 Smart Power India : अवधारणा और प्रयोग
Smart Power India का उद्देश्य था:
ग्रामीण सोलर माइक्रोग्रिड
निजी निवेश
लागत वसूली आधारित मॉडल
4.3 ज़मीनी अनुभव
कुछ गाँवों में:
शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर हुईं
छोटे व्यवसाय शुरू हुए
लेकिन:
बिजली महंगी रही
गरीब उपभोक्ता बाहर हुए
सरकारी ग्रिड आने पर परियोजनाएँ बंद हो गईं
भाग – 5 : बिहार की राजनीति और विकास का नया ढाँचा
5.1 राज्य की भूमिका में बदलाव
राज्य अब:
नीति निर्माता कम
परियोजना समन्वयक अधिक
5.2 पंचायत और स्थानीय लोकतंत्र
इन परियोजनाओं में पंचायत की भूमिका सीमित रही। इससे विकेंद्रीकरण की भावना कमजोर हुई।
भाग – 6 : आलोचनात्मक विश्लेषण
6.1 परोपकार बनाम लोकतंत्र
बड़े फाउंडेशन विकास की दिशा तय करते हैं, लेकिन जनता की भागीदारी सीमित रहती है।
6.2 ज्ञान, डेटा और सत्ता
डेटा आधारित नीति अक्सर स्थानीय अनुभव को नज़रअंदाज़ करती है।
भाग – 7 : बिहार के लिए वैकल्पिक रास्ता
राज्य-नेतृत्व वाला विकास
पंचायत आधारित योजना
सार्वभौमिक और सस्ती ऊर्जा
स्थानीय ज्ञान का सम्मान
रॉकफेलर फाउंडेशन का हस्तक्षेप बिहार में न तो पूर्णतः नकारात्मक है, न ही पूर्ण समाधान। असली प्रश्न है—निर्णय किसके हाथ में है।
यदि विकास जनता तय नहीं करेगी, तो वह टिकाऊ नहीं होगा।



