भारत के उत्तर–पूर्वी भाग में बसा मिथिला क्षेत्र केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सभ्यता है। यह बिहार के उत्तरी जिलों—दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सुपौल, मधेपुरा, अररिया और पूर्णिया—तथा नेपाल के तराई क्षेत्र तक फैला हुआ है। कोसी, कमला, बलान, बागमती और गंडक जैसी नदियाँ मिथिला की जीवनरेखा हैं। यहाँ की मिट्टी में उर्वरता है, लेकिन बाढ़ और सूखे की मार भी है। यही संघर्ष मिथिला के लोगों के स्वभाव में धैर्य, श्रम और सृजनशीलता भरता है।
मिथिला का प्राचीन इतिहास
मिथिला का उल्लेख वेदों, उपनिषदों और रामायण में मिलता है। यह राजा जनक की भूमि थी—वह जनक जिनकी पुत्री सीता थीं। मिथिला को विदेह राज्य भी कहा जाता था, जहाँ ब्रह्मज्ञान और आत्मतत्त्व पर गंभीर विमर्श हुआ करता था। अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य और गार्गी जैसी विभूतियाँ इसी भूमि से जुड़ी हैं। मिथिला केवल राजसत्ता का केंद्र नहीं था, बल्कि ज्ञान, तर्क और दर्शन का भी बड़ा केंद्र था।
मिथिला की भाषा: मैथिली
मैथिली भाषा मिथिला की आत्मा है। यह केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि एक समृद्ध साहित्यिक परंपरा की वाहक है। विद्यापति, उमापति उपाध्याय, चंदेश्वर ठाकुर जैसे कवियों ने मैथिली को साहित्यिक ऊँचाइयों तक पहुँचाया। मैथिली की मिठास, करुणा और प्रेम–रस आज भी गीतों, लोककथाओं और कविताओं में जीवित है। आधुनिक समय में भी मैथिली साहित्य निरंतर आगे बढ़ रहा है।
मिथिला की लोकसंस्कृति
मिथिला की लोकसंस्कृति बहुत समृद्ध है। यहाँ के पर्व–त्योहार जैसे छठ, सामा–चकेवा, जूड़–शीतल, कोजागरा और विवाह परंपराएँ अद्वितीय हैं। सामा–चकेवा में भाई–बहन के प्रेम की झलक मिलती है, तो छठ में प्रकृति और सूर्य के प्रति कृतज्ञता का भाव दिखाई देता है। मिथिला की महिलाएँ गीतों के माध्यम से अपने दुःख–सुख, प्रेम–विरह और सामाजिक स्थितियों को व्यक्त करती हैं।
मिथिला पेंटिंग (मधुबनी कला)
मिथिला पेंटिंग, जिसे मधुबनी कला भी कहते हैं, विश्वप्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत घर की दीवारों पर पूजा–पाठ और शुभ अवसरों के लिए चित्र बनाने से हुई थी। इसमें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता था। राम–सीता, कृष्ण–राधा, प्रकृति, पशु–पक्षी और ज्यामितीय आकृतियाँ इसकी विशेषता हैं। आज यह कला वैश्विक मंच पर मिथिला की पहचान बन चुकी है।
मिथिला का सामाजिक ढांचा
मिथिला समाज में परिवार, रिश्ते और परंपराओं का विशेष महत्व है। यहाँ संयुक्त परिवार की परंपरा रही है। बुजुर्गों का सम्मान, गुरु–शिष्य परंपरा और स्त्रियों की भूमिका समाज के केंद्र में रही है। मिथिला की महिलाएँ गृहस्थी के साथ–साथ कला, गीत और परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
मिथिला का कृषि और जीवनशैली
मिथिला की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित है। धान, गेहूँ, मक्का, दलहन और सब्जियाँ यहाँ की प्रमुख फसलें हैं। कोसी और बागमती की बाढ़ भूमि को उपजाऊ बनाती है, लेकिन विनाश भी लाती है। किसान मौसम के साथ जीते हैं। मिट्टी से जुड़ा जीवन, सरल भोजन और सामूहिक श्रम मिथिला की पहचान है।
मिथिला के लोकगीत और संगीत
मिथिला का संगीत लोकजीवन का दर्पण है। विवाह गीत, सोहर, समदाउन, चैता और फगुआ यहाँ के जीवन को संगीत में पिरोते हैं। मैथिली गीतों में प्रेम, विरह, माँ–बेटी का संवाद, भाई–बहन का स्नेह सब कुछ मिलता है। यह संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भावनात्मक अभिव्यक्ति है।
मिथिला की चुनौतियाँ
आज मिथिला अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है—बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा की कमी, बाढ़, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव। युवा रोज़गार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, पंजाब और विदेशों तक जाते हैं। गाँव खाली होते जा रहे हैं। परंतु इसके बावजूद मिथिला की आत्मा अभी जीवित है।
आधुनिक मिथिला और भविष्य
आज मिथिला में शिक्षा, तकनीक और मीडिया के माध्यम से नई चेतना आ रही है। मैथिली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिला है। युवा अपने क्षेत्र, भाषा और संस्कृति को लेकर जागरूक हो रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मिथिला की आवाज़ तेज हो रही है।
मिथिला की स्त्री शक्ति
मिथिला की महिलाएँ केवल घर तक सीमित नहीं हैं। वे चित्रकला, साहित्य, शिक्षा और समाज सेवा में आगे आ रही हैं। मधुबनी पेंटिंग की पहचान विश्व में महिलाओं के कारण ही बनी। वे परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु हैं।
मिथिला: आत्मा की भूमि
मिथिला केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि एक विचार है—जहाँ त्याग, ज्ञान, प्रेम और संघर्ष एक साथ चलते हैं। यहाँ की मिट्टी में इतिहास है, हवा में गीत हैं और लोगों के दिल में संवेदना।
मिथिला भारत की उन सांस्कृतिक धरोहरों में से एक है, जो समय के साथ बदली जरूर है, लेकिन अपनी आत्मा नहीं खोई है। यहाँ की भाषा, कला, लोकजीवन और दर्शन हमें सिखाते हैं कि कैसे कठिन परिस्थितियों में भी सृजन और सौंदर्य पैदा किया जा सकता है। मिथिला केवल अतीत की कहानी नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं से भरी एक जीवंत संस्कृति है।




