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दो पश्चिमी विक्षोभ: पहाड़ों में बर्फ, मैदानों में ठंड — समाज के लिए चेतावनी

दो पश्चिमी विक्षोभ, पहाड़ों की बर्फ और मैदानों की ठिठुरन: यह केवल ठंड नहीं, एक सामाजिक चेतावनी है

जनवरी 2026 की ठंड केवल मौसम का मामला नहीं रह गई है। दो सक्रिय पश्चिमी विक्षोभों और तेज पश्चिमी जेट स्ट्रीम के कारण उत्तर भारत आज बर्फ, पाले, कोहरे और शीतलहर की गिरफ्त में है। पहाड़ों में तापमान माइनस में जा चुका है और मैदानों में जनजीवन ठहर-सा गया है। यह स्थिति हमें केवल ठंड से बचने की नहीं, बल्कि सोचने की भी जरूरत बताती है।

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उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी ने सामान्य जीवन को बाधित कर दिया है। ताबो, कुकुमसेरी, गुलमर्ग जैसे इलाकों में तापमान माइनस 10 डिग्री तक पहुंच गया है। वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे मैदानी इलाकों में घना और बहुत घना कोहरा लोगों की दिनचर्या पर असर डाल रहा है।

यह ठंड किसे सबसे ज़्यादा मारती है?

हर साल की तरह इस बार भी ठंड सबसे ज्यादा असर उन पर डाल रही है जो सबसे कमजोर हैं — गरीब, बेघर, दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, खेत मजदूर, बुजुर्ग और छोटे बच्चे। जिनके पास छत है, हीटर है, कंबल है — उनके लिए ठंड एक असुविधा है। लेकिन जिनके पास ये सब नहीं, उनके लिए यह ठंड एक संकट है।

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रैन बसेरों की कमी, अस्पतालों में बढ़ते मरीज, फसलों पर पाले का असर और सड़कों पर बढ़ती दुर्घटनाएं — ये सब इस मौसम की अदृश्य कीमतें हैं, जिनका भुगतान समाज का कमजोर तबका करता है।

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मौसम अब केवल मौसम नहीं रहा

बार-बार सक्रिय हो रहे पश्चिमी विक्षोभ, असामान्य तापमान उतार-चढ़ाव और चरम मौसमी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि मौसम का स्वभाव बदल रहा है। यह केवल प्राकृतिक चक्र नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का सामाजिक चेहरा है।

जब ठंड ज़्यादा होती है, तो स्कूल बंद होते हैं। जब कोहरा घना होता है, तो ट्रेनें रुकती हैं। जब पाला पड़ता है, तो फसलें मरती हैं। यानी मौसम सीधा हमारे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और भोजन को प्रभावित करता है।

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प्रशासन की जिम्मेदारी केवल चेतावनी नहीं

मौसम विभाग का काम चेतावनी देना है, लेकिन प्रशासन का काम है सुरक्षा देना। केवल “अलर्ट जारी” कर देना काफी नहीं है। ज़रूरत है —

  • पर्याप्त रैन बसेरों की
  • गरीबों के लिए कंबल वितरण की
  • अस्पतालों में अतिरिक्त व्यवस्था की
  • किसानों के लिए फसल नुकसान के आंकलन और मुआवजे की
  • ट्रैफिक और रेल सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध की

ठंड के समय संवेदनशील शासन ही मानवीय शासन होता है।

अंत में

यह ठंड हमें केवल कांपने नहीं, सोचने पर मजबूर कर रही है। कि क्या हमारा समाज मौसम के साथ बदल रहा है? क्या हमारी व्यवस्था कमजोरों के लिए तैयार है? क्या हम प्रकृति के संदेशों को सुन रहे हैं?

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दो पश्चिमी विक्षोभों से उपजी यह कड़ाके की ठंड हमें याद दिलाती है कि प्रकृति का प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है — वे सवाल भी लेकर आए हैं। सवाल हमारी तैयारी पर, हमारी प्राथमिकताओं पर और हमारे मानवीय संवेदन पर। अगर हम इन सवालों को सुनेंगे नहीं, तो अगली ठंड और ज़्यादा तीखी होगी — सिर्फ मौसम में नहीं, समाज में भी।

N Mandal

Naresh Kumar Mandal, popularly known as N. Mandal, is the founder and editor of Gaam Ghar News. He writes on diverse subjects including entertainment, politics, business, and sports, with a deep interest in the intersection of cinema, politics, and public life. Before founding Gaam Ghar News, he worked with several leading newspapers in Bihar.

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