भारत जैसे विशाल देश में जल, जंगल और ज़मीन केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं बल्कि भारत की जीवनरेखा, संस्कृति और सभ्यता के मूल आधार स्तंभ हैं। इन्हीं संसाधनों आधार पर ही हमारा परिवार पलता है, हमारा समाज बनता है, हमारे देश की अर्थव्यवस्था चलती है यहाँ तक कि देश की राजनीति दिशा और दशा तय करती है। दुर्भाग्यवश आज विकास के नाम पर इन संसाधनों का जिस प्रकार अंधाधुंध दोहन हो रहा है यह देश के भविष्य के लिए गंभीर खतरे की ओर संकेत कर रही है। ऐसे समय में यह आवश्यक हो गया है कि जल, जंगल और जमीन के दोहन पर सख्त रोक लगे और प्राकृति संसाधन के संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता की श्रेणी में रखा जाय।
परिवार और समाज पर प्रभाव
प्राकृतिक संसाधनों के संकट का पहला और सीधा असर परिवार पर पड़ता है। जल संकट के कारण महिलाओं और बच्चों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और लंबी पंक्ति में लगनी पड़ती है जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान प्रभावित होता है। उपजाऊ जमीन के क्षरण से किसानों की आय घटती है, कर्ज बढ़ता है और परिवारों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। जंगलों के विनाश से आदिवासी और ग्रामीण समुदाय के व्यक्ति की अपनी आजीविका, संस्कृति और उनकी पहचान खोती जा रही हैं। इससे देश के सामाजिक असंतुलन, गरीबी और संघर्ष बढ़ता जा रहा है जो पूरे समाज को कमजोर करता है।
हमारे देश की आर्थिक संरचना पर संकट जैसे भारत की अर्थव्यवस्था कृषि, जल संसाधनों और वनों पर आधारित है। जल का अत्यधिक दोहन के कारण खेती को अस्थिर बना रहा है जिससे खाद्यान्न उत्पादन घटता और महँगाई बढ़ती है। जमीन का अनियंत्रित औद्योगिक उपयोग से अल्पकालिक मुनाफा भले देता हो लेकिन दीर्घकाल में भूमि को बंजर बना देता है। जंगलों की कटाई से जैव विविधता नष्ट होती है और प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ती हैं जिनका आर्थिक बोझ अंततः आम नागरिक को ही भरना पड़ता है। स्पष्ट है कि संसाधनों का संरक्षण ही सशक्त और टिकाऊ अर्थव्यवस्था की कुंजी है।
आज सभी राजनीति करने वाले व्यक्तियों और नीति वाले व्यक्तियों की जिम्मेदारी है कि जल, जंगल और जमीन का सवाल केवल पर्यावरण का कहकर नहीं छोड़ा जाय अपितु इस पर इच्छाशक्ति के साथ प्राकृति संरक्षण के उददेश्य से मिशन मोड में काम किया जाये। अक्सर विकास और संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी मान लिया जाता है जबकि सच यह है कि बिना संरक्षण के विकास न तो टिकाऊ है न ही संभव हैं। इसलिए राजनीति करने वाले का दायित्व है कि वह अल्पकालिक लाभ और वोट बैंक की सोच से ऊपर उठकर कड़े कानून,दीर्घकालिक नीतियाँ और पारदर्शी प्रशासन बनाए।
स्थानीय समुदायों की भागीदारी
सुनिश्चित करें क्योंकि स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना प्राकृति संसाधन का संरक्षण संभव नहीं है। इसलिए आज आवश्यकता है कि जल, जंगल और जमीन के अंधाधुंध दोहन पर तत्काल रोक लगे। परिवार स्तर पर जल बचत, समाज स्तर पर सामुदायिक संरक्षण, आर्थिक नीतियों में सतत विकास और राजनीति में पर्यावरणीय जवाबदेही सुनिश्चित हो ताकि इन सभी का समन्वय हो सके।
यदि हम सब ने मिलकर इन प्राकृतिक संसाधनों को नहीं बचाया तो हो सकता है कि कल का भारत संसाधनों से नहीं बल्कि समस्याओं से भर जाएगा। इसलिए जल, जंगल और जमीन का संरक्षण ही देश का सच्चा विकास और सच्ची देशभक्ति साबित होगी।




