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सोशल मीडिया की नेगेटिविटी: दिमाग के लिए अदृश्य खतरा

तनाव का स्थायी माहौल - डूमस्क्रॉलिंग का जाल - रेज बेटिंग और भावनात्मक उकसावा

सुबह सुबह आंख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन पर उंगलियां चलने लगती हैं। कुछ ही मिनटों में हम राजनीतिक विवाद, हादसों की तस्वीरें, तीखी बहसें और नफरत भरे कमेंट्स देख चुके होते हैं। यह सिलसिला दिन भर जारी रहता है। हमें लगता है कि हम सिर्फ जानकारी ले रहे हैं, लेकिन सच यह है कि हमारा दिमाग इसे लगातार “खतरे” के संकेत की तरह दर्ज कर रहा होता है। सोशल मीडिया की बढ़ती नेगेटिविटी आज मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है।

तनाव का स्थायी माहौल

मानव मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से नकारात्मक सूचनाओं पर अधिक प्रतिक्रिया देता है। यह हमारी जैविक संरचना का हिस्सा है, जो हमें खतरे से बचाने के लिए विकसित हुई थी। जब हम हिंसा, आक्रोश या दुख भरी खबरें बार-बार देखते हैं, तो शरीर में कोर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ने लगता है। नतीजतन हम बिना किसी वास्तविक खतरे के भी तनाव, घबराहट और बेचैनी महसूस करने लगते हैं। लंबे समय तक ऐसा होने पर एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं जन्म ले सकती हैं।

डूमस्क्रॉलिंग का जाल

आज “डूमस्क्रॉलिंग” एक आम व्यवहार बन चुका है। बुरी खबरें पढ़ते-पढ़ते हम रुकना चाहते हैं, लेकिन रुक नहीं पाते। एल्गोरिद्म हमें वही दिखाते रहते हैं, जिस पर हमारी प्रतिक्रिया ज्यादा होती है — और अक्सर वह नकारात्मक कंटेंट होता है। यह एक अंतहीन चक्र है। देर रात तक स्क्रीन देखते रहना नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। नींद की कमी सीधे तौर पर मानसिक थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी से जुड़ी होती है।

तुलना का दबाव और हीन भावना

सोशल मीडिया पर दिखने वाली “परफेक्ट” जिंदगी भी मानसिक दबाव का कारण बनती है। लोग अपनी जिंदगी का चमकदार पक्ष दिखाते हैं — फिल्टर लगी तस्वीरें, उपलब्धियां, खुशहाल रिश्ते। हम अनजाने में अपनी रोजमर्रा की वास्तविक जिंदगी की तुलना इन सजाए हुए पलों से करने लगते हैं। यह तुलना धीरे-धीरे आत्मसम्मान को चोट पहुंचाती है। लो-सेल्फ एस्टीम, असंतोष और ईर्ष्या की भावना बढ़ती है, जो आगे चलकर अवसाद का रूप ले सकती है।

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रेज बेटिंग और भावनात्मक उकसावा

आजकल सोशल मीडिया पर “रेज बेटिंग” का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। जानबूझकर ऐसा कंटेंट बनाया जाता है जो लोगों को गुस्सा दिलाए, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा कमेंट और शेयर करें। एंगेजमेंट बढ़ाने की इस होड़ में दर्शकों की भावनाओं का इस्तेमाल किया जाता है। लगातार गुस्सा और उत्तेजना महसूस करना न केवल मानसिक शांति छीनता है, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है — जैसे ब्लड प्रेशर बढ़ना और तनाव का स्थायी स्तर ऊंचा रहना।

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सहानुभूति का क्षरण

हर दिन बड़ी मात्रा में हिंसा और दुखद घटनाएं देखने से दिमाग सुन्न होने लगता है। शुरुआत में जो खबर हमें विचलित करती थी, वही धीरे-धीरे सामान्य लगने लगती है। यह संवेदनहीनता समाज के लिए भी खतरनाक संकेत है। सहानुभूति कम होने पर रिश्तों में दूरी बढ़ती है और सामाजिक जुड़ाव कमजोर पड़ता है।

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समाधान क्या है?

सोशल मीडिया पूरी तरह छोड़ देना व्यावहारिक समाधान नहीं है, क्योंकि यह आज सूचना और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। लेकिन डिजिटल अनुशासन जरूरी है। स्क्रीन टाइम तय करना, सोने से पहले फोन से दूरी बनाना, विश्वसनीय और सकारात्मक कंटेंट को प्राथमिकता देना, तथा समय-समय पर “डिजिटल डिटॉक्स” करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

सबसे महत्वपूर्ण है जागरूकता। यह समझना कि हर पोस्ट, हर बहस और हर खबर पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं है। हमें तय करना होगा कि हम अपने दिमाग को क्या खिला रहे हैं। आखिरकार, मानसिक शांति भी उतनी ही जरूरी है जितनी सूचना। सोशल मीडिया का उपयोग संतुलन और सजगता के साथ किया जाए, तो वही प्लेटफॉर्म ज्ञान और सकारात्मक बदलाव का साधन भी बन सकता है।

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