जयपुर/भरतपुर : कहते हैं कि कठिनाइयाँ इंसान को तोड़ भी देती हैं और गढ़ भी देती हैं। राजस्थान के झालावाड़ जिले की सुशीला देवी (Sushila Devi) इस कहावत को सच साबित करने वाली जीवंत मिसाल हैं। रद्दी अख़बार की कतरनों से पर्स, सगुन लिफाफे और कलात्मक घरेलू सामग्री बनाने वाली यह महिला आज न केवल अपने परिवार की नाव पार लगा रही है, बल्कि 50 से अधिक महिलाओं के समूह को आत्मनिर्भर बनाकर समाज में आशा और साहस का संदेश भी दे रही है। उनके हाथों से बना सामान आज अमेरिका तक पहुँच रहा है और हर महीने लाखों की कमाई का जरिया बन रहा है।
17 साल पहले की त्रासदी और संघर्ष का आरंभ
सुशीला देवी का सफर आसान नहीं था। करीब 17 साल पहले उनके पति का अचानक निधन हो गया। पाँच छोटी संतानें, घर की टूटी छत, बरसात में टपकते पानी की बूंदें और आर्थिक तंगी का पहाड़—इन सबके बीच वे अकेली खड़ी थीं। समाज की परतों में छिपी बेबसी और असहायता ने उनकी राह और कठिन बना दी।
लेकिन सुशीला देवी ने अपने मनोबल को गिरने नहीं दिया। उन्होंने ठान लिया कि बच्चों को बेहतर भविष्य देना है, चाहे रास्ता कितना ही मुश्किल क्यों न हो। इसी दृढ़ता ने उन्हें एक नई दिशा दिखाई।
ट्रेनिंग से आत्मनिर्भरता की ओर पहला कदम
उन्होंने सबसे पहले हैंडलूम की ट्रेनिंग ली, फिर सिलाई-कढ़ाई और ब्लॉक प्रिंटिंग का कौशल सीखा। धीरे-धीरे वे कपड़े बुनने और डिजाइनिंग का काम करने लगीं।
लेकिन इन सबके बीच एक दिन उनके मन में एक अलग ही विचार आया—
क्यों न फेंके हुए अख़बार को धागे की तरह इस्तेमाल किया जाए?
यह प्रयोग नया था, जोखिम भरा था, लेकिन कोशिश करने का जुनून था। उन्होंने अख़बार की पतली कतरनें काटीं और धागे के साथ मिलाकर हैंडलूम में बुनने लगीं। पहली कोशिश सफल रही। ये कारीगरी न केवल खूबसूरत दिखी, बल्कि टिकाऊ भी साबित हुई।
सुशीला देवी को एहसास हुआ कि यह हुनर उनके जीवन को नई दिशा दे सकता है।
रद्दी अख़बार बना रोजगार का आधार
आज सुशीला देवी रद्दी अख़बार की कतरनों को धागों के साथ बुनकर अनोखे उत्पाद बना रही हैं—
- पर्स
- क्लच
- सगुन/गिफ्ट लिफाफे
- पोटली बैग
- सजावटी चटाइयाँ
- टेबल रनर
- वॉल हैंगिंग
ये सामान देखने में आकर्षक और उपयोग में टिकाऊ होता है। अख़बार से तैयार सामग्री को हल्दी, मेहंदी, इंडिगो और फूलों से बनी प्राकृतिक डाई से रंगा जाता है, जिससे प्रोडक्ट को एक अनोखी कलात्मक पहचान मिलती है।
अमेरिका तक पहुँचा हुनर, हर महीने 5–6 लाख की सप्लाई
स्थानीय मेलों और प्रदर्शनियों में उनकी कलाकारी की चर्चा होने लगी। धीरे-धीरे उनके काम की गूँज सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तक पहुँची। फिर एक दिन उन्हें अमेरिका से बड़े ऑर्डर मिलने शुरू हुए।
आज उनकी यूनिट से हर महीने लगभग 5 से 6 लाख रुपये का सामान अमेरिका सहित कई राज्यों में सप्लाई होता है।
उनके ग्राहक बताते हैं कि सुशीला देवी द्वारा तैयार किए गए उत्पाद पर्यावरण-हितैषी, टिकाऊ और बेहद आकर्षक होते हैं, इसलिए विदेशों में भी इनकी अच्छी मांग है।
50 महिलाओं की ‘लीडर’ बनी सुशीला देवी
सफलता के बाद सुशीला देवी ने केवल खुद तक यह काम सीमित नहीं रखा।
उन्होंने आसपास की जरूरतमंद महिलाओं को इकट्ठा किया, उन्हें ट्रेनिंग दी और अपने यूनिट में काम पर लगाया।
आज वे 50 से अधिक महिलाओं के समूह की नेता हैं, जिन्हें उन्होंने आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना दिया है।
इन महिलाओं में विधवाएँ, श्रमिक परिवारों की महिलाएँ, स्कूल छोड़ चुकी लड़कियाँ और आर्थिक तंगी से जूझ रही गृहिणियाँ शामिल हैं। सुशीला देवी बताती हैं —
“जब मैं संघर्ष कर सकती हूँ, तो क्यों न दूसरी महिलाओं को भी अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करूँ?”
बेबसी से आत्मगौरव तक—एक प्रेरक यात्रा
कभी जिन हाथों में संघर्ष और बेबसी थी, आज वही हाथ कला, आत्मगौरव और समृद्धि की कहानी लिख रहे हैं।
सुशीला देवी की यह यात्रा केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि—
- अगर मन में हिम्मत हो,
- हाथों में कौशल हो,
- और बदलाव की ललक हो,
तो कोई भी व्यक्ति अपनी नियति बदल सकता है।
पर्यावरण संरक्षण में भी बड़ा योगदान
जहाँ प्लास्टिक और फैक्ट्री के उत्पाद पर्यावरण पर बोझ बढ़ा रहे हैं, वहीं सुशीला देवी का कार्य पूरी तरह से इको-फ्रेंडली है।
- रद्दी अख़बार का पुनः उपयोग
- नेचुरल रंग
- हाथ से बनावट
- कोई मशीन या प्रदूषण नहीं
उनके उत्पाद ‘ग्रीन क्राफ्ट’ की श्रेणी में आते हैं और यह भविष्य में भी रोजगार और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक सेतु का काम करेंगे।
सुशीला देवी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं—
दर्द से शुरुआत, संघर्ष से जंग और हुनर से जीत।
आज वे अपने परिवार के साथ-साथ 50 महिलाओं के जीवन को नए रास्ते दिखा रही हैं। उनकी यह अद्भुत यात्रा राजस्थान ही नहीं, पूरे देश के लिए प्रेरणा है।




