बिहार की राजनीतिक और सामाजिक परत पर एक युग का अंत माना जा रहा है क्योंकि परिचित नेता और कुर्मी चेतना महारैली के संयोजक सतीश कुमार का निधन हो गया है। उनके निधन की खबर मिलते ही राज्य भर में दुख की लहर दौड़ गई और कई नेताओं, कार्यकर्ताओं तथा सामाजिक संगठनों ने गहरी संवेदना प्रकट की।
निधन के बाद पटना स्थित उनके आवास पर राजनीतिक हस्तियों का आना-जाना लगा हुआ था। मुख्यमंत्री के पुत्र निशांत कुमार विशेष रूप से उनके परिवार से मिलने के लिए कंकड़बाग पहुँचे और उन्होंने श्रद्धा सुमन अर्पित कर परिजनों से शोक प्रकट किया। निशांत ने कहा कि सतीश कुमार का योगदान बिहार के सामाजिक समीकरण बदलने में ऐतिहासिक रहेगा।
सतीश कुमार की राजनीतिक पहचान 1994 में आयोजित विशाल कुर्मी चेतना महारैली के बाद और मजबूत हुई थी। यह रैली गांधी मैदान में आयोजित हुई थी और तब इसने कुर्मी, कोइरी तथा अतिपिछड़ा समाज के राजनीतिक उदय को मूर्त रूप दिया। उस समय यह आयोजन सामाजिक चेतना को जगाने और पिछड़े वर्गों के अधिकारों के लिए संगठित राजनीति का प्रतीक बन गया। रैली के बाद बिहार के राजनीतिक समीकरणों में स्थायी बदलाव देखे गए।
वह मूलतः Barbigha (शेखपुरा) के सर्वा गांव के रहने वाले थे और 1948 में जन्मे। अपने सक्रिय राजनीतिक जीवन में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष किया—कभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर विधानसभा पहुंचे और बाद में समता पार्टी के साथ भी जुड़े। लोकसभा के चुनाव भी लड़ने वाले वे लोक जनशक्ति पार्टी से भी प्रतिस्पर्धा कर चुके थे, जिससे उनके जनाधार की गहराई का अंदाज़ा लगता है।
उनका राजनीतिक व्यक्तित्व सिद्धांतवादी और जुझारू माना जाता था। सामाजिक न्याय, भूमिहीनों व पिछड़ों के अधिकारों की आवाज उठाने में वे सदैव अग्रणी रहे और उनके काम ने कई पीढ़ियों को प्रेरित किया। ऐसे में उनके निधन से न केवल उनके अनुयायियों बल्कि पूरे राज्य के उन वर्गों को अपूरणीय क्षति मानी जा रही है जो उनका नेतृत्व मानते थे।
उनके अंतिम संस्कार और श्रद्धसभा की व्यवस्थाओं के संबंध में पारिवारिक और राजनीतिक परंपरा के अनुरूप कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। शोक व्यक्त करने वालों में कांग्रेस, वाम व अन्य स्थानीय संगठन प्रमुख थे, जिन्होंने कहा कि सतीश कुमार का योगदान लंबे समय तक याद रखा जाएगा।




