जोगेंद्र नाथ मंडल जयंती: संविधान से अल्पसंख्यक अधिकारों तक प्रेरक संघर्ष
जोगेंद्रनाथ मंडल जयंती: संविधान निर्माण से लेकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों तक, एक ऐतिहासिक संघर्ष की गाथा
आज महाप्राण जोगेंद्रनाथ मंडल (योगेन्द्र नाथ मंडल) की जयंती है। 29 जनवरी 1904 को जन्मे जोगेंद्रनाथ मंडल (Jogendra Nath Mandal) भारतीय इतिहास के उन चुनिंदा नेताओं में रहे हैं, जिनकी भूमिका न केवल स्वतंत्रता आंदोलन में बल्कि स्वतंत्र भारत और पाकिस्तान – दोनों के प्रारंभिक राजनीतिक ढाँचे के निर्माण में भी महत्वपूर्ण रही। वे एक ऐसे दलित नेता थे जिन्होंने सत्ता, धर्म और राष्ट्रवाद की राजनीति के बीच फँसे हुए समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के लिए जीवन भर संघर्ष किया।
आज उनकी जयंती पर देशभर में संगोष्ठियाँ, श्रद्धांजलि सभाएँ और विचार गोष्ठियाँ आयोजित की जा रही हैं। सामाजिक संगठनों, दलित आंदोलनों और प्रबुद्ध वर्ग के बीच उन्हें संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर के निकट सहयोगी और सामाजिक न्याय के एक दृढ़ योद्धा के रूप में याद किया जा रहा है।
बचपन और शिक्षा: हाशिये से नेतृत्व तक
जोगेंद्रनाथ मंडल का जन्म तत्कालीन ब्रिटिश भारत की बंगाल प्रेसीडेंसी के बारिसल जिले में धानुक समुदाय में हुआ था। यह वही समाज था जिसे सदियों से जातिगत भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक शोषण का सामना करना पड़ा और आज भी करना पड़ रहा है। मंडल का बचपन संघर्षों में बीता, लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों को अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा में ही असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया। पढ़ाई में हमेशा प्रथम श्रेणी में रहे। 1929 में स्नातक और 1934 में विधि की डिग्री पूरी की। उनके पास वकालत करके आरामदायक जीवन जीने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया। उन्होंने समाज के शोषित-वंचित वर्गों के लिए संघर्ष को ही अपना जीवन-ध्येय बना लिया।
राजनीति में प्रवेश: करियर नहीं, कर्तव्य
1937 के बंगाल प्रांतीय विधानसभा चुनावों में मंडल ने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में भाग लिया। उन्होंने कांग्रेस के प्रभावशाली नेता को पराजित कर यह साबित कर दिया कि दलित समाज केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि नेतृत्व देने में भी सक्षम है।
उनकी यह जीत सिर्फ एक सीट नहीं थी, बल्कि एक संदेश था — कि अब हाशिये पर खड़ा समाज अपनी आवाज़ खुद उठाएगा।
इस दौर में वे सुभाष चंद्र बोस और शरत चंद्र बोस जैसे राष्ट्रवादी नेताओं से प्रभावित हुए। लेकिन उनकी राजनीति का केंद्र हमेशा सामाजिक न्याय रहा।
मुस्लिम लीग से गठबंधन और नई राजनीति
1940 के दशक में जब सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस से निष्कासित किया गया, तब मंडल ने मुस्लिम लीग के साथ रणनीतिक गठबंधन किया। उनका मानना था कि दलित और मुसलमान दोनों ही उच्च जातीय प्रभुत्व की राजनीति के शिकार हैं।
उन्होंने हुसैन शहीद सुहरावर्दी के मंत्रिमंडल में मंत्री पद संभाला। यह गठबंधन कई लोगों को असहज करता था, लेकिन मंडल का तर्क स्पष्ट था — राजनीति में गठबंधन सत्ता के लिए नहीं, बल्कि हाशिये के समाज की सुरक्षा के लिए होना चाहिए।

डॉ. अंबेडकर और मंडल: संविधान की रीढ़
इतिहास में जोगेंद्रनाथ मंडल की सबसे बड़ी भूमिका यह रही कि उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान सभा में पहुँचाने में निर्णायक योगदान दिया।
1946 में जब अंबेडकर बॉम्बे से चुनाव हार गए, तब मंडल ने बंगाल से उन्हें निर्वाचित करवाया। इसके बाद संविधान निर्माण के दौरान अंबेडकर और मंडल के बीच लगातार संवाद होता रहा।
इतिहासकार मानते हैं कि यदि मंडल ने अंबेडकर को संविधान सभा में नहीं पहुँचाया होता, तो भारत का संविधान वैसा नहीं होता जैसा आज है।
अंतरिम सरकार और विधि मंत्री
1946 में जब मुस्लिम लीग भारत की अंतरिम सरकार में शामिल हुई, तो मोहम्मद अली जिन्ना ने मंडल को अपने पाँच प्रतिनिधियों में से एक बनाया। ब्रिटिश सम्राट किंग जॉर्ज VI द्वारा नियुक्त मंडल ने भारत सरकार में विधि मंत्रालय का कार्यभार संभाला।
वे स्वतंत्र भारत की अंतरिम सरकार में पहले विधि मंत्रियों में से एक बने। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रमंडल और कश्मीर मामलों का भी कार्यभार संभाला।
बंगाल विभाजन का विरोध
1947 में जब बंगाल के विभाजन की योजना बनी, तो मंडल ने इसका पुरजोर विरोध किया। उनका तर्क था कि विभाजन के बाद दलित समाज दोहरी हाशिए पर चला जाएगा — एक तरफ़ हिंदू बहुसंख्यक प्रभुत्व और दूसरी तरफ़ धार्मिक राजनीति।
हालाँकि परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि वे पूर्वी पाकिस्तान में रहकर दलितों और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए तैयार हो गए।
पाकिस्तान में कानून मंत्री और मोहभंग
पाकिस्तान बनने के बाद जोगेंद्रनाथ मंडल वहाँ के पहले कानून और श्रम मंत्री बने। यह एक ऐतिहासिक क्षण था — एक दलित नेता का नवगठित इस्लामी राष्ट्र की पहली कैबिनेट में शामिल होना।
लेकिन यह उम्मीद ज्यादा दिन नहीं चली।
पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों और दलितों पर अत्याचार बढ़ने लगे। प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने लगे। मंडल ने इन अत्याचारों के खिलाफ खुलकर आवाज़ उठाई।
ऐतिहासिक इस्तीफ़ा
1950 में मंडल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक लंबा और ऐतिहासिक इस्तीफ़ा पत्र लिखा। उसमें उन्होंने अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार, संपत्तियों की लूट, महिलाओं के अपहरण और प्रशासनिक पक्षपात का विस्तृत वर्णन किया।
यह पत्र आज भी मानवाधिकार और नैतिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है। इस्तीफ़ा देने के बाद वे भारत लौट आए।
भारत वापसी: सत्ता से बाहर, समाज के साथ
भारत लौटने पर मंडल को किसी राजनीतिक दल ने खास जगह नहीं दी। वे सत्ता से बाहर हो गए, लेकिन समाज से बाहर नहीं हुए।
उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों के पुनर्वास में खुद को झोंक दिया। वे राहत शिविरों में जाते, लोगों से मिलते और उनकी समस्याएँ सुनते।
अंतिम वर्ष और निधन
5 अक्टूबर 1968 को पश्चिम बंगाल के बोंगाँव में उनका रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया। उनका अंत भले ही शांत रहा, लेकिन उनका जीवन संघर्ष से भरा रहा।
जयंती पर कार्यक्रम और श्रद्धांजलि
आज उनकी जयंती पर बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और देश के कई हिस्सों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए। सामाजिक संगठनों ने उन्हें दलित चेतना का महान प्रतीक बताया। वक्ताओं ने कहा कि जोगेंद्रनाथ मंडल का जीवन बताता है कि सत्ता से बड़ा सिद्धांत होता है और राजनीति से बड़ी नैतिकता।
आज के दौर में मंडल की प्रासंगिकता
आज जब राजनीति में धर्म, जाति और पहचान की राजनीति तेज़ हो गई है, मंडल की सोच और भी ज़्यादा प्रासंगिक हो जाती है।
उन्होंने कहा था कि
“जब सत्ता धर्म पहन लेती है, तो सबसे पहले हाशिये को कुचलती है।”
यह कथन आज भी उतना ही सच है।
जोगेंद्रनाथ मंडल सिर्फ़ एक नेता नहीं थे।
वे एक विचार थे —
कि राजनीति का उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि समाज को न्याय देना होना चाहिए।
उनकी जयंती पर देश उन्हें श्रद्धा से याद कर रहा है और उनके सपनों के भारत को साकार करने का संकल्प ले रहा है।




