Dulhinganj to Assembly Speaker: बिहार की राजनीति में अनुशासन, संगठन और निर्वाचित जनप्रतिनिधि की निरंतरता का नाम है—डॉ. प्रेम कुमार। गयाजी शहर के मखलौटगंज स्थित दुल्हिनगंज मोहल्ले की संकरी गलियों से चलकर उन्होंने बिहार विधानसभा अध्यक्ष की प्रतिष्ठित कुर्सी तक का उल्लेखनीय सफर तय किया है। यह कहानी सिर्फ एक राजनीतिक कैरियर की नहीं, बल्कि उस संघर्ष, साहस और संकल्प की है जिसने एक साधारण परिवार के बच्चे को राज्य की सर्वोच्च विधायी जिम्मेदारी तक पहुंचाया।

छोटे घर की कठिनाइयों से शुरू हुआ सफर
71 वर्षीय डॉ. प्रेम कुमार का बचपन दुल्हिनगंज की उन्हीं तंग गलियों में बीता, जहां से सिर्फ पैदल या साइकिल ही गुजर पाती थी। पिता श्याम नारायण राम, यूनियन बैंक में चतुर्थवर्गीय कर्मचारी थे और घर की आय बेहद सीमित थी। मां लालपरी देवी, गृहणी थीं, जिनका 2010 में निधन हो गया। आर्थिक तंगी, सीमित संसाधन और पिछड़े इलाके की सामाजिक परिस्थितियों ने बचपन से ही संघर्ष का जज़्बा उनके भीतर भर दिया।
आरएसएस की शाखा से मिली राष्ट्रीयता की दिशा
दुल्हिनगंज और आजाद पार्क में लगने वाली आरएसएस शाखाओं से जुड़ाव ने प्रेम कुमार को कम उम्र में ही अनुशासन और राष्ट्रवाद के संस्कार दिए। वहीं से उनकी संगठनात्मक यात्रा की नींव पड़ी। महावीर उच्च विद्यालय की शाखा में स्वयंसेवक बनने से लेकर आजाद पार्क शाखा की जिम्मेदारी संभालने तक उन्होंने राष्ट्रीय विचारधारा को आत्मसात किया।
एबीवीपी से जेपी आंदोलन तक—संघर्ष की तपस्या
युवावस्था में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े और 1974 के जेपी आंदोलन में अग्रिम पंक्ति में सक्रिय रहे। उनके साथी प्रभात कुमार सिन्हा के अनुसार, इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ छात्र संघर्ष में प्रेम कुमार अक्सर सबसे आगे दिखाई देते थे।
इसी सक्रियता के कारण उन्हें डीआईआर (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) के तहत गिरफ्तार कर केंद्रीय कारा में आठ महीनों तक रखा गया। रिहा होने के बाद भी वे भूमिगत रहकर आंदोलन की कमान संभालते रहे और स्थानीय नेतृत्व को मजबूत किया।
यह वह दौर था जिसने उनके राजनीतिक जीवन को मजबूत आधार दिया।
1977 में भाजपा से जुड़ाव और संगठन में सुदृढ़ पकड़
इमरजेंसी के बाद 1977 में उन्होंने भाजपा का दामन थामा। उनकी ऊर्जा और संगठन क्षमता को देखते हुए तत्कालीन जिलाध्यक्ष जितेंद्र मोहन सिंह ने उन्हें जिला महामंत्री बनाया। इसके बाद उन्होंने गया जिले के सभी प्रखंडों में भाजपा का मजबूत ढांचा खड़ा किया। ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में बूथ से लेकर जिला स्तर तक संगठन को खड़ा करने में उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।
1990 से 2025 तक लगातार नौ बार विधायक—बिहार का रिकॉर्ड
1990 में भाजपा ने उन्हें गया शहरी सीट से टिकट दिया और यहां से उनके विजय अभियान की शुरुआत हुई। उन्होंने पहली बार सीपीआई के शकील अहमद खान को हराया। इसके बाद—
- 1995, 2000, फरवरी 2005—मसूउद मंजर को लगातार पराजित
- अक्टूबर 2005—कांग्रेस के संजय सहाय को मात
- 2010—सीपीआई के जलालउद्दीन अंसारी
- 2015—कांग्रेस के प्रियरंजन उर्फ डिंपल
- 2020 और 2025—लगातार दो बार कांग्रेस के अखौरी ओंकार नाथ श्रीवास्तव को पराजित
लगातार नौ चुनावी जीत ने प्रेम कुमार को बिहार की राजनीति में एक अलग पहचान दिलाई। यह उनके जनसंपर्क, सेवा, संगठन और जनता के प्रति विश्वास का प्रमाण है।
विधायक से विधानसभा अध्यक्ष तक—विश्वास की ऊंचाई
लंबे राजनीतिक अनुभव, निर्विवाद छवि, संगठनात्मक विश्वास और अनुशासन के कारण 2025 में उन्हें बिहार विधानसभा अध्यक्ष के रूप में चुना गया। 71 वर्ष की आयु में यह जिम्मेदारी उनके राजनीतिक सफर का स्वाभाविक और सम्मानजनक विस्तार बनकर सामने आई।
परंपरा, आस्था और निरंतरता
1990 से लेकर हर चुनाव में वे स्वराजपुरी रोड स्थित मंदिर में पूजा-अर्चना कर अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करते हैं। नामांकन से मतदान तक यह परंपरा आज भी जारी है।
संघर्ष से सफलता तक—एक प्रेरणादायक गाथा
दुल्हिनगंज की तंग गलियों में पला-बढ़ा एक साधारण बालक, जिसने आर्थिक तंगी में भी शिक्षा, अनुशासन और राष्ट्रवाद को अपना मार्गदर्शन बनाया—आज वही व्यक्ति बिहार विधानसभा के सर्वोच्च आसन पर बैठा है।
डॉ. प्रेम कुमार का सफर साबित करता है कि संगठन, संघर्ष और संकल्प अगर दृढ़ हो, तो कोई भी राह कठिन नहीं।
दुल्हिनगंज से विधानसभा अध्यक्ष तक—यह सफर बिहार की राजनीति में प्रेरणा का एक सशक्त उदाहरण बन चुका है।





