शिक्षक दिवस केवल डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती मनाने, शिक्षकों को सम्मानित करने और मंचों से “गुरु का स्थान सर्वोच्च है” कहने का दिन नहीं है। यह दिन भारतीय शिक्षा-व्यवस्था के सामने खड़े उस असहज प्रश्न को पूछने का अवसर भी है—क्या हमारा शिक्षक आज भी वही सामाजिक चरित्र, नैतिक प्रतिबद्धता और राष्ट्र-निर्माण की चेतना लेकर कक्षा में प्रवेश करता है, जिसकी कल्पना भारतीय परंपरा ने की थी?
यह प्रश्न किसी शिक्षक-वर्ग को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा-व्यवस्था के आत्ममंथन के लिए है। आज भी देश में लाखों शिक्षक पूरी निष्ठा, ईमानदारी और कठिन परिस्थितियों में बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं। इसलिए कुछ लोगों की कमियों के आधार पर पूरे शिक्षक समुदाय को दोषी ठहराना अन्याय होगा। लेकिन जहां व्यवस्था में गंभीर कमियां दिखाई देती हैं, वहां चुप रहना भी शिक्षा के साथ न्याय नहीं है।
तब शिक्षक केवल पाठ नहीं पढ़ाता था, जीवन पढ़ाता था
भारतीय समाज में शिक्षक का अर्थ केवल विषय पढ़ाने वाला कर्मचारी नहीं था। शिक्षक ज्ञान देता था, लेकिन उससे आगे जाकर विवेक, अनुशासन, संस्कार, प्रश्न करने की क्षमता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी विकसित करता था।
आज शिक्षक की भूमिका अनेक प्रशासनिक, डिजिटल और गैर-शैक्षणिक दायित्वों से घिर गई है। दूसरी ओर समाज में भी शिक्षक के प्रति अपेक्षाएं बदल गई हैं। शिक्षा अब जीवन-निर्माण के साथ-साथ नौकरी, प्रतियोगी परीक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन बन गई है। यहीं से मूल सवाल पैदा होता है—क्या हमने शिक्षा को ज्ञान और चरित्र निर्माण से हटाकर केवल प्रमाणपत्र और रोजगार प्राप्त करने की मशीन बना दिया है?
नैतिक पतन केवल विद्यार्थियों का नहीं, व्यवस्था का भी प्रश्न है
आज विद्यार्थियों में अनुशासनहीनता, हिंसा, नशे की प्रवृत्ति, डिजिटल लत, असहिष्णुता और सामाजिक संवेदनशीलता में कमी की चर्चा होती है। लेकिन हमें यह भी पूछना चाहिए कि इन समस्याओं के बीच परिवार, विद्यालय, शिक्षक और समाज की सामूहिक भूमिका क्या रही है?
यदि कोई शिक्षक स्वयं समय, ईमानदारी, अनुशासन और नैतिकता का पालन नहीं करता तो उसके द्वारा नैतिक शिक्षा का पाठ कितना प्रभावी होगा?
हालांकि यहां सावधानी आवश्यक है। अधिकांश शिक्षक भ्रष्ट या अनैतिक हैं—ऐसा कहना तथ्यहीन और अन्यायपूर्ण होगा। लेकिन शिक्षक के पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा परीक्षा, उपस्थिति, वित्तीय संसाधन या शैक्षणिक दायित्व में गंभीर अनियमितता होती है, तो उसका प्रभाव सामान्य कर्मचारी की गलती से कहीं अधिक होता है, क्योंकि वह आने वाली पीढ़ी के सामने उदाहरण प्रस्तुत करता है।
हाल ही में बिहार में एक सरकारी शिक्षक के विरुद्ध स्कूल खातों से कथित तौर पर एक करोड़ रुपये से अधिक की अनधिकृत निकासी के मामले में निलंबन और जांच की खबर सामने आई है। ऐसे मामले यह याद दिलाते हैं कि शिक्षा संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है जितनी कक्षा में शैक्षणिक गुणवत्ता।
शिक्षा सेवा है या व्यवसाय?
शिक्षा का निजीकरण अपने आप में समस्या नहीं है; गुणवत्तापूर्ण निजी संस्थान शिक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थी के विकास के बजाय केवल फीस, कोचिंग, टेस्ट, पैकेज और प्रमाणपत्र बेचने तक सीमित हो जाए।
आज स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं तक एक विशाल शिक्षा-बाजार खड़ा हो चुका है। अभिभावक आर्थिक दबाव में हैं और विद्यार्थी प्रतिस्पर्धा के दबाव में।
ऐसे माहौल में शिक्षा का मूल प्रश्न—
“विद्यार्थी क्या सीख रहा है?”
पीछे छूटकर यह प्रश्न आगे आ जाता है—
“उसके कितने अंक आए?”
यह बदलाव खतरनाक है।
सरकार की योजनाएं बहुत हैं, लेकिन परिणाम का सवाल बना हुआ है
सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में अनेक योजनाएं और नीतियां बनाई हैं।
NEP 2020 ने foundational literacy, multidisciplinary education, technology और vocational education पर जोर दिया है। नीति ने 2025 तक स्कूल और उच्च शिक्षा प्रणाली के कम-से-कम 50% शिक्षार्थियों को vocational education का exposure देने का लक्ष्य भी रखा था।
Education Government of India
लेकिन नीति बनना और नीति का जमीन पर प्रभावी ढंग से लागू होना दो अलग बातें हैं।
ASER 2024 की तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है—सरकारी स्कूलों में कई बुनियादी learning outcomes में 2022 के बाद सुधार हुआ है। फिर भी समस्या समाप्त नहीं हुई। राष्ट्रीय स्तर पर 2024 में सरकारी स्कूलों के कक्षा III के केवल 23.4% बच्चे कक्षा II स्तर का पाठ पढ़ पाने में सक्षम थे। कक्षा V में सरकारी स्कूलों के 44.8% बच्चे ही कक्षा II स्तर का पाठ पढ़ सके।
ASER: Annual Status of Education Report
इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार या शिक्षक असफल हैं। इसका अर्थ है कि नामांकन बढ़ाना पर्याप्त नहीं। सीखने की गुणवत्ता को शिक्षा का केंद्रीय परिणाम बनाना होगा।
रोजगारपरक शिक्षा अभी भी हमारी सबसे बड़ी चुनौती है
भारत युवा देश है। लेकिन युवा आबादी तभी demographic dividend बनेगी जब शिक्षा उसे ज्ञान + कौशल + रोजगार + उद्यमिता देगी।
आज भी अनेक विद्यार्थी वर्षों तक डिग्रियां प्राप्त करते हैं, लेकिन नौकरी के लिए आवश्यक communication, digital skills, problem-solving, industry knowledge और practical competence की कमी महसूस करते हैं।
NEP 2020 ने vocational education को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की स्पष्ट आवश्यकता स्वीकार की थी।
Education Government of India
बिहार के संदर्भ में भी यह सवाल महत्वपूर्ण है। 2025-26 के लिए केंद्र की Project Approval Board से संबंधित दस्तावेज में बिहार के माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक स्तर पर vocational education के विस्तार के लिए 1,110 skill trainers के समर्थन का प्रस्ताव दर्ज है।
DSEL Education :
लेकिन आवश्यकता केवल trainers नियुक्त करने की नहीं है। आवश्यकता है कि हर विद्यार्थी को स्थानीय अर्थव्यवस्था और भविष्य के रोजगार से जोड़ने वाली शिक्षा मिले।
स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा यह जान सके कि वह पढ़ाई के बाद क्या कर सकता है—यह प्रश्न शिक्षा-नीति के केंद्र में होना चाहिए।
शिक्षक भर्ती : संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है गुणवत्ता
बिहार में बड़े पैमाने पर शिक्षक नियुक्तियां हुई हैं और नई नियुक्तियों की प्रक्रिया भी जारी है। 2026 में TRE 4.0 के तहत 32,388 शिक्षक पदों पर भर्ती प्रस्तावित है, हालांकि आवेदन प्रक्रिया सितंबर की शुरुआत में प्रशासनिक कारणों से स्थगित हुई।
The Indian Express
बड़े पैमाने पर भर्ती आवश्यक है, लेकिन केवल पद भर देना शिक्षा सुधार नहीं है।
शिक्षक भर्ती की पूरी प्रक्रिया में तीन बातें सर्वोच्च होनी चाहिए—
योग्यता
पारदर्शिता
विषयगत दक्षता और शिक्षण-कौशल
बिहार में पुराने शिक्षक नियुक्ति मामलों में फर्जी प्रमाणपत्रों की जांच का लंबा इतिहास रहा है। पटना उच्च न्यायालय के 2024 के एक आदेश में निगरानी जांच के दौरान बड़ी संख्या में प्रमाणपत्रों के सत्यापन, फर्जी प्रमाणपत्र पाए जाने तथा FIR और सेवा से बर्खास्तगी से संबंधित आंकड़ों का उल्लेख है।
Indian Kanoon 2026 में भी फर्जी डिग्री/प्रमाणपत्र से जुड़े पुराने मामलों में 3,000 से अधिक शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया की रिपोर्ट सामने आई।
यहां भी संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है—फर्जी प्रमाणपत्र का मामला पूरी शिक्षक बिरादरी की पहचान नहीं है। लेकिन ऐसी घटनाएं यह बताती हैं कि शिक्षक भर्ती में verification को नियुक्ति के बाद वर्षों तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
शिक्षा माफिया का प्रश्न
जहां शिक्षा में मांग बहुत अधिक और अवसर सीमित होते हैं, वहां बिचौलियों, दलालों, कोचिंग नेटवर्क और तथाकथित शिक्षा-व्यवसायियों के लिए जगह बनती है।
शिक्षा माफिया केवल परीक्षा में नकल कराने वाला व्यक्ति नहीं है। वह उस पूरी मानसिकता का नाम है जो विद्यार्थी की मजबूरी को बाजार और शिक्षा को वस्तु बना देती है।
इसलिए आवश्यकता है—
पारदर्शी प्रवेश प्रक्रिया, डिजिटल audit, फीस की स्पष्टता, प्रमाणपत्रों का तत्काल सत्यापन, शिक्षक भर्ती में मजबूत verification और संस्थानों की सामाजिक जवाबदेही।
छात्र-शिक्षक अनुपात : केवल औसत आंकड़ा पर्याप्त नहीं
कागज पर राष्ट्रीय या राज्य का औसत PTR अच्छा दिखाई दे सकता है, लेकिन वास्तविक समस्या कई बार विद्यालय-वार असमानता में छिपी होती है।
UDISE+ 2024-25 के अनुसार बिहार में प्राथमिक स्तर पर pupil-teacher ratio 26, upper-primary में 19, secondary में 26 और higher-secondary में 27 था।
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अर्थात केवल यह कहना कि “राज्य का औसत ठीक है” पर्याप्त नहीं। यह देखना होगा कि किस स्कूल में कितने बच्चे हैं, कितने शिक्षक हैं और कौन-सा विषय पढ़ाने वाला शिक्षक उपलब्ध है।
एक विद्यालय में शिक्षक अधिक और दूसरे में विषय-विशेषज्ञ की कमी—ऐसी असमानता शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करती है।
डिजिटल शिक्षा आई, लेकिन डिजिटल विभाजन भी आया
स्मार्ट क्लास, AI, डिजिटल बोर्ड और ऑनलाइन शिक्षा शिक्षा के भविष्य का हिस्सा हैं। लेकिन तकनीक शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकती।
ASER 2024 ने पहली बार 14–16 वर्ष के बच्चों के डिजिटल access, usage और skills पर भी प्रतिनिधिक जानकारी जुटाई।
ASER: Annual Status of Education Report
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि डिजिटल शिक्षा केवल स्मार्टफोन रखने वाले विद्यार्थी तक सीमित न रहे।
डिजिटल इंडिया तभी सफल होगा जब डिजिटल शिक्षा भी समान अवसर देगी।
अब शिक्षक दिवस पर केवल सम्मान नहीं, सुधार का संकल्प होना चाहिए
5 सितम्बर को शिक्षक को माला पहनाना आसान है। कठिन काम है शिक्षक को ऐसा वातावरण देना जिसमें वह वास्तव में शिक्षक बन सके।
हमें पांच स्तरों पर तत्काल काम करना होगा—
पहला— शिक्षक की गुणवत्ता:
नियुक्ति के बाद भी नियमित professional development, subject training और classroom assessment हो।
दूसरा—
जवाबदेही:ईमानदार शिक्षक को सम्मान और उत्कृष्टता के लिए प्रोत्साहन मिले; गंभीर लापरवाही पर निष्पक्ष कार्रवाई हो।
तीसरा-
रोजगारपरक शिक्षा:
स्कूल और कॉलेज को स्थानीय उद्योग, ITI, polytechnic, startups और रोजगार बाजार से जोड़ा जाए।
चौथा—
शिक्षा में पारदर्शिता:
भर्ती से लेकर परीक्षा, फीस, नियुक्ति और वित्तीय प्रबंधन तक हर स्तर पर audit और public accountability हो।
पांचवां—
विद्यार्थी केंद्र में हो:
शिक्षा व्यवस्था का अंतिम मूल्यांकन भवन, पोर्टल, बजट या नामांकन से नहीं, बल्कि इस प्रश्न से हो कि
“बच्चा वास्तव में कितना सीख रहा है और शिक्षा के बाद उसका जीवन कितना बेहतर हुआ?”
शिक्षक दिवस का वास्तविक संदेश
आज आवश्यकता शिक्षक को दोषी बनाने की नहीं, शिक्षक की गरिमा और जिम्मेदारी दोनों को पुनर्स्थापित करने की है।
हमें ऐसे शिक्षक चाहिए जो केवल पाठ्यक्रम पूरा न करें, बल्कि विद्यार्थी को प्रश्न पूछना सिखाएं। केवल परीक्षा की तैयारी न कराएं, बल्कि जीवन की तैयारी कराएं। केवल नौकरी पाने का रास्ता न दिखाएं, बल्कि काम पैदा करने की क्षमता भी विकसित करें।
और सरकारों को भी यह समझना होगा कि शिक्षा पर खर्च केवल बजट का व्यय नहीं, राष्ट्र के भविष्य में निवेश है।
भारत की शिक्षा-व्यवस्था को आज सबसे अधिक आवश्यकता किसी नई घोषणा की नहीं, बल्कि नीति और कक्षा के बीच की दूरी समाप्त करने की है।
शिक्षक दिवस पर इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यही होना चाहिए—
हम कितने शिक्षक नियुक्त कर रहे हैं, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—हम कितनी पीढ़ियों को बेहतर मनुष्य, सक्षम नागरिक और आत्मनिर्भर युवा बना रहे हैं?
यदि इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर खोज लिया गया, तो शिक्षक दिवस केवल एक समारोह नहीं रहेगा—वह भारतीय शिक्षा के पुनर्जागरण का संकल्प दिवस बन जाएगा।
— डॉ. गौतम कुमार
शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिंतक





