असम में प्रियंका का नया टिकट चयन पायलट लागू
असम चुनाव: Priyanka Gandhi Vadra का नया पायलट प्रोजेक्ट, टिकट चयन में बदली कांग्रेस की परंपरा

काँग्रेस की चुनावी रणनिति में बड़ी बदलाव की शुरुआत की जा रही है। पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव Priyanka Gandhi Vadra अब उम्मीदवार तय करने की पारंपरिक दिल्ली-कक्षीय प्रक्रिया छोड़ कर ज़िला-स्तर पर जाकर स्थानीय माहौल, समीकरण और सामाजिक सरंचना के आधार पर प्राप्ट संभावित प्रत्याशियों की पहचान कराने का नया तरीका अपना रही हैं। इस नई व्यवस्था का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर मौजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं की राय को आगे लाकर टिकटों का चयन करना बताया जा रहा है।
पार्टी ने इसके तहत स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता Priyanka Gandhi Vadra स्वयं कर रही हैं। वे 18–19 फरवरी को गुवाहाटी आने वाली हैं और दो दिवसीय दौरे में राज्य के वरिष्ठ नेताओं, विधायकों और जिला इकाइयों से मंथन करेंगी; साथ ही स्क्रीनिंग पैनल के सदस्यों को भी जिलों में भेजा जा रहा है ताकि वे मौके पर जाकर संभावित उम्मीदवारों का जायजा लें। इस कदम का मकसद स्थानीय धरातल पर मजबूत संगठन और टिकट वितरण की पारदर्शिता बढ़ाना बताया जा रहा है।
रिपोर्टों के अनुसार इस मॉडल में ब्लॉक व जिला स्तर की इनपुट्स को अहम माना जाएगा और ब्लॉक कांग्रेस समितियों से उम्मीदवारों के नाम व सिफारिशें लेकर उन्हें स्क्रीनिंग के लिए भेजा जाएगा — यानी निर्णय अब पूरी तरह से शीर्ष-नीतिगत कमरे तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पारंपरिक ‘ड्राफ्टिंग’ प्रक्रियाओं में बदलाव होगा और स्थानीय समीकरण, जातीय-भौगोलिक संतुलन व सामाजिक इंजीनियरिंग को चुनावी रणनीति का केंद्र बनाया जा सकेगा।
यह योजना फिलहाल असम के लिए पायलट के रूप में लागू की जा रही है और रिपोर्टें कहती हैं कि यदि यह सफल हुआ तो इसे अन्य राज्यों में भी अपनाया जा सकता है। पिछले कुछ महीनों में पार्टी की ओर से जिला-स्तरीय समितियों व पांच-सदस्यीय लोकल पैनलों जैसे विकल्पों पर भी विचार चल रहा था; ऐसे बदलाव से संगठन को री-इन्जीनियर करने की कोशिश दिखाई देती है, ताकि आधार स्तर से मजबूत नेतृत्व उभारे जा सकें।
विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम काँग्रेस के लिए दो तरह से फायदेमंद हो सकता है — एक तो स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, और दूसरा, टिकट वितरण में फैली पारदर्शिता से अंदरूनी तनाव कम हो सकता है। हालांकि चुनौतियाँ भी सामने हैं: जिलों से आने वाले सुझावों का समन्वय, संभावित संघर्ष-विवादों का प्रबंधन और समय पर अंतिम सूची तैयार कर देना प्रमुख होंगे। प्रदेश संगठन को इन पहलुओं पर कसी हुई कार्ययोजना बनानी होगी।
असम विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र यह नई पायलट नीति यह संकेत देती है कि काँग्रेस अब शासी-कक्ष से बाहर आकर जमीनी हक़ीक़तों के साथ तालमेल की कोशिश कर रही है — देखते हैं कि यह बदलती पद्धति उम्मीदवारों के चयन और अन्ततः चुनावी प्रदर्शन पर कितना असर डालती है।




