भारत का लोकतंत्र समाज की वास्तविक संरचना से भी संचालित होता है क्योंकि संविधान में लिखा कि हम भारत के लोग अर्थात संविधान के शक्ति का स्त्रोत जनता है।फिर भी यह प्रश्न बार-बार उठता है कि कुछ वर्ग अपेक्षाकृत आगे क्यों हैं और कुछ वर्ग पीछे क्यों रह गए तो इसका उत्तर भावनात्मक बहस में नहीं, बल्कि इतिहास, अवसरों की उपलब्धता और सामाजिक संरचना के क्रमिक विश्लेषण में निहित है। यह विषय किसी समुदाय को दोषी ठहराने व ठेस पहुंचाने का नहीं है बल्कि उस प्रणाली को समझने का है जिसने असमानताओं को जन्म दिया।
यह न तो किसी की प्रतिभा का प्रमाण है,
“किसे पहले शिक्षा मिली,
किसके लिए सत्ता के द्वार खुले,
और किसे सदियों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी”
भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना में कार्य-विभाजन के आधार पर बनी वर्ण व्यवस्था समय के साथ जन्म-आधारित पहचान में परिवर्तित हो गई।
इस प्रक्रिया में शिक्षा, ज्ञान और सत्ता के केंद्र कुछ वर्गों तक सीमित होते चले गए जबकि बड़े समुदाय श्रमप्रधान भूमिकाओं तक सिमट गए। यह स्थिति किसी व्यक्ति की योग्यता या परिश्रम का परिणाम नहीं थी बल्कि उस सामाजिक ढांचे की देन थी जिसमें अवसर समान रूप से वितरित नहीं थे। यहीं से असमान प्रारंभिक रेखा खिंची जिसका प्रभाव पीढ़ियों तक चलता रहा।
“”शिक्षा हमेशा से सामाजिक उन्नति का सबसे सशक्त माध्यम रही है।””
इतिहास बताता है कि लंबे समय तक औपचारिक शिक्षा, ग्रंथों का अध्ययन और बौद्धिक नेतृत्व सीमित वर्गों के हाथ में केंद्रित रहा। जिनके पास शिक्षा और सांस्कृतिक पूंजी थी, वे प्रशासन, न्याय और नीति-निर्माण से जुड़े। इसके विपरीत, जिन समुदायों को शिक्षा से वंचित रखा गया, वे निर्णय-प्रक्रिया से बाहर रहे। यह अंतर धीरे-धीरे संचित लाभ और संचित पिछड़ेपन में बदल गया।
औपनिवेशिक काल में आधुनिक शिक्षा, सरकारी नौकरियाँ और न्यायिक संस्थाएँ विकसित हुईं लेकिन इन नए अवसरों का लाभ भी मुख्यतः उन्हीं वर्गों को मिला जो पहले से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से तैयार थे। “स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने इस ऐतिहासिक असमानता को स्वीकार किया और समानता के साथ-साथ सामाजिक न्याय को भी लोकतंत्र का आधार बनाया।” आरक्षण व्यवस्था इसी समझ से उपजी कि समान अधिकार तब तक अर्थपूर्ण नहीं हो सकते, जब तक समान अवसर सुनिश्चित न हों।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि आरक्षण के बावजूद सामाजिक अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके पीछे कई कारण हैं—पहली पीढ़ी का शैक्षणिक संघर्ष, आर्थिक संसाधनों की कमी, सामाजिक स्वीकार्यता की चुनौतियाँ और पिछड़े वर्गों के भीतर मौजूद आंतरिक असमानताएँ। दूसरी ओर, जिन वर्गों के पास पीढ़ियों से शिक्षा, नेटवर्क और आत्मविश्वास रहा है, वे आज भी प्रतिस्पर्धा में स्वाभाविक बढ़त बनाए हुए हैं। इसे किसी की व्यक्तिगत श्रेष्ठता या हीनता के रूप में देखना न तो तथ्यपरक है और न ही न्यायसंगत।
लेकिन समाधान टकराव या आरोप-प्रत्यारोप में नहीं है। सामाजिक न्याय और योग्यता को परस्पर विरोधी मानना एक कृत्रिम द्वंद्व है। सही नीति वही होगी जो वंचितों को आगे बढ़ाए और सक्षमों को हतोत्साहित न करे।
आज आवश्यकता है कि दोषारोपण का हथियार नहीं, बल्कि सुधार का आधार बनाएं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सार्वभौमिक विस्तार, आर्थिक अवसरों की समान उपलब्धता और सामाजिक सम्मान की संस्कृति यही वह मार्ग है जिससे असमानता की खाई पाटी जा सकती है।भारत की विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। सवर्ण, पिछड़ा, दलित और आदिवासी सभी इस राष्ट्र की समान रूप से मूल्यवान इकाइयाँ हैं। भारत का भविष्य किसी एक वर्ग की प्रगति में नहीं बल्कि समावेशी विकास और सामाजिक न्याय में निहित है और तभी लोकतंत्र सशक्त होगा।




