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CSE ने वित्त मंत्री से रिसाइक्लेबल कचरे पर GST घटाने की मांग

CSE ने वित्त मंत्री को पत्र लिखकर रिसाइक्लेबल कचरे पर GST में राहत की मांग की

नई दिल्ली : केंद्रीय बजट 2026 की पूर्व संध्या पर पर्यावरण और उद्योग विश्लेषण संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (Centre for Science and Environment) ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर रीसाइक्लेबल कचरे पर गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) में राहत देने का आग्रह किया है। CSE का मानना है कि वर्तमान GST ढांचा रीसायकल किए गए और नए मटीरियल के बीच कोई भेदभाव नहीं करता, जिससे रीसाइक्लिंग सेक्टरों को आर्थिक नुकसान हो रहा है और लेन-देन का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक चैनलों में चला गया है।

CSE की डायरेक्टर-जनरल सुनीता नारायण ने पत्र में लिखा कि GST दरों में कमी ग्रीनर प्रोडक्शन को बढ़ावा देने और पर्यावरण के अनुकूल उद्योगों के लिए प्रोत्साहन साबित हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि टैक्स में यह समायोजन केवल राजकोषीय सुधार नहीं है, बल्कि यह इस बात की स्वीकृति भी है कि कचरा अब एक मूल्यवान संसाधन है।

CSE ने अपनी हालिया रिपोर्ट ‘टैक्स में ढील दें’ में बताया कि यदि रीसाइक्लेबल मटीरियल पर GST को 5 प्रतिशत या शून्य कर दिया जाए और इनफॉर्मल सप्लाई चेन को औपचारिक व्यवस्था में शामिल किया जाए, तो सालाना लगभग ₹34,000 करोड़ का नेट फिस्कल लाभ हो सकता है। यदि पूर्ण एकीकरण हो, तो यह लाभ ₹90,000 करोड़ से भी अधिक हो सकता है। इस कदम से MSMEs को मजबूती मिलेगी, लाखों इनफॉर्मल मजदूरों की आजीविका सुरक्षित होगी, और घरेलू कच्चे माल के आयात पर निर्भरता घटेगी।

रिपोर्ट में 12 प्रमुख रीसाइक्लिंग सेक्टरों का विश्लेषण किया गया—जिसमें मेटल स्क्रैप, प्लास्टिक, ई-कचरा, बैटरी वेस्ट, कागज, कांच, टायर और एंड-ऑफ-लाइफ वाहन शामिल हैं। CSE के इंडस्ट्रियल पॉल्यूशन प्रोग्राम डायरेक्टर निवित यादव ने बताया कि इन सेक्टरों में मटीरियल का पुनः उपयोग काफी अधिक है, जिससे संसाधन दक्षता बढ़ती है और प्रदूषण कम होता है।

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CSE के प्रोग्राम मैनेजर पार्थ कुमार ने बताया कि विशेषकर सीमेंट और आयरन-इस्पात उद्योगों में रिसायकल मटीरियल का उपयोग डीकार्बनाइज़ेशन के लिए एक बड़ा अवसर देता है। उन्होंने कहा कि सीमेंट में स्लैग, फ्लाई ऐश और म्युनिसिपल कचरा तथा स्टील में स्टील स्क्रैप का उपयोग उत्सर्जन कम करने में मदद करता है। हालांकि, वर्तमान में इन पर लागू 18 प्रतिशत GST इसे बड़ा डिसइनसेंटिव बना देता है।

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रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि कम CO₂ उत्सर्जन वाले सीमेंट जैसे PPC, PSC, CC और LC3 पर कम GST दर लगाई जाए, ताकि अधिक उत्सर्जन वाले OPC का उत्पादन सीमित हो और कम-कार्बन वाले सीमेंट का उत्पादन और मांग बढ़े। इस कदम से पर्यावरणीय लाभ के साथ-साथ घरेलू कच्चे माल के उपयोग और MSMEs के विकास में भी मदद मिलेगी।

CSE ने यह भी स्पष्ट किया कि टैक्स-लाभ के साथ इनफॉर्मल सप्लाई चेन को औपचारिक चैनलों में लाने के लिए सरल रजिस्ट्रेशन, इनवॉइस सिस्टम और प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। इससे ट्रेसबिलिटी मजबूत होगी, निवेश बढ़ेगा और आर्थिक समावेशन को बल मिलेगा।

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विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समयोचित कदम है क्योंकि केंद्रीय बजट में नीति-निर्णय फिस्कल स्ट्रक्चर और उद्योग की दिशा तय करते हैं। CSE का कहना है कि GST में तर्कसंगत ढील सिर्फ कर लाभ नहीं बल्कि औद्योगिक-पर्यावरणीय रणनीति है, जो भारत को तेजी से सर्कुलर इकॉनमी की ओर ले जा सकती है।

अब यह देखना होगा कि क्या वित्त मंत्रालय और नीति-निर्धारक CSE के इन प्रस्तावों को केंद्रीय बजट 2026-27 में शामिल करते हैं और रिसायक्लिंग-फ्रेंडली कर नीति को लागू करने की पहल करते हैं। यह कदम ग्रीन फिस्कल पॉलिसी के लिए एक मजबूत आग्रह के रूप में सामने आया है, जो पर्यावरण, उद्योग और समाज—तीनों स्तरों पर दीर्घकालिक लाभ का वादा करता है।

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