BMC चुनाव: भाजपा-शिवसेना जीत, ठाकरे परिवार पर निशिकांत दुबे का वार
BMC चुनाव: भाजपा-शिवसेना गठबंधन की जीत पर निशिकांत दुबे की चुनौती — ठाकरे परिवार पर परिवारवाद का आरोप, अरुण गवली की दोनों बेटियों को करारी हार
मुंबई — बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) के ताज़ा परिणामों में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की जीत के बाद राजनीतिक उठापटक तेज हो गई है। गोड्डा से सांसद डॉ. निशिकांत दुबे ने गठबंधन की जीत पर खुशी जताते हुए इसे केंद्र की नीतियों और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की एकता व मजबूत लोकतंत्र की जीत करार दिया। दुबे ने कहा कि यह लोक भावना साफ़ करती है कि जनता विकास, स्थिरता और नेतृत्व के साथ खड़ी है।
दुबे ने सीधे उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे पर परिवारवाद का आरोप लगाते हुए कहा, “अब उनके लिए असहज दिन आ गए हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि वे मुंबई आकर व्यक्तिगत रूप से स्थिति का जायज़ा लेंगे और संबंधित नेताओं से आमना-सामना करेंगे — “मुंबई आकर मिलूंगा,” दुबे ने कहा। उनकी टिप्पणी से शहर की राजनीति में माहौल और गर्मा गया है, खासकर तब जब चुनावी नतीजे स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर रहे हैं।
दुबे ने आगे कहा कि यह परिणाम देश की राजनीति में एक नई दिशा देने वाला है और यह साबित करता है कि वोटरों की प्राथमिकता विकास और कठोर नेतृत्व की तरफ़ बढ़ रही है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं और गठबंधन के सहयोगियों की मेहनत की भी तारीफ़ की और कहा कि भविष्य में भी यही दृष्टिकोण जारी रहेगा।
इसी चुनाव में अपराध जगत से राजनेता बने अरुण गवली के परिवार के लिए बड़ा झटका रहा। गवली की दोनों बेटियों — गीता गवली और योगिता गवली — नगर निगम चुनाव हारीं। गीता गवली को समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार अमरीन शहजान ने हराया, जबकि योगिता गवली को बीजेपी के रोहिदास लोखंडे ने पराजित किया। यह हार गवली परिवार के घटते राजनीतिक प्रभाव और स्थानीय स्तर पर बदलते जन sentiment का संकेत मानी जा रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि BMC चुनाव के नतीजे मुंबई की लोक राजनीति में नए समीकरणों का संकेत हैं। स्थानीय मुद्दे, विकास के वादे और प्रशासनिक कार्यप्रणाली मतदाताओं की प्राथमिकताएं साबित हुई हैं। साथ ही, राष्ट्रीय नेतृत्व के सन्देश का भी लोक स्तर पर असर दिखा — जिसे दुबे ने चुनाव में निर्णायक कारक बताया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार अब मिलने वाली चुनौतियाँ और गठबंधन की रणनीतियाँ अगले कुछ महीनों में स्पष्ट होंगी। मुंबई की सियासत पर यह चुनावी तूफान कई पुराने पैनामे और ड्राइङ-रेखाओं को बदलने की क्षमता रखता है, जबकि स्थानीय परिवारवादी प्रभावों में कमी से शहर के राजनीतिक परिदृश्य में नई बहसें जन्म लेंगी।




