केंद्र के फैसले से बिहार को झटका, मेडिकल कॉलेजों की उम्मीद टूटी
केंद्र के फैसले से बिहार को बड़ा झटका, आबादी आधारित मेडिकल कॉलेजों की उम्मीद टूटी
पटना : केंद्र सरकार के हालिया फैसले ने बिहार को स्वास्थ्य शिक्षा के मोर्चे पर बड़ा झटका दिया है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा मेडिकल कॉलेजों की स्थापना में आबादी के आधार पर तय मानक को फिलहाल लागू नहीं करने का निर्णय लिया गया है। इससे बिहार जैसे घनी आबादी वाले और डॉक्टरों की भारी कमी झेल रहे राज्यों को नुकसान हुआ है, जबकि दक्षिण भारत के राज्यों को इसका सीधा फायदा मिला है।
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एनएमसी ने पहले यह प्रस्ताव रखा था कि हर 10 हजार की आबादी पर एक एमबीबीएस सीट का मानक तय किया जाएगा। अगर यह फॉर्मूला लागू होता तो बिहार जैसे राज्यों में दर्जनों नए मेडिकल कॉलेज खुलने का रास्ता साफ हो सकता था। बिहार की आबादी लगभग 13 करोड़ है, लेकिन यहां मेडिकल सीटों की संख्या महज करीब 3 हजार है। यानी राज्य में लगभग 43 हजार की आबादी पर सिर्फ एक एमबीबीएस सीट उपलब्ध है, जो स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से बेहद चिंताजनक स्थिति है।
इसके मुकाबले दक्षिण भारत के राज्यों — तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुदुचेरी — में पहले से ही मेडिकल कॉलेजों और सीटों की संख्या अधिक है। इन राज्यों की कुल आबादी लगभग 27 करोड़ है, लेकिन यहां करीब 50 हजार एमबीबीएस सीटें उपलब्ध हैं। ऐसे में आबादी आधारित मानक लागू होने पर उत्तर भारत के राज्यों को बढ़त मिल सकती थी और संतुलन बन सकता था।
हालांकि, केंद्र सरकार ने सत्र 2026–27 के लिए इस फॉर्मूले को लागू नहीं करने और नए सिरे से मेडिकल कॉलेजों के लिए आवेदन मंगाने का फैसला किया है। इससे वही राज्य लाभ में रहेंगे, जहां पहले से मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे क्षेत्रीय असमानता और गहरी हो सकती है।
इस फैसले को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है, क्योंकि यह ऐसे समय में लिया गया है जब कई दक्षिणी राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कहीं यह निर्णय चुनावी समीकरणों से प्रेरित तो नहीं है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आबादी आधारित फॉर्मूला लागू होता तो बिहार में न केवल मेडिकल शिक्षा का विस्तार होता, बल्कि राज्य में डॉक्टरों की भारी कमी भी दूर की जा सकती थी। इससे ग्रामीण और दूर-दराज इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होतीं और स्थानीय छात्रों को अपने राज्य में ही पढ़ाई का अवसर मिलता।
कुल मिलाकर, एनएमसी मानक को टालने का केंद्र सरकार का फैसला बिहार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जिसका असर आने वाले वर्षों तक राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था और मेडिकल शिक्षा पर देखने को मिल सकता है।




