
नई दिल्ली : भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु के बाद देश एक बार फिर नेतृत्व के गहरे संकट में फंस गया। ताशकंद समझौते के कुछ ही घंटों बाद 11 जनवरी 1966 को शास्त्री का निधन हो गया। पूरे देश में शोक की लहर थी, लेकिन कांग्रेस पार्टी के सामने उससे भी बड़ा सवाल था—अब देश की बागडोर कौन संभालेगा? यहीं से शुरू हुई वह ऐतिहासिक राजनीतिक जंग, जिसने इंदिरा गांधी को भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बना दिया।
शास्त्री के बाद उत्तराधिकारी की तलाश
27 मई 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद भी यही स्थिति बनी थी और तब गुलजारीलाल नंदा को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया था। 1966 में भी शास्त्री की मृत्यु के बाद नंदा ने एक बार फिर कार्यवाहक प्रधानमंत्री की भूमिका निभाई। हालांकि, कांग्रेस के भीतर जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि असली मुकाबला दो दिग्गजों के बीच होगा—इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई।
मोरारजी देसाई कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और पहले भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में शास्त्री से हार चुके थे। दूसरी ओर इंदिरा गांधी, जवाहरलाल नेहरू की बेटी होने के साथ-साथ राजनीतिक रूप से परिपक्व और अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाली नेता थीं।
के. कामराज की रणनीति
कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज इस बार इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध थे। उन्होंने पार्टी के भीतर माहौल बनाया कि इंदिरा गांधी आधुनिक सोच रखती हैं, दुनिया देखी है और 1967 के आम चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने में सक्षम हैं। कामराज का मानना था कि इंदिरा गांधी युवा और ऊर्जावान नेतृत्व का प्रतीक बन सकती हैं, जबकि देसाई को वह पुराने ढर्रे की राजनीति का प्रतिनिधि मानते थे।
मुख्यमंत्रियों और सांसदों का समर्थन
कांग्रेस संसदीय दल (CPP) के नेता के चुनाव में वोट देने का अधिकार केवल सांसदों को था, लेकिन मुख्यमंत्रियों का नैतिक समर्थन बेहद अहम माना जाता था। के. कामराज और डी.पी. मिश्रा ने मिलकर अधिकतर मुख्यमंत्रियों का समर्थन इंदिरा गांधी के पक्ष में जुटा लिया।
हालांकि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी इंदिरा के खिलाफ थीं, लेकिन राज्य के अधिकांश सांसद इंदिरा गांधी के साथ खड़े थे। पार्टी के भीतर सहमति नहीं बन पाने के कारण 19 जनवरी 1966 को मतदान का फैसला किया गया।
मतदान से पहले का भावनात्मक क्षण
मतदान से ठीक पहले इंदिरा गांधी ने राजघाट जाकर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी और फिर तीन मूर्ति भवन जाकर अपने पिता जवाहरलाल नेहरू को याद किया। यह क्षण न केवल उनके लिए व्यक्तिगत था, बल्कि राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि इससे उनके समर्थकों को भावनात्मक ऊर्जा मिली।
निर्णायक जीत और शपथ ग्रहण
मतगणना में इंदिरा गांधी को 355 वोट मिले, जबकि मोरारजी देसाई को 169 वोट। इस तरह इंदिरा गांधी ने 186 वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की। 24 जनवरी 1966 को उन्होंने भारत की तीसरी और पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
यह सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं थी, बल्कि भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका को लेकर भी एक ऐतिहासिक क्षण था।
1967 का चुनाव और पहली बड़ी परीक्षा
एक साल बाद 1967 में लोकसभा चुनाव हुए। कांग्रेस को 283 सीटें मिलीं, जो 1962 के मुकाबले काफी कम थीं। कई दिग्गज नेता चुनाव हार गए, जिनमें के. कामराज भी शामिल थे। लेकिन इंदिरा गांधी रायबरेली से भारी मतों से जीतीं।
हालांकि पार्टी के भीतर विरोधी खेमा अब भी उन्हें कमजोर करने की कोशिश कर रहा था।
मोरारजी देसाई से समझौता
चुनाव के बाद कांग्रेस के पुराने नेता चाहते थे कि मोरारजी देसाई को आगे बढ़ाया जाए। इंदिरा गांधी ने राजनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए देसाई को उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बनाया।
देसाई गृह मंत्रालय चाहते थे, लेकिन इंदिरा गांधी ने देश की आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए उन्हें वित्त मंत्रालय सौंपा। इससे पार्टी में तत्काल टकराव टल गया और सरकार को स्थिरता मिली।
राष्ट्रपति चुनाव और टकराव
इंदिरा गांधी के सामने अगली बड़ी चुनौती राष्ट्रपति चुनाव थी। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का कार्यकाल समाप्त हो रहा था। इंदिरा गांधी उन्हें दूसरा कार्यकाल नहीं देना चाहती थीं। उन्होंने उपराष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया।
यह फैसला योग्यता के आधार पर था, न कि किसी साम्प्रदायिक सोच से। शुरुआत में मोरारजी देसाई ने समर्थन किया, लेकिन यही उनका इंदिरा गांधी के साथ आखिरी बड़ा सहयोग साबित हुआ।
कांग्रेस विभाजन और इंदिरा की मजबूती
1969 में कांग्रेस का विभाजन हुआ। पार्टी दो हिस्सों में बंट गई—कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर)। इस संघर्ष में इंदिरा गांधी और मजबूत होकर उभरीं।
1971 में मध्यावधि चुनाव कराए गए, जिसमें कांग्रेस ने 352 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया।
उपलब्धियां और विवाद
1971 का युद्ध, बांग्लादेश का निर्माण, हरित क्रांति और “गरीबी हटाओ” अभियान इंदिरा गांधी के कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियां रहीं।
हालांकि 1975 में आपातकाल लगाने और 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर उनकी कड़ी आलोचना भी हुई। समर्थकों का कहना है कि ये फैसले उस समय की परिस्थितियों में मजबूरी थे।
एक युग का अंत
31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। समर्थकों का मानना है कि उन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।
ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने कहा था कि इंदिरा गांधी की दृढ़ता और दूरदृष्टि भारत में आज भी दिखाई देती है।
इंदिरा गांधी की सत्ता तक पहुंच की यह कहानी सिर्फ राजनीतिक रणनीति की नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष और नेतृत्व की मिसाल है, जिसने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी।





