- लालू की कुर्ता-फाड़ होली बिहार में एक लोक-राजनीतिक पहचान बन गई।
- इस प्रतिमान का उपयोग पार्टी संगठन और भावुक वोटबैंक से जुड़ने के लिए भी होता रहा है।
- मीडिया व लोकदृष्टि ने इसे देहाती उत्सव और शक्ति प्रदर्शन दोनों के रूप में दर्ज किया है।
- उम्र, परिवर्तन और राजनैतिक उतार-चढ़ाव ने इसे अब स्मृतिकेंद्रित किंवदंती बना दिया है।
लालू प्रसाद यादव की मशहूर ‘कुर्ता-फाड़’ होली बिहार की सार्वजनिक संस्कृति और स्थानीय राजनीति का एक अनूठा संगम रही है। यह परंपरा केवल रंग और उल्लास तक सीमित नहीं थी — इसमें सामाजिक समरसता, दलगत एकजुटता और नेतागिरी की सहज अभिव्यक्ति भी समायी रही। ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में यह दृश्य व्यापक रूप से लोकप्रिय हुआ: नेता के आवास पर लोग भीड़ लगाते, ढोल-मंजीरा बजते और पारंपरिक देहाती अंदाज़ में होली खेली जाती — ऐसी तस्वीरें वर्षों तक मीडिया में उभरती रहीं।’
ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य से देखें तो यह रिवाज़ बिहार की लोक-परंपराओं से निकला माना जा सकता है, जहाँ त्योहारों पर सामाजिक दूरी घट जाती है और सामूहिकता बढ़ती है। राजनीति के संदर्भ में भी यह त्योहार सहायक साबित हुआ — नेता अपने समर्थकों के बीच अनौपचारिक रूप में जुड़ते, पुराने मतभेद मिटते और नई रणनीतियाँ लोकमंच पर आकार लेतीं। समय-समय पर इस उत्सव के दौरान हुई गतिविधियाँ न सिर्फ स्थानीय लोक भावनाओं को छूती रहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीतिक नैरेटिव को भी प्रभावित करती रहीं।’
पत्रकारिता और ऑडियो-विज़ुअल मीडिया ने इस घटना को बार-बार रेकॉर्ड किया और उसे बिहार की पहचान का हिस्सा बना दिया। टीवी क्लिप्स, न्यूज़रील और सोशल मीडिया पर साझा वीडियो ने ‘कुर्ता-फाड़’ होली को राष्ट्रीय स्तर पर दर्शाया, जिससे यह न सिर्फ स्थानीय-सांस्कृतिक प्रतीक बना बल्कि राजनीतिक ब्रांडिंग का भी उपकरण बन गया। मीडिया कवरेज के कारण यह घटना कई बार विवाद और चर्चाओं का केंद्र भी रही है।’
राजनीतिक अर्थशास्त्र के नजरिए से देखें तो ऐसा उत्सव एक प्रकार का ‘सिम्बोलिक पूंजी’ पैदा करता है — नेता-केंद्रित जश्न चुनावी जुड़ाव और वफादारी बनाए रखने में काम आता है। हाल के वर्षों में, जब उम्र, कानूनी समस्याएँ और परिवारिक घटनाक्रमों ने सार्वजनिक प्रदर्शन पर असर डाला, तब यह परंपरा धीरे-धीरे स्मृति-शैली में बदलती दिखाई दी। युवा पीढ़ी के राजनीतिक व्यवहार और मीडिया-आधारित पब्लिकिटी ने भी इस परंपरा के स्वरूप को बदल दिया है।’
आगे का परिदृश्य यह संकेत देता है कि ऐसी राजनीतिक-सांस्कृतिक टीकाएँ तभी जीवंत रहेंगी जब वे पारंपरिक भावनाओं को समकालीन नागरिक-चिंताओं के साथ जोड़ सकें — यानी त्योहार की मौलिकता की रक्षा करते हुए सामाजिक संवेदनशीलता और सुशासन को भी प्रदर्शित करें। बिहार में ‘कुर्ता-फाड़’ होली का निबंध यही सुझाव देता है कि राजनीतिक प्रतीकों की शक्ति तभी टिकेगी जब वे केवल नाटकीयता नहीं बल्कि संवाद, समावेश और सामाजिक जिम्मेदारी को भी बढ़ावा दें।




