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फोन से चिपका रहता है बच्चा? असली दोषी कौन—डिज़ाइन या डिसिप्लिन

Mobile Addiction : आज के दौर में बच्चों और किशोरों में मोबाइल और सोशल मीडिया की लत तेजी से बढ़ रही है। हाल के महीनों में देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आए मामलों ने माता-पिता और शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में ऑनलाइन गेम की लत से जुड़ी एक दर्दनाक घटना और मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मोबाइल गेम के प्रभाव से हुई मासूम की मौत ने पूरे समाज को झकझोर दिया। सवाल उठ रहा है—क्या यह सिर्फ बच्चों की गलती है, या फिर ऐप्स को इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि वे बच्चों को लंबे समय तक स्क्रीन से जोड़े रखें?

दुनिया भर में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। खासकर Meta (जो Instagram और Facebook की मालिक है) और YouTube जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आरोप लगे हैं कि उनके एल्गोरिदम यूजर्स को अधिक समय तक ऐप पर बनाए रखने के लिए बनाए गए हैं। हाल ही में कैलिफोर्निया की अदालत में एक हाई-प्रोफाइल मुकदमे में दावा किया गया कि इन प्लेटफॉर्म्स की डिजाइन “लत” की तरह काम करती है। याचिका दायर करने वाली युवती ने कहा कि कम उम्र से इन ऐप्स के उपयोग ने उसके मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला।

विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “डोपामिन लूप” पर काम करते हैं। हर लाइक, कमेंट और नोटिफिकेशन दिमाग में खुशी का संकेत देता है, जिससे बच्चे बार-बार ऐप खोलते हैं। ऑटो-प्ले वीडियो, अनंत स्क्रॉल और पर्सनलाइज्ड रिकमेंडेशन जैसी सुविधाएं यूजर को स्क्रीन से जोड़े रखती हैं। बच्चों का मस्तिष्क अभी विकास की अवस्था में होता है, इसलिए वे जल्दी प्रभावित होते हैं और आत्म-नियंत्रण की क्षमता भी सीमित होती है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि पूरी जिम्मेदारी कंपनियों पर डालना भी समाधान नहीं है। डिजिटल दुनिया अब शिक्षा, मनोरंजन और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। ऐसे में जरूरत है संतुलन और समझदारी की।

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बच्चों को मोबाइल और गेम की लत से कैसे बचाएं?

1. तय करें स्क्रीन टाइम
हर दिन के लिए स्पष्ट नियम बनाएं। पढ़ाई के अलावा मनोरंजन के लिए सीमित समय—जैसे एक घंटा—निर्धारित करें। खाने के समय और परिवार के साथ बैठते वक्त मोबाइल पूरी तरह बंद रखें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन बंद कर दें, ताकि बच्चों की नींद प्रभावित न हो।

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2. वैकल्पिक गतिविधियां बढ़ाएं
बच्चों को खेलकूद, संगीत, नृत्य, पेंटिंग या किसी रचनात्मक हॉबी से जोड़ें। किताब पढ़ने, पजल हल करने और डायरी लिखने जैसी आदतें डिजिटल निर्भरता को कम करती हैं। परिवार के साथ आउटडोर गतिविधियां बच्चों का ध्यान स्क्रीन से हटाने में मदद करती हैं।

3. डांट नहीं, संवाद करें
अक्सर माता-पिता गुस्से में फोन छीन लेते हैं या डांट देते हैं, जिससे बच्चे विद्रोही हो सकते हैं। बेहतर है कि उनसे शांतिपूर्वक बात करें। जानने की कोशिश करें कि वे ऑनलाइन क्या देखते हैं और क्यों पसंद करते हैं। भरोसे का रिश्ता उन्हें खुलकर बात करने के लिए प्रेरित करेगा।

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4. डिजिटल मॉनिटरिंग
बच्चे बड़े हो रहे हों तो समय-समय पर उनकी ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखें। पैरेंटल कंट्रोल टूल्स का इस्तेमाल करें और उन्हें साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूक करें।

5. अचानक फोन न छीनें
अचानक सख्ती करने से बच्चे छिपकर मोबाइल इस्तेमाल कर सकते हैं। नियम पहले से स्पष्ट हों और धीरे-धीरे बदलाव लाया जाए।

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अंततः सवाल सिर्फ “बच्चा फोन से चिपका क्यों है” का नहीं, बल्कि “हम उसे बेहतर विकल्प और समझ कैसे दें” का है। तकनीक को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन सही मार्गदर्शन, संतुलन और संवाद से इसके दुष्प्रभावों को जरूर कम किया जा सकता है। समाज, कंपनियां और परिवार—तीनों को मिलकर बच्चों के डिजिटल भविष्य को सुरक्षित बनाना होगा।

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