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डायबिटीज मरीज रोजा रखें तो डॉक्टर की ये जरूरी सावधानियां जानें’

रमजान का महीना इबादत, संयम और आत्मिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है, लेकिन डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए रोजा रखना विशेष सावधानी की मांग करता है।

रमजान का महीना इबादत, संयम और आत्मिक शुद्धि का प्रतीक माना जाता है, लेकिन डायबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए रोजा रखना विशेष सावधानी की मांग करता है। लंबे समय तक बिना खाए-पिए रहने और खान-पान के तय समय में बदलाव के कारण ब्लड शुगर का स्तर अचानक कम या ज्यादा हो सकता है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

ऐसे मरीजों को रोजा शुरू करने से पहले डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए और अपनी दवाओं तथा इंसुलिन की मात्रा डॉक्टर की सलाह अनुसार ही निर्धारित करनी चाहिए। सहरी में संतुलित और धीरे पचने वाला भोजन लेना तथा इफ्तार में ज्यादा मीठा और तला-भुना भोजन से बचना जरूरी है। दिन के दौरान कमजोरी, चक्कर या घबराहट महसूस होने पर तुरंत शुगर लेवल जांचना चाहिए। सही खान-पान, नियमित जांच और चिकित्सकीय सलाह से डायबिटीज मरीज सुरक्षित रूप से रोजा रख सकते हैं।

नीचे डॉक्टर की सलाह के आधार पर डायबिटीज (मधुमेह) वाले मरीजों के लिए रोजा रखने के दौरान ध्यान रखने योग्य सभी जरूरी बातों का उपयोगी और वैज्ञानिक रूप से समर्थित गाइड दिया जा रहा है — सरल भाषा में और अस्पताल/डॉक्टर की सलाह के अनुरूप।

1. पहले से डॉक्टर से सलाह लें (Pre-Roza चेकअप)
रोजा रखने से पहले कम से कम 4–6 सप्ताह पहले अपने डायबेटीस डॉक्टर या डायबेटीज टीम से मिलें। वे आपकी हाल की HbA1c, दवा, सह-रुग्णता (जैसे किडनी, हार्ट) और जोखिम को देखकर सलाह देंगे कि क्या आप सुरक्षित रूप से रोजा रख सकते हैं या नहीं। यह पूर्व-मूल्यांकन अनिवार्य है।

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2. जोखिम का आकलन — कौन रोजा न रखे
कुछ लोगों को रोजा रखने से जोखिम ज्यादा होता है — उदाहरण: लगातार हार्मोन/इंसुलिन पर निर्भर टाइप-1 डायबिटीज, हाल की गंभीर हाइपरग्लाइसीमिया/हाइपोग्लाइसीमिया, डीकेए (डीएबिटिक केटोएसिडोसिस) का इतिहास, किडनी-फेल्योर या गम्भीर हृदय रोग। ऐसे लोगों को डॉक्टर आमतौर पर रोजा न रखने की सलाह देते हैं।

3. ब्लड-ग्लूकोज मॉनिटरिंग (SMBG) करें — टेस्ट करना रोजा तोड़ता नहीं
रोजा के दौरान बार-बार ब्लड-ग्लूकोज (लहु से) जाँच करने से रोजा टूटता नहीं; इसलिए रक्त शुगर नापने में हिचकिचाएँ नहीं। फास्ट के दौरान नियमितly जांच करें—सुहोूर के बाद, दोपहर में, शाम से पहले और इफ्तार से ठीक पहले—या डॉक्टर द्वारा निर्देशित समय पर।

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4. कब रोजा तोड़ दें — स्पष्ट सीमा
यदि ब्लड-ग्लूकोज 70 mg/dL (3.9 mmol/L) से कम हो जाए तो तुरंत रोजा तोड़कर 15 ग्राम कार्बोहाइड्रेट लें और पुनः जाँच करें; अगर 300 mg/dL (16.7 mmol/L) से ऊपर हो और लक्षण हों तो भी रोजा तोड़ें। कोई भी हाइपोग्लाइसीमिया/हाइपरग्लाइसीमिया के लक्षण आए तो तुरंत रोजा समाप्त कर प्राथमिक उपचार लें।

5. दवाइयों/इंसुलिन की समायोजन रूटीन
रोजा के समय दवा-समय और खुराक बदलनी पड़ सकती है—विशेषकर इंसुलिन, सल्फोनीलुरियास या मेग्लिटिनाइड्स वाले मरीजों में। सामान्यतः बड़ी खुराक को इफ्तार पर शिफ्ट करना और सुबह (सुहूर) की डोज़ घटाना सुझाया जाता है; साथ ही ऐसे एंटी-डायबेटिक चुने जाएँ जिनसे हाइपो का जोखिम कम हो। दवा-समायोजन केवल डॉक्टर-नियंत्रण में करें।

6. आहार और पानी
सुहूर में धीरे पचने वाले कार्बोहाइड्रेट (दलिया, ब्रेड, फल), प्रोटीन और खूब पानी लें। इफ्तार में अचानक अधिक मीठा या तली-भुनी चीजें न खाएँ—धीरे-धीरे कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन का संतुलन रखें। तरल पदार्थ (बिना शक्कर) रात के बीच में पर्याप्त मात्रा में लें ताकि डिहाइड्रेशन न हो।

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7. सक्रियता और दुआ/तारावीह
रोजा के दौरान भारी शारीरिक व्यायाम न करें—विशेष कर फास्ट के अंतिम घंटों में। हल्का व्यायाम, रोजमर्रा की गतिविधियाँ और तारावीह का ध्यान रखें; पर थकान होने पर आराम करें।

8. एक्स्ट्रा सावधानियाँ

  • हमेशा ग्लूकोज-टैबलेट, जूस या शुगर रखिए।
  • परिवार/साथी को बताइए कि आप डायबेटीज़ हैं और हाइपो कैसे संभालें।
  • बीमार महसूस होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और रोजा रोकने पर विचार करें।

निष्कर्ष: रोजा रखना संभव है, पर सुरक्षित रोज़ा तभी संभव है जब आप पूर्व-चिकित्सीय आकलन कराएँ, नियमित ब्लड-शुगर मॉनिटरिंग रखें, दवाइयों का डॉक्टर-निगरानी में समायोजन करें और स्पष्ट स्तर पर रोजा तोड़ने का निर्णय लें। किसी भी संशय में अपने चिकित्सक/डायबेटोलॉजिस्ट से सलाह लें।

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