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बिना लॉ पढ़े सुप्रीम कोर्ट जीते, Atharva को MBBS

बिना लॉ पढ़े सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने वाले Atharva Chaturvedi की संघर्षगाथा: EWS कोटे से अब MBBS का रास्ता खुला

फोटो सोशल मीडिया

जब सफलता के लिए किताबें ही नहीं, कोर्ट के फ़ॉर्म और संविधान भी हथियार बन जाएँ — ऐसी कहानी है जबलपुर के उस नौजवान की जिसने अपने आँकड़ों और हक के लिए अकेले अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। कुछ समय पहले तक नीट में अच्छे अंक लाने के बावजूद निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले से वंचित रहने वाले इस छात्र की जद्दोजहद ने आज सर्वोच्च न्यायालय की ताकतवर पीठ से उसे अस्थायी मेडिकल सीट दिलवाई — और साथ ही देश के कई अन्य NEET-उत्तीर्ण आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए रास्ते खोले। Supreme Court of India ने अपने विशेष शक्तियों (अनुच्छेद 142) का प्रयोग करते हुए यह आदेश दिया।

अर्थव (Atharva) का पारिवारिक और शिक्षा-प्रसंघरोचक पृष्ठभूमि साधारण है। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से है और बचपन में सामान्य टेलेविज़न कार्यक्रमों और खेलों में रुचि रखता था। उसने NEET में दो बार सफलता हासिल की और 530 अंक लाकर स्वयं को EWS श्रेणी का पात्र मान पाया — परन्तु राज्य और निजी स्तर पर सीट आवंटन की प्रक्रियाओं में नीति-व्यवस्था के अभाव के कारण उसे दाखिले से वंचित किया गया। कोर्ट की दहलीज़ तक पहुँचने के लिए युवक ने जो धैर्य और सिखने की इच्छा दिखाई, वह कमाल की रही।

अर्थव ने अकेले ही मामला उठाने का निर्णय लिया। उसके पिता मनोज चतुर्वेदी वकील हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कक्षों का अनुभव परिवार में न के बराबर था। लॉकडाउन के दौरान अदालतों के ऑनलाइन होने से यहाँ एक तरह की आत्मशिक्षा का अवसर मिला — पिता की बहस देखते-देखते अर्थव ने कोर्ट के मसौदों, पुराने आदेशों और विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) के प्रारूप को समझना शुरू कर दिया। उसने स्वयं पिटिशन का मसौदा तैयार किया, रजिस्ट्री से त्रुटियाँ ठीक करवाईं और ऑनलाइन दाख़िल कर दिया — दिल्ली आने के खर्च से बचते हुए उस युवक ने इंटरनेट के माध्यम से ही अपनी पैरवी की तैयारी की।

सुप्रीम कोर्ट में उसकी सुनवाई का वह क्षण यादगार रहा — जब मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की पीठ के सामने साधारण पोशाक में खड़ा यह युवक विनम्रता और दृढ़ता के साथ बोला, “मेरे अंक — मेरा हक।” दस मिनट की सुनवाई में अदालत ने देखा कि मामला न केवल व्यक्तिगत दोष-निवारण से जुड़ा है, बल्कि यह नीति-निर्माण की खामियों और लाखों योग्य उम्मीदवारों के भविष्य से संबंधित है। इसलिये पीठ ने अनुच्छेद 142 के अंतर्गत हस्तक्षेप कर के राष्ट्रीय चिकित्सा नियामक और राज्य प्रशासन को निर्देश दिए कि अर्थव सहित योग्य EWS उम्मीदवारों को प्रोविजनल प्रवेश दिया जाए।

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यह आदेश केवल अर्थव के लिए सिफ़र नहीं — इससे यह संकेत जाता है कि अगर नीति के अभाव या अनुपालन की कमी के कारण किसी वर्ग के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो न्यायालय अपने व्यापक अधिकारों का प्रयोग कर पीड़ितों को राहत दे सकता है। कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि यदि निजी संस्थान नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं तो उन्हें अनुपालन के लिये सख्त कदम उठाए जाएँ — यह संदेश और भी छात्रों के लिये निःशंक है।

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हालाँकि जीत का अर्थ यह नहीं कि लड़ाई पूरी तरह समाप्त हो गई है। अदालत ने कॉलेज आवंटन व सीटों की व्यवस्था के लिए सात दिनों का समय दिया है, परन्तु निजी कॉलेजों में EWS फीस संरचना और सीट-मैट्रिक्स स्पष्ट न होने की वजह से परिवार अभी भी चिंतित है। विशेष कर उन घरों के लिये जहां आर्थिक संसाधन सीमित हों, फीस और अनिश्चितताओं का प्रश्न अहम है। पिता ने भी मीडिया में इस चिंता का उल्लेख किया है — वे चाहते हैं कि केवल सीट नहीं बल्कि पारदर्शी फीस नीति और दीर्घकालिक गारंटी भी सुनिश्चित हो।

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अर्थव की कहानी कई मायनों में प्रेरक है: यह बताती है कि शिक्षा और अधिकारों के लिये लड़ाई जीतने के लिये विशेषज्ञता का होना अनिवार्य नहीं, पर तैयारी, साहस और संवैधानिक उपायों की समझ जरुरी है। एक बार फिर यह उदाहरण सामने आया है कि मामूली से दिखने वाले कदम — पिटिशन लिखना, पुरानी फाइलें पढ़ना, और याचिका दायर कर न्यायालय तक पहुँचना — बड़े बदलाव की चिंगारी बन सकते हैं।

अंततः यह फैसला केवल एक छात्र की जीत नहीं, बल्कि उन बहसों का नतीजा है जो देश में आरक्षण, नीतिगत अनुपालन और निजी संस्थानों की ज़िम्मेदारियों पर बार-बार उठती आ रही हैं। न्यायालय के निर्देश से अब कई और योग्य EWS उम्मीदवारों की किस्मत बदल सकती है — बशर्ते प्रशासन और नियामक तंत्र समय पर और पारदर्शी तरीके से कार्य करें।

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