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रोसड़ा का अर्केश्वरनाथ गणेश मंदिर: आस्था और लोकविश्वास का संगम

रोसड़ा का अर्केश्वरनाथ श्री गणेश मंदिर: आस्था, अद्भुता और लोकविश्वास का संगम

अर्केश्वरनाथ गणेश मंदिर

बिहार के समस्तीपुर ज़िले का रोसड़ा अनुमंडल आम तौर पर अपनी ग्रामीण संस्कृति, लोकपरंपराओं और धार्मिक आस्थाओं के लिए जाना जाता है। लेकिन इन दिनों रोसड़ा के भटोतर गाँव में स्थित एक अनोखा मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के बीच विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। यह है अर्केश्वरनाथ श्री गणेश मंदिर—एक ऐसा मंदिर जिसकी स्थापना, मूर्ति की प्राप्ति और श्रद्धालुओं की मान्यताएँ इसे साधारण से कहीं अधिक विशिष्ट बना देती हैं।

भारत में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और शुभारंभ के देवता के रूप में पूजा जाता है। महाराष्ट्र में दस दिवसीय गणेशोत्सव विश्वप्रसिद्ध है, जहाँ मिट्टी की मूर्तियों का निर्माण कर पूजा के बाद उनका विसर्जन किया जाता है। लेकिन इसके विपरीत, देश के कई हिस्सों में ऐसे मंदिर भी हैं जहाँ गणेश जी की प्रतिमा स्थायी रूप से स्थापित है और वर्षों से निरंतर पूजा होती आ रही है। रोसड़ा का अर्केश्वरनाथ गणेश मंदिर भी इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है।

अद्भुत स्थापना की कथा

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी स्थापना से जुड़ी कहानी है। भटोतर गाँव निवासी रामसागर राय मुंशी के घर के पास एक अकोन (एक प्रकार का पेड़) था। किसी कारणवश उस पेड़ को ज़मीन से ऊपर से काटा गया। जब उसकी जड़ खोदी गई, तो लोगों को आश्चर्य हुआ कि जड़ के भीतर से भगवान गणेश की आकृति पूरे स्वरूप में प्रकट हुई। ग्रामीणों के अनुसार, यह आकृति इतनी स्पष्ट थी कि उसमें सूँड, कान और बैठी हुई मुद्रा साफ़ दिखाई दे रही थी।

इस घटना ने पूरे गाँव में श्रद्धा और आश्चर्य का माहौल बना दिया। लोगों ने इसे ईश्वरीय संकेत माना। इसके बाद विधिवत पूजा-पाठ और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ उस विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की गई और 2 फ़रवरी 2010 को औपचारिक रूप से मंदिर की स्थापना की गई। तभी से यह स्थान “अर्केश्वरनाथ श्री गणेश मंदिर” के नाम से जाना जाने लगा।

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रोज़ाना पूजा और विशेष आयोजन

अर्केश्वरनाथ गणेश मंदिर की एक और खास बात है कि यहाँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है। सुबह-शाम आरती, भोग और प्रसाद का वितरण श्रद्धालुओं को किया जाता है। गाँव के लोग अपने दैनिक जीवन की शुरुआत भगवान गणेश के दर्शन से करते हैं।

विशेष रूप से गणेश चतुर्थी के दिन यहाँ भव्य आयोजन होता है। उस दिन मंदिर को फूलों, दीपों और रंगीन सजावट से सजाया जाता है। रोसड़ा ही नहीं, बल्कि आसपास के गाँवों और दूर-दराज़ के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने आते हैं। भजन-कीर्तन, प्रसाद वितरण और सामूहिक पूजा से पूरा इलाका भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है।

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श्रद्धा और मनोकामनाओं का केंद्र

इस मंदिर की प्रसिद्धि सिर्फ इसकी अद्भुत उत्पत्ति के कारण नहीं, बल्कि यहाँ से जुड़ी लोगों की मनोकामना पूर्ति की मान्यताओं के कारण भी बढ़ी है। कई श्रद्धालुओं का कहना है कि उन्होंने यहाँ आकर सच्चे मन से पूजा की और उनकी समस्याओं का समाधान हुआ—किसी को नौकरी मिली, किसी की बीमारी ठीक हुई, तो किसी के घर में सुख-शांति लौटी।

इन्हीं अनुभवों ने इस मंदिर को धीरे-धीरे एक लोकआस्था का केंद्र बना दिया है। लोग अपने परिवार के साथ यहाँ आते हैं, मन्नत माँगते हैं और पूरी होने पर पुनः आकर धन्यवाद स्वरूप पूजा करते हैं।

मंदिर के विकास में परिवार और समाज की भूमिका

अर्केश्वरनाथ गणेश मंदिर के कर्ताधर्ता रामसागर राय मुंशी अपने परिजनों और गाँव के सहयोग से मंदिर के विकास में लगातार लगे हुए हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने मंदिर परिसर की साफ-सफाई, पूजा व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधा पर विशेष ध्यान दिया है। गाँव के युवाओं और बुज़ुर्गों का भी इसमें भरपूर सहयोग रहता है।

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यह मंदिर आज सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि गाँव की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। यहाँ त्योहारों पर सामूहिकता, आपसी सहयोग और सामाजिक एकता का सुंदर दृश्य देखने को मिलता है।

चर्चा में रोसड़ा का नाम

आज जब लोगों के बीच बिहार के प्रसिद्ध मंदिरों की बात होती है, तो रोसड़ा के इस अर्केश्वरनाथ गणेश मंदिर का नाम भी सम्मान से लिया जाने लगा है। यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह ग्रामीण परिवेश में भी श्रद्धा, विश्वास और सेवा भावना से कोई स्थान विशेष बन सकता है।

रोसड़ा का अर्केश्वरनाथ श्री गणेश मंदिर आस्था, अद्भुता और लोकविश्वास का ऐसा संगम है जो हर श्रद्धालु को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहाँ आकर न केवल धार्मिक शांति मिलती है, बल्कि मन को यह एहसास भी होता है कि सच्ची भक्ति किसी बड़े शहर या भव्य परिसर की मोहताज नहीं होती—वह तो गाँव की मिट्टी में भी ईश्वर को प्रकट कर देती है।

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