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गणतंत्र दिवस: संविधान, लोकतंत्र और शहीदों की अमर स्मृति – डॉ. गौतम कुमार

गणतंत्र दिवस 2026 : संविधान की चेतना,लोकतंत्र के प्रति आम जनता की जिम्मेदारी,शहीदों की स्मृति है।

Republic Day : 26 जनवरी 2026 भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का वह निर्णायक मोड़ है जब स्वतंत्रता केवल राजनीतिक उपलब्धि न रहकर संवैधानिक शासन व्यवस्था में परिवर्तित हुई। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान के लागू होने के साथ ही देश ने स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित किया। यह दिन उस ऐतिहासिक संकल्प की स्मृति है, जब सत्ता का अंतिम स्रोत जनता को बनाया गया।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—एक ऐसे शासन तंत्र का निर्माण, जो औपनिवेशिक विरासत से मुक्त हो, सामाजिक न्याय सुनिश्चित करे और विविधताओं से भरे देश को एक सूत्र में बाँध सके। संविधान सभा ने लगभग तीन वर्षों के गहन विमर्श के बाद जो संविधान देश को दिया, वह केवल कानूनी दस्तावेज़ नहीं बल्कि राष्ट्रीय जीवन का मार्गदर्शक दर्शन है। डॉ. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में निर्मित यह संविधान समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला बनाता है।
भारतीय गणतंत्र की विशिष्टता इस बात में निहित है कि उसने लोकतंत्र को केवल शासन प्रणाली तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया जो मौलिक अधिकारों, नीति निदेशक तत्वों और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से एक ऐसे समाज की कल्पना की गई जहाँ जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का स्थान न हो। यही कारण है कि भारत ने लोकतंत्र को केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक लोकतंत्र के रूप में स्वीकार किया।

गणतंत्र दिवस पर आयोजित परेड और सांस्कृतिक झांकियाँ इस संवैधानिक यात्रा का सार्वजनिक उत्सव हैं। कर्तव्य पथ पर प्रदर्शित होती विविधता यह दर्शाती है कि भारत की शक्ति उसकी सैन्य क्षमता से अधिक उसकी संवैधानिक एकता और सांस्कृतिक बहुलता में है। ‘कर्तव्य पथ’ का नाम स्वयं यह संकेत देता है कि अधिकारों की सार्थकता तभी है, जब वे कर्तव्यों से जुड़े हों।
हालाँकि, 2026 में खड़े होकर केवल उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है। यह आत्ममंथन का समय भी है।
1. क्या संविधान की भावना हमारे सार्वजनिक जीवन में उतरी है?
2. क्या लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित होकर रह गया है।
3. क्या संस्थाओं की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक न्याय सुरक्षित हैं?
4. क्या लोकतंत्र का स्वास्थ्य केवल मतपेटियों से नहीं, बल्कि न्याय, जवाबदेही और संवैधानिक मर्यादाओं से तय होता है।

वर्तमान समय में जब वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। भारत का गणतंत्र एक महत्वपूर्ण उदाहरण विश्व प्रस्तुत करता है परंतु यह उदाहरण तभी जीवंत रहेगा जब संविधान को सत्ता का साधन नहीं बल्कि सत्ता पर नियंत्रण का माध्यम माना जाए। संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती, स्वतंत्र मीडिया और जागरूक नागरिक ये सभी किसी भी गणराज्य की वास्तविक पूँजी होते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि गणतंत्र दिवस को केवल औपचारिक आयोजन न बनाकर संवैधानिक चेतना के नवीनीकरण का अवसर बनाया जाए। शिक्षा व्यवस्था में संविधान की मूल भावना का समावेश, राजनीति में नैतिकता और प्रशासन में पारदर्शिता ये सभी गणतंत्र को सशक्त करने की अनिवार्य शर्तें हैं।

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गणतंत्र दिवस 2026 यह स्मरण कराता है कि संविधान की रक्षा किसी एक संस्था या सरकार की नहीं बल्कि हर नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। जब नागरिक सजग होंगे, संस्थाएँ स्वतंत्र रहेंगी और सत्ता संवैधानिक मर्यादाओं में बंधी होगी तभी भारतीय गणतंत्र अपने उद्देश्य को पूर्ण कर सकेगा।
भारतीय गणतंत्र की सार्थकता इसी में निहित है कि संविधान
केवल पुस्तकों में नहीं बल्कि राष्ट्रीय आचरण में जीवित रहे।
लेखक : डॉ. गौतम कुमार
(संवैधानिक व सामाजिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन)

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