आज का दिन सिर्फ एक धार्मिक या ऐतिहासिक अवसर नहीं है। यह दिन भारत की आत्मा को छूने वाला दिन है। हर साल कुछ दिन ऐसे आते हैं जो केवल तारीख नहीं होते, बल्कि राष्ट्र की चेतना को जगाने का अवसर बन जाते हैं। एक ओर माँ सरस्वती की आराधना का पर्व बसंत पंचमी, दूसरी ओर आज़ादी के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती और तीसरी ओर निर्भीक राजनीति के प्रतीक बालासाहेब ठाकरे की स्मृति — तीनों एक साथ देश को आत्ममंथन का अवसर देते हैं।
बसंत पंचमी: ज्ञान और विवेक का पर्व
बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि विद्या, कला और विवेक की देवी माँ सरस्वती की आराधना का दिन है। आज के समय में जब शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन बनती जा रही है, तब यह पर्व याद दिलाता है कि शिक्षा का उद्देश्य समाज को दिशा देना है।
भारत को आज ऐसे युवाओं की ज़रूरत है जो सिर्फ़ डिग्रीधारी नहीं, बल्कि विचारशील नागरिक हों। माँ सरस्वती का आशीर्वाद हमें यही सिखाता है कि ज्ञान के साथ चरित्र और साहस भी जरूरी है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस: त्याग और राष्ट्रभक्ति की मिसाल
नेताजी का जीवन भारत के इतिहास का सबसे प्रेरणादायक अध्याय है। उन्होंने न केवल आज़ादी का सपना देखा, बल्कि उसे पाने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया। उनका नारा — “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” — आज भी युवाओं को झकझोरता है।
आज जब राजनीति सुविधा और समझौते की राह पर है, तब नेताजी हमें सिखाते हैं कि राष्ट्रहित के सामने व्यक्तिगत स्वार्थ कुछ भी नहीं।
बालासाहेब ठाकरे: निर्भीकता और स्वाभिमान की राजनीति
बालासाहेब ठाकरे ने राजनीति को डर से नहीं, आत्मसम्मान से जोड़ा। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने सत्ता से ज़्यादा सच बोलने को महत्व दिया। आज जब बहुत से लोग चुप रहना ही सुरक्षित समझते हैं, तब बालासाहेब की विरासत कहती है — गलत के सामने खड़ा होना ही असली साहस है।
आज का संदेश: युवा जागे, देश बढ़े
आज भारत को भीड़ नहीं, सोच चाहिए। आज का युवा सिर्फ़ करियर नहीं, चरित्र से पहचाना जाए।
राजनीति सत्ता का खेल नहीं, सेवा का माध्यम बने — यही इन तीनों विभूतियों की असली सीख है।
बसंत पंचमी हमें ज्ञान देती है,
नेताजी हमें त्याग सिखाते हैं,
और बालासाहेब हमें निर्भीक बनाते हैं।
इन तीनों का संदेश एक ही है —
चुप मत रहो
झुको मत
और अपने देश के लिए खड़े हो जाओ





