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सार्वजनिक बम पूजा समिति (समस्तीपुर- दरभंगा): पृष्ठभूमि और महत्त्व

“बम पूजा” या “बोलबम” महोत्सव शिवभक्ति पर आधारित एक प्राचीन पावन परंपरा है। धार्मिक कथाओं के अनुसार बोले “बम–बम भोले” का उच्चारण एक पुरातन घटना से जुड़ा है: राजा दक्ष की यज्ञकुंड में शिवजी ने दक्ष का सिर काटकर बकरा का सिर लगा दिया था, और दक्ष के मुँह से निकली बकरा वाली बोली “बम–बम हर-हर” भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हो गई; तब से शिवभक्त इसी मंत्र से भोलेनाथ की प्रशंसा करते हैं। सावन माह एवं माघ माह में हजारों कांवरिया (भोलेनाथ भक्त) गंगा के तट सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ के शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं, मार्ग में ‘बम-बम भोले’ के उद्घोष से वातावरण शिवमय हो उठता है।

विज्ञान और इतिहासज्ञ बताते हैं कि कांवर यात्रा और शिव-जलाभिषेक की यह परम्परा कम-से-कम 1700 के दशक से चली आ रही है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. देवी प्रसाद दुबे के अनुसार 1700 ईस्वी के आसपास ही सुल्तानगंज से संग्रहीत गंगाजल को देवघर के वैद्यनाथ मंदिर में चढ़ाने की प्रथा का उल्लेख मिलता है। इसके पहले भी हिंदू तीर्थयात्रियों में नदीजल के प्रति श्रद्धा थी, पर बाद में यह श्रावणकालीन शिव-यात्रा व्यापक हुई। मिथिलांचल समेत उत्तरी भारत में शिवआराधना की परंपरा सदियों पुरानी है, और ग्रामीण क्षेत्रों में यह लोकाचार के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आया है.

इस पृष्ठभूमि में वर्षों पहले स्थानीय श्रद्धालुओं ने सामूहिक “बम पूजा” आयोजित करने की परंपरा आरंभ की। मूलतः व्यक्तिगत कांवड़-यात्रा की जगह, गाँवों ने मिलकर बड़े पैमाने पर शिवलिंगों का निर्माण कर सार्वजनिक जलाभिषेक करने का महा-आयोजन शुरू किया। हाल के वर्षों में इसकी भव्यता और संख्या में वृद्धि हुई है। समस्तीपुर-दरभंगा क्षेत्र में भी मान्यता है साथ ही इस बार “शहरू” गाँव में यह आयोजन किया गया और श्रद्धा व विश्वास के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका है।

धार्मिक महत्त्व
बम पूजा महादेव की असीम भक्ति का उत्सव है। भगवान शिव को भोलेनाथ, महादेव या शिव जी के नामों से जाना जाता है, और श्रावण माह विशेषकर सोमवार को उनकी आराधना को सर्वोच्च माना जाता है। ‘बम–बम भोले’ और ‘हर–हर महादेव’ के जयघोष इस पर्व की जान हैं। भगवान शिव की श्रद्धालु बड़ी श्रद्धा से मिट्टी के शिवलिंग या पार्थिव शिवलिंग बनाकर उन पर दूध, दही, जल आदि से अभिषेक करते हैं। गंगा के पावन जल को कांवड़ में भरकर शिवलिंग पर अर्पित करने की परंपरा भी इसी श्राद्ध की एक अभिव्यक्ति है।

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ऐतिहासिक रूप से देखे तो शिव की आराधना में जलाभिषेक को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। विशेषकर सावन मास (अभिज्ञान का महीना) में कुंड-मंडपों पर भक्ति-गीतों और कथा-कीर्तन का आयोजन होता है। बम पूजा में कथा-भागवत या शिव पुराण का प्रवचन, भजन-कीर्तन एवं महाप्रसाद का वितरण होता है, जिससे समाज में धार्मिक चेतना और सामूहिक श्रद्धा बढ़ती है। शिवजी की पालकी या रथ यात्रा इसी श्रद्धा का धरातल पर भव्य रूप है। इस प्रकार सार्वजनिक बम पूजा में धार्मिक दृष्टि से शिव की आराधना, ब्राह्मणों और साधुओं के साथ मिलकर पूजा-अर्चना तथा सामूहिक भक्ति के आदान-प्रदान को विशेष महत्त्व प्राप्त है।

संवाददाता मनीष कुमार बम पूजा के वक्त

आयोजन की प्रक्रिया
सार्वजनिक बम पूजा आयोजन ग्राम-स्तहरीय समितियों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है। हर वर्ष अलग-अलग गाँव इसे मेज़बानी करते हैं। समिति के सदस्यों (जैसे अध्यक्ष, सचिव, खचानजी, सहयोगी, सैनिक इत्यादि) के मिलनसार प्रयास से पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। आयोजन की रूपरेखा में आम तौर पर निम्नलिखित चरण होते हैं:
• भूमि पूजन एवं प्रारंभिक तैयारी: पूजा स्थल की निविद भूमि पर लगभग एक माह पहले भूमिपूजन किया जाता है। इस अवसर पर भजन-कीर्तन और सामूहिक आरती के साथ धार्मिक वातावरण बनाते हुए आयोजन की मनोकामना की जाती है। इसी समय से पूजा स्थल पर पवित्रता बनाए रखने के लिए सतत भजन-संकीर्तन, शिवलिंग बनाना, और जनहित में भोजन–भण्डारे की व्यवस्था भी आरंभ हो जाती है।
• कथा एवं प्रवचन: आयोजन से लगभग एक सप्ताह पहले प्रवचन और कथा-शिविर आयोजित होते हैं। पंडितों या कथावाचक द्वारा शिव की महिमा, बोलबम की कथा और धर्म-ग्रंथों का पाठ किया जाता है। इससे श्रद्धालुओं की आस्था को मार्गदर्शन मिलता है और आयोजन का वैधानिक वातावरण बनता है।
• भंडारा एवं प्रसाद की तैयारी: कार्यक्रम की पूर्वतयारी के तहत किलोमीटर भर सड़क तक श्रद्धालुओं के लिए हजारों पैलेट पत्तल, भोजन-प्रसाद (खीर, लड्डू, फल-मेवों आदि) की व्यवस्था किए जाते हैं। लगभग दस से पंद्रह हजार लीटर दूध, क्विंटलों चावल, मेवे एवं अन्य सामग्री मिलाकर भक्तों को ‘महाप्रसाद’ चढ़ाया जाता है। आयोजन दिवस तक सभी प्रकार का भण्डारा स्थायी रूप से लगाया रहता है, ताकि दूर-दराज़ से आए भक्तों को नि:शुल्क भोजन मिल सके।
• पूजा एवं जुलूस दिन: आयोजन दिवस को सुबह से ही शिवलिंगों का जलाभिषेक शुरू होता है। समिति अध्यक्ष या मुख्य पुजारी मंत्रोच्चार करते हुए दूध, दही, जल इत्यादि से शिवलिंग पर अभिषेक करवाते हैं। इसके बाद हजारों श्रद्धालु एक-एक कर जल अर्पण करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। दिन भर चलने वाले पूजन के बाद सांझ तक पारम्परिक गज़ाबाजा, ढोल-नगाड़ों और हाथी-पट्टा लेकर वार्ड–वार शोभायात्रा निकाली जाती है। भक्तों द्वारा हाथ में तिरंगा धारण कर अपने गांव के कलश लेकर फेरे लगाए जाते हैं। अन्त में कलश का विसर्जन किया जाता है, जिससे यह महा-आयोजन पूरा होता है।

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पूजा के दूसरे दिन आयोजन स्थल पर “मुख्य कलश” की खुली बोलियाँ लगती हैं। सबसे ऊँची बोली लगाने वाले गांव को अगले वर्ष आयोजन की मेज़बानी का अधिकार मिल जाता है। इसी तरह बारी-बारी से अलग-अलग गांवों को पूजा करवाने की जिम्मेदारी दी जाती है। उदाहरण के लिए, हालिया आयोजन में दुबौली (दरभंगा) गाँव ने मुख्य कलश की बोली ₹4,11,000 में जीती; अतः अगली बार पूजा दुबौली गांव में ही आयोजित होगी।

समिति हर माह बैठक करके कार्यक्रम की प्रगति की समीक्षा करती है। छठ महापर्व के अंतिम दिन सभी गांवों के प्रतिनिधियों की बैठक होती है जिसमें अगले महीने के आयोजन की रूपरेखा पर चर्चा होती है। इस प्रकार यह व्यवस्था सालभर सक्रिय रहती है। प्रत्येक गांव की अपनी प्रबंधन समिति होती है, और हर सदस्य को अपने-अपने कर्तव्यों का ज्ञान होता है।

गांवों की भागीदारी
सार्वजनिक बम पूजा में दरभंगा और समस्तीपुर के दर्जनों गांव सहयोग करते हैं। वर्ष 2026 के आयोजन में दो प्रखंडों (समस्तीपुर के शिवाजीनगर एवं दरभंगा के बहेड़ी) के कुल 56 गांवों ने हिस्सा लिया। श्रद्धालु स्थानीय ग्रामीणों से लेकर पड़ोसी प्रखंडों और दूर-दराज़ के भक्त भी शामिल हुए। आयोजन में शामिल गांवों की संख्या में वृद्धि हो रही है क्योंकि यह आयोजन सार्वजनिक है और इसमें सभी लोग आस्था से भाग ले सकते हैं। समिति के निर्णयानुसार प्रतिवर्ष अलग गांव इस महाआयोजन की मेजबानी पाते हैं।

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प्रत्येक सहभागी गांव की अलग पूजा-समिति बनती है, जो उस गांव के वरिष्ठ सदस्यों (जैसे मुखिया, समाजसेवी, पुजारी आदि) की देखरेख में काम करती है। हर गांव से एक मुख्य “खचानजी बम”, एक “सिपाही” और अन्य सहायक सदस्य इसमें शामिल होते हैं। इनकी भूमिका सामूहिक साधन जुटाने, प्रसाद वितरण, सुरक्षा आदि की व्यवस्था सुनिश्चित करने की रहती है। आयोजन स्थल पर आने वाले श्रद्धालुओं को इकट्ठा करना, उनके लिए आवागमन और आतिथ्य की जिम्मेदारी भी इन्हीं गांवों के स्थानीय कार्यकर्ताओं की होती है। इस तरह यह आयोजन स्थानीय ग्रामीण समुदाय के आत्म-सहयोग और विश्वास का एक अखंड आदान-प्रदान बन गया है।

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सामाजिक प्रभाव
सार्वजनिक बम पूजा ने धार्मिक उत्साह के साथ-साथ सामाजिक एकता और सामुदायिक भावना को भी गहरा प्रभाव पहुंचाया है। हजारों की संख्या में गांव-गांव के श्रद्धालु मिलकर पूजा करते हैं और सामूहिक भंडारे में भोजन करते हैं। इस आयोजन में लाखों प्रसाद-पत्तल, दस हजार लीटर से अधिक दूध, सैकड़ों क्विंटल चावल और लड्डू का महाप्रसाद तैयार किया जाता है। (समाचार रिपोर्ट के अनुसार शहरू पूजन में तीन लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक किया तथा सवा लाख शिवलिंगों और 12 ज्योतिर्लिंगों की आराधना हुई। हज़ारों भक्तों ने समिति द्वारा लगाए गए भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।) इस विशाल आयोजन में सभी वर्गों के लोग शामिल होते हैं, जिससे सामाजिक दूरी मिटती है और सामूहिक समर्पण का भाव पैदा होता है।

पूजा उत्सव के दौरान स्थानीय बाजार-केंद्रो में भी हलचल रहती है। दूर-दराज़ से आए कांवड़िये सामान खरीदते हैं, जिससे छोटी-छोटी दुकानों को आर्थिक लाभ होता है। इस दौरान स्वास्थ्य-और-आपूर्ति के सामाजिक ढाँचे की भी परीक्षा होती है, अतः गांव समेत क्षेत्रीय प्रशासन विशेष व्यवस्था करता है। भंडारे में खाना खाने, शिवलिंग पर जल चढ़ाने और शोभायात्रा निकालने की रस्में दशकों की सामाजिक सीख को भी सहेजे हुए हैं। कोरोना या अन्य विपरीत परिस्थितियों में भी आयोजन की तैयारी सामूहिक जिम्मेवारी बनी रहती है, जैसा कि सावन के दौरान हीमपुरा (यूपी) के उदाहरण दिखाते हैं।

पूजा का समापन भी समरसता का संदेश देता है: भक्त रथों पर सवार होकर अपने गांवों को लौटते हैं, साथ में “हर हर महादेव, बम बम भोले” के नारे गूंजते रहते हैं। महाप्रसाद वितरण के साथ बैठक कर अगले आयोजन की रूपरेखा तय होती है। इस तरह सार्वजनिक बम पूजा समिति का आयोजन सामाजिक एकता, सामुदायिक शांति और धार्मिक आस्था को मजबूत करता है। गाँव-गाँव में श्रद्धालुओं की भागीदारी इस सामूहिक महापर्व को हर साल और भी भव्य बनाती है।

N Mandal

Naresh Kumar Mandal, popularly known as N. Mandal, is the founder and editor of Gaam Ghar News. He writes on diverse subjects including entertainment, politics, business, and sports, with a deep interest in the intersection of cinema, politics, and public life. Before founding Gaam Ghar News, he worked with several leading newspapers in Bihar.

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