पटना : बिहार की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) में उभरे अंदरूनी कलह को लेकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर बड़ा आरोप लगाया है। राजद का कहना है कि बीजेपी सुनियोजित साजिश के तहत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कुर्सी से हटाना चाहती है और इसी रणनीति के तहत सहयोगी दलों को कमजोर और विभाजित किया जा रहा है। आरएलएम में उभरी टूट इसी साजिश का हिस्सा है।
राजद के प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने मीडिया से बातचीत में कहा कि “बीजेपी खेल कर रही है। उसका मकसद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाना और अपने दल के किसी नेता को उस पर बैठाना है। इसके लिए सहयोगी दलों को तोड़ने की रणनीति पर काम हो रहा है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी में जो घटनाक्रम हो रहा है, वह उसी योजना का हिस्सा लगता है।”
उन्होंने कहा कि आरएलएम के तीन विधायकों की नाराज़गी और उनकी सार्वजनिक प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि पार्टी को अंदर से कमजोर किया जा रहा है। “बीजेपी अपने सहयोगी दलों को भी नहीं छोड़ती। पहले दूसरे दलों में टूट कराई गई और अब वही काम सहयोगियों के साथ किया जा रहा है,” तिवारी ने आरोप लगाया।
दरअसल, आरएलएम प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा द्वारा अपने बेटे दीपक प्रकाश को बिना चुनाव लड़े मंत्री बनाए जाने के फैसले से पार्टी के भीतर असंतोष पनप रहा है। पार्टी के विधायक रामेश्वर महतो ने इस फैसले को “आत्मघाती” करार देते हुए उपेंद्र कुशवाहा से अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की अपील की है।
रामेश्वर महतो ने कहा कि “परिवारवाद का विरोध करने वाले नेता का अचानक हृदय परिवर्तन कैसे हो गया? पार्टी में चार विधायक हैं, उनमें से किसी को मंत्री बनाया जा सकता था। बेटे के लिए कुछ समय इंतजार किया जा सकता था। इस फैसले से कार्यकर्ताओं और विधायकों का नेतृत्व पर भरोसा कमजोर हो रहा है।”
उन्होंने बताया कि पार्टी के तीन विधायक — आनंद माधव, आलोक कुमार और रामेश्वर कुशवाहा — इस फैसले से नाराज हैं और शीर्ष नेतृत्व से पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे पार्टी की साख और एकजुटता दोनों पर असर पड़ रहा है।
राजनीतिक हलकों में हलचल तब और बढ़ गई जब 25 दिसंबर को पटना स्थित उपेंद्र कुशवाहा के आवास पर आयोजित लिट्टी-चोखा पार्टी में ये तीनों विधायक शामिल नहीं हुए। इसके बजाय वे दिल्ली चले गए और बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन से मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं। इसके बाद दिल्ली से ही रामेश्वर महतो ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया।
इससे पहले 12 दिसंबर को भी रामेश्वर महतो ने फेसबुक पोस्ट के जरिए उपेंद्र कुशवाहा की नीयत पर सवाल उठाए थे, जिसकी याद शनिवार को उन्होंने फिर दिलाई और कहा कि उनके संदेश को नजरअंदाज कर दिया गया।
इन घटनाओं के बाद बिहार की राजनीति में यह सवाल तेज हो गया है कि क्या वाकई आरएलएम में टूट की पटकथा किसी बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, या यह सिर्फ नेतृत्व के फैसलों से उपजा आंतरिक असंतोष है। फिलहाल इतना तय है कि इस घटनाक्रम ने बिहार की सत्तारूढ़ राजनीति में नई बेचैनी और अनिश्चितता पैदा कर दी है।




