“25 से 30 फिर से नीतीश” नारा क्यों पड़ा फीका?
तेजस्वी यादव का आरोप—भाजपा ने महाराष्ट्र जैसा शिंदे मॉडल अपनाया, जनता की सहमति बिना बिहार के नेतृत्व में बदलाव की पटकथा पहले से लिखी गई थी
बिहार की राजनीति में इन दिनों “25 से 30 फिर से नीतीश” का नारा चर्चा के केंद्र में है। कभी यह नारा सत्ता की स्थिरता और नेतृत्व की निरंतरता का प्रतीक माना जा रहा था, लेकिन अब विपक्ष इसे राजनीतिक भ्रम और रणनीतिक चाल करार दे रहा है।
तेजस्वी यादव ने हालिया बयान में कहा कि चुनाव के दौरान ही उन्होंने संकेत दे दिया था कि सत्ता समीकरण बदलने वाले हैं। उनका आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र में अपनाए गए “शिंदे मॉडल” की तर्ज पर बिहार में भी राजनीतिक प्रयोग किया है।
तेजस्वी यादव का कहना है कि चुनाव में जनता की इच्छा से अधिक “तंत्र” की भूमिका रही। उन्होंने यह भी दोहराया कि उन्होंने पहले ही चेताया था—नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद पर लंबे समय तक बने रहने नहीं दिया जाएगा। अब जो घटनाक्रम सामने आ रहा है, उसे वे अपनी भविष्यवाणी का सच साबित होना बता रहे हैं।
विपक्ष का दावा है कि चुनाव के समय विभिन्न योजनाओं, घोषणाओं और प्रशासनिक फैसलों के जरिए राजनीतिक जमीन तैयार की गई। उनका आरोप है कि इन कदमों का उद्देश्य विपक्ष को कमजोर करना था, लेकिन अंततः सत्ता संतुलन बदलने के लिए इन्हीं रणनीतियों का उपयोग किया गया।
राष्ट्रीय जनता दल ने इसे लोकतांत्रिक भावना के विपरीत बताते हुए कहा है कि अगर नेतृत्व में बदलाव होता है तो उसमें जनता की स्पष्ट सहमति और पारदर्शिता होनी चाहिए। पार्टी नेताओं का कहना है कि बिहार की जनता ने जिस चेहरे और नारे के आधार पर वोट दिया, उसी के अनुरूप शासन चलना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार की राजनीति में गठबंधन की मजबूरियां और रणनीतिक समीकरण अक्सर अप्रत्याशित मोड़ ले लेते हैं। “शिंदे मॉडल” शब्द का प्रयोग दरअसल उस राजनीतिक घटनाक्रम की ओर इशारा है, जिसमें सत्ता समीकरण अचानक बदल गए थे। विपक्ष का आरोप है कि वही फार्मूला अब बिहार में दोहराया जा रहा है।
हालांकि सत्ता पक्ष की ओर से इन आरोपों पर स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। जनता के बीच भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या “25 से 30 फिर से नीतीश” सिर्फ एक चुनावी नारा था या स्थायी नेतृत्व का वादा?
बिहार की राजनीति में आने वाले दिनों में तस्वीर और साफ हो सकती है। फिलहाल, बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप के बीच सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है।





