भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और स्वतंत्रता-उपरांत सामाजिक न्याय के आंदोलनों के इतिहास में अनेक ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनका योगदान राष्ट्र-निर्माण में अत्यंत निर्णायक रहा, किंतु मुख्यधारा के इतिहास लेखन ने उन्हें वह स्थान नहीं दिया जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। त्यागमूर्ति राम लखन सिंह चन्दापुरी, जिन्हें देश भर में आर. एल. चन्दापुरी के नाम से जाना जाता है, ऐसे ही एक असाधारण व्यक्तित्व थे। वे न केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, बल्कि स्वतंत्र भारत में पिछड़े वर्गों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों के सबसे प्रारंभिक, संगठित और वैचारिक सूत्रधार भी थे।
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आर. एल. चन्दापुरी का जीवन केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं है, बल्कि यह भारत के बहुसंख्यक दलित–आदिवासी–पिछड़े समाज के संघर्ष, चेतना और मुक्ति-सपने का इतिहास है। उन्होंने उस समय पिछड़ा वर्ग आंदोलन की नींव रखी, जब देश की राजनीति और प्रशासन पर उच्च वर्गों का पूर्ण वर्चस्व था और पिछड़ी जातियों को ‘राजनीति के अयोग्य’ समझा जाता था।
वंश परंपरा और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
त्यागमूर्ति आर. एल. चन्दापुरी का जन्म 20 नवंबर 1923 को बिहार के पटना जिले के बसुहार गांव में उनके ननिहाल में हुआ। उनका पालन-पोषण पैतृक गांव चन्दापुर, मगध क्षेत्र के बोधगया प्रखंड में हुआ। उनका परिवार अवधिया कुर्मी जाति से संबंधित एक मध्यम किसान परिवार था। उनके पिता महावीर सिंह ‘खलीफा’ के नाम से प्रसिद्ध थे, जो अपने क्षेत्र में साहसी, स्वाभिमानी और न्यायप्रिय व्यक्ति माने जाते थे। माता हीरामणि कुंअर एक धार्मिक, सहनशील और नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण महिला थीं।
चन्दापुरी परिवार की परंपरा केवल कृषि तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसमें संघर्ष और स्वाभिमान की गहरी ऐतिहासिक जड़ें थीं। परिवार की मौखिक और ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, आर. एल. चन्दापुरी के पूर्वज छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनानियों में से एक थे। शिवाजी महाराज के आगरा किले से गुप्त रूप से निकलने के बाद उनके साथ जो सेनानी मुगल सत्ता से बचते हुए बिहार के मगध क्षेत्र में आ बसे, उनमें एक नाम बालाजी राव का था। बालाजी राव की सातवीं पीढ़ी में राम लखन सिंह चन्दापुरी का जन्म हुआ।
यह वंश परंपरा केवल गौरव का विषय नहीं थी, बल्कि संघर्ष, प्रतिरोध और आत्मसम्मान की वैचारिक विरासत थी, जिसने आगे चलकर आर. एल. चन्दापुरी के व्यक्तित्व और आंदोलन को गहराई से प्रभावित किया।
बचपन, सामाजिक अनुभव और चेतना का विकास
आर. एल. चन्दापुरी का बचपन ग्रामीण बिहार की उस सामाजिक संरचना में बीता, जहाँ जाति आधारित भेदभाव जीवन के हर स्तर पर व्याप्त था। उन्होंने बहुत कम उम्र में यह अनुभव कर लिया था कि समाज में सम्मान और अपमान व्यक्ति के गुणों से नहीं, बल्कि उसकी जाति से निर्धारित होता है।
सात वर्ष की आयु में घटी एक घटना ने उनके बाल मन पर अमिट छाप छोड़ी। उनके दादा रामरूच महतो संग खटोली पर मसौढ़ी जा रहे थे। रास्ते में एक भूमिहार ब्राह्मण जमींदार को हाथी पर सवार देखकर उनके दादा तुरंत खटोली से उतर गए और उन्हें भी उतार दिया। बाद में जब चन्दापुरी ने इसका कारण पूछा, तो उन्हें बताया गया कि उच्च जाति के व्यक्ति के सामने खटोली पर बैठना निषिद्ध है।
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यह घटना उनके लिए पहला बौद्धिक आघात थी। उन्होंने महसूस किया कि ज्ञान, योग्यता और नैतिकता के बावजूद उनकी जाति उन्हें ‘छोटा’ बना देती है। यही अनुभव आगे चलकर उनके सामाजिक दर्शन की नींव बना।
विद्यालय जीवन में भी उन्होंने जातिगत उत्पीड़न को बहुत निकट से देखा। मसौढ़ी के अपर प्राइमरी स्कूल में पढ़ते समय उन्होंने एक यादव छात्र के साथ प्रधानाध्यापक द्वारा किए गए अमानवीय व्यवहार को देखा—मारपीट, अपमान और शारीरिक यातना। यह धटना उनके मन में गहरे प्रश्न पैदा किए कि क्या शिक्षा व्यवस्था भी जातिवाद से मुक्त नहीं है?
छात्र जीवन और स्वतंत्रता संग्राम
आर. एल. चन्दापुरी बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। 1938 में वे मसौढ़ी हाई स्कूल की नौवीं कक्षा के अव्वल छात्र थे। लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थितियों और स्वतंत्रता की पुकार ने उन्हें पुस्तकों से अधिक संघर्ष के मैदान की ओर खींच लिया। उन्होंने औपचारिक पढ़ाई छोड़कर छात्र आंदोलन में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी।
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1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था। उस समय वे पटना विश्वविद्यालय के छात्र थे। आंदोलन के दौरान उन्होंने सबसे पहले चहारदीवारी लांघकर पटना सचिवालय में प्रवेश किया और वहां तिरंगा फहराया। उसी दिन पुलिस की गोलियों से सात छात्र शहीद हुए। यह घटना उनके लिए केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक प्रतिबद्धता का क्षण था।
वे पुलिस की पकड़ से बचते हुए गांव-गांव घूमते रहे। इस दौरान उन्हें दलितों, मुसहरों और किसानों ने शरण दी। इससे उनके मन में यह विश्वास दृढ़ हुआ कि देश के सच्चे देशभक्त वही हैं, जो श्रम और उत्पीड़न का जीवन जीते हैं।

नोआखाली दंगे, शांति मिशन और महात्मा गांधी
1946 में बंगाल के नोआखाली में भयानक सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, जिनकी लपटें शीघ्र ही बिहार तक पहुँच गईं। उस समय आर. एल. चन्दापुरी पटना विश्वविद्यालय में एम.ए. के अंतिम वर्ष के छात्र थे। लेकिन जब उनका इलाका दंगों की आग में घिरने लगा, तो उन्होंने अपनी पढ़ाई स्थगित कर दी और शांति स्थापना के कार्य में स्वयं को पूरी तरह झोंक दिया।
उन्होंने न केवल दंगाइयों का प्रतिरोध किया, बल्कि हिंदू–मुस्लिम समुदायों के बीच संवाद स्थापित कर अपने क्षेत्र को जलने से बचा लिया। उनके नेतृत्व, निर्भीकता और नैतिक साहस के कारण स्थानीय मुसलमानों ने उन पर पूर्ण विश्वास व्यक्त किया।
1947 में जब शांति मिशन के अंतर्गत महात्मा गांधी मसौढ़ी पहुँचे, तो उन्होंने इस युवा नेता के कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। गांधी ने तत्काल उन्हें पुनर्वास कार्य की जिम्मेदारी सौंपी और आशीर्वाद दिया। उस समय अब्दुल गफ्फार खान तथा अफ्रीकी कांग्रेस के नेता दादू भी वहाँ उपस्थित थे। गांधी के लिए यह अनुभव असाधारण था कि एक पिछड़े वर्ग का नवयुवक सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे विश्वसनीय प्रतीक बन गया।
संविधान निर्माण, डॉ. आंबेडकर और धारा 340
स्वतंत्रता के तुरंत बाद आर. एल. चन्दापुरी ने यह समझ लिया था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक सामाजिक और संवैधानिक न्याय सुनिश्चित न हो। इसी उद्देश्य से उन्होंने संविधान निर्माण की प्रक्रिया पर गहरी दृष्टि रखी।
1948 में उन्होंने दिल्ली जाकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर से उनके निवास पर भेंट की। इस ऐतिहासिक संवाद का परिणाम यह हुआ कि संविधान में पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान करने हेतु अनुच्छेद 340 का समावेश हुआ। यही अनुच्छेद आगे चलकर 1953 में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे काका कालेलकर आयोग कहा गया, के गठन का संवैधानिक आधार बना।
इसी क्रम में 1949 में उन्होंने तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से भेंट कर पिछड़ी जातियों के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था सुनिश्चित करवाई। यह स्वतंत्र भारत में पिछड़े वर्गों के लिए शिक्षा के क्षेत्र में पहला ठोस सरकारी हस्तक्षेप था।

‘पिछड़ा वर्ग’ शब्द की वैचारिक खोज और संगठन निर्माण
आर. एल. चन्दापुरी का सबसे मौलिक योगदान ‘पिछड़ी जाति’ की जगह ‘पिछड़ा वर्ग’ शब्द की वैचारिक स्थापना थी। उन्होंने पहली बार यह स्पष्ट किया कि यह केवल जातियों की सूची नहीं, बल्कि सामाजिक–आर्थिक वंचना की एक व्यापक श्रेणी है। यही अवधारणा आगे चलकर संविधान और प्रशासनिक भाषा का हिस्सा बनी।
10 सितंबर 1947 को पटना में, उनके सभापतित्व में, बिहार प्रांतीय पिछड़ा वर्ग संघ की स्थापना हुई। यही संगठन आगे चलकर ‘अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ’ बना। 1950 में दिल्ली के दीवान हॉल में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में महाराष्ट्र के नेता पंजाबराव देशमुख को अखिल भारतीय पिछड़ा वर्ग संघ का सभापति चुना गया। इस प्रकार चन्दापुरी ने बिहार से निकलकर देशव्यापी आंदोलन की नींव रखी।
नेहरू बनाम चन्दापुरी — वैचारिक टकराव
1955 में जब काका कालेलकर आयोग ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपीं, तब 24 अक्टूबर को आर. एल. चन्दापुरी प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिले। लगभग पचास मिनट की बातचीत में नेहरू ने सिफारिशें लागू करने का आश्वासन दिया, किंतु व्यवहार में सरकार ने उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया।
यहीं से नेहरू और चन्दापुरी के बीच गहरा वैचारिक विभेद पैदा हुआ। चन्दापुरी का मानना था कि बिना सामाजिक न्याय के लोकतंत्र केवल सवर्ण वर्चस्व का उपकरण बन जाता है। इस संघर्ष का विस्तृत विवरण उनकी पुस्तक ‘नेहरू बनाम चन्दापुरी’ में उपलब्ध है।
लोहिया, मंडल और सत्ता-संरचना में हस्तक्षेप
1956 में डॉ. राम मनोहर लोहिया स्वयं पटना आकर तीन दिनों तक आर. एल. चन्दापुरी के निवास पर ठहरे। इन विचार-विमर्शों का परिणाम यह हुआ कि लोहिया पिछड़े वर्गों के आरक्षण के प्रबल समर्थक बने और चन्दापुरी को ‘गुरुजी’ कहकर संबोधित करने लगे।
1967 में चन्दापुरी ने यह ऐतिहासिक चुनौती स्वीकार की कि बिहार का मुख्यमंत्री पिछड़े वर्ग से बने। उनके प्रयासों से बी. पी. मंडल मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने आगे चलकर दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) का नेतृत्व किया।
वैचारिक दर्शन, साहित्य और ऐतिहासिक मूल्यांकन
आर. एल. चन्दापुरी ने मार्क्स के वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की सीमाओं को रेखांकित करते हुए जाति-संघर्ष को भारतीय समाज की केंद्रीय सच्चाई बताया। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘दीप-प्रभा’, ‘भारत में ब्राह्मण राज और पिछड़ा वर्ग आंदोलन’ तथा ‘Second Freedom Struggle’ उल्लेखनीय हैं।
ऑस्ट्रेलियाई विद्वान डॉ. स्टीफन हेन्निंघम के अनुसार, चन्दापुरी का आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के उच्चतर नैतिक मूल्यों की स्थापना का प्रयास था।
आलोचनाएँ, उपेक्षा और मुख्यधारा इतिहास से बहिष्कार
इतने व्यापक और राष्ट्रव्यापी योगदान के बावजूद आर. एल. चन्दापुरी को वह स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। इसका मुख्य कारण यह था कि उनका आंदोलन सीधे उस सामाजिक-सांस्कृतिक वर्चस्व को चुनौती देता था, जो स्वतंत्र भारत की सत्ता संरचना पर काबिज था। इतिहास लेखन, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम और सरकारी स्मृतियों में उन्हें लगभग अनुपस्थित रखा गया।
चन्दापुरी स्वयं इस ऐतिहासिक अन्याय से भली-भांति परिचित थे। उन्होंने लिखा कि स्वतंत्र भारत में इतिहास वही लिखा जा रहा है, जो सत्ता में बैठे वर्गों के हित में हो। पिछड़े वर्गों के संघर्षों को जानबूझकर हाशिये पर रखा गया। यही कारण है कि नेहरू, पटेल और अन्य नेताओं पर सैकड़ों ग्रंथ उपलब्ध हैं, किंतु चन्दापुरी जैसे नेताओं पर गंभीर अकादमिक अध्ययन बहुत कम हैं।
चन्दापुरी का सामाजिक दर्शन और भारतीय लोकतंत्र
आर. एल. चन्दापुरी का सामाजिक दर्शन भारतीय लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ था। वे मानते थे कि जब तक सत्ता, संसाधन और सम्मान का समान वितरण नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बना रहेगा।
उन्होंने बार-बार कहा कि भारत में क्रांति यदि होगी तो उसका नेतृत्व पिछड़ी जातियों के हाथों में होगा, क्योंकि वे ही उत्पादन, श्रम और राष्ट्र-निर्माण की वास्तविक शक्ति हैं। उनका लोकतंत्र बहुसंख्यकों की भागीदारी पर आधारित था, न कि केवल चुनावी गणित पर।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और वैश्विक महत्व
आर. एल. चन्दापुरी के विचार केवल भारतीय संदर्भ तक सीमित नहीं थे। उन्होंने नस्ल, रंग, जाति और वर्ग के आधार पर होने वाले भेदभाव को एक वैश्विक समस्या के रूप में देखा। यही कारण है कि अफ्रीकी कांग्रेस के नेताओं और अंतरराष्ट्रीय विद्वानों ने उनके आंदोलन को गंभीरता से लिया।
ऑस्ट्रेलियाई विद्वान डॉ. स्टीफन हेन्निंघम ने चन्दापुरी के आंदोलन को विश्व-बंधुत्व और मानव समानता के संघर्ष का अभिन्न हिस्सा बताया। यह मूल्यांकन उन्हें एक क्षेत्रीय नेता से ऊपर उठाकर वैश्विक चिंतक के रूप में स्थापित करता है।
निधन, विरासत और समकालीन प्रासंगिकता
31 अक्टूबर 2004 को पटना में त्यागमूर्ति आर. एल. चन्दापुरी का निधन हुआ। उनका जीवन त्याग, संघर्ष और वैचारिक दृढ़ता का प्रतीक था। आज जब भारत में सामाजिक न्याय, आरक्षण और बहुजन राजनीति पर पुनः बहस तेज हो रही है, तब चन्दापुरी के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं।
उनकी विरासत केवल स्मृति नहीं, बल्कि संघर्ष की निरंतरता है। वे एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक प्रक्रिया थे।
समकालीन परिप्रेक्ष्य : आज का भारत
इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर चुका भारत तकनीकी, आर्थिक और वैश्विक स्तर पर चाहे जितना आधुनिक दिखाई दे, लेकिन सामाजिक संरचना के स्तर पर जाति की जकड़न आज भी उतनी ही गहरी है। रूप बदले हैं, भाषा बदली है, लेकिन सत्ता, अवसर और सम्मान का वितरण अब भी जातिगत श्रेणियों से नियंत्रित होता दिखाई देता है।
आज का समय आर. एल. चन्दापुरी के विचारों को और अधिक प्रासंगिक बनाता है। निजीकरण, संविदा व्यवस्था, शिक्षा और नौकरियों में अवसरों का संकुचन—इन सबका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव उसी बहुजन समाज पर पड़ा है, जिसके उत्थान के लिए चन्दापुरी ने जीवन भर संघर्ष किया। ऐसे में उनका पिछड़ा वर्ग आंदोलन केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान का आईना और भविष्य की चेतावनी है।
हिंदी साहित्य के महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु की चेतावनी को यदि आज के संदर्भ में पढ़ा जाए, तो वह सिर्फ अपने समय के लिए नहीं थी। वह हमारे लिए थी — आज के लिए भी है।
जाति गई नहीं है, उसने सिर्फ अपना रूप बदला है। वह अब नाम लेकर नहीं आती, लेकिन अवसरों की सीढ़ी तय करती है, सम्मान की सीमा बनाती है, और सत्ता की कुर्सी तक पहुँच को नियंत्रित करती है।
इसलिए जब मैं लिखता हूँ कि “जाति है कि जाती नहीं — यह रेणु की चेतावनी आज भी उतनी ही सच है, जितनी कभी थी।” तो मैं किसी साहित्यिक पंक्ति को दोहरा नहीं रहा होता, बल्कि अपने समय की सामाजिक हकीकत को दर्ज कर रहा होता हूँ।
यह पंक्ति केवल साहित्यिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संरचनात्मक सच्चाई का संक्षिप्त लेकिन सटीक निदान है। यही वह सच्चाई है, जिसे आर. एल. चन्दापुरी ने अपने पूरे जीवन में उजागर किया और जिसके विरुद्ध उन्होंने संगठन, आंदोलन और वैचारिक संघर्ष खड़ा किया।
भारतीय सामाजिक न्याय आंदोलन का अमर स्तंभ
आर. एल. चन्दापुरी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि इतिहास केवल सत्ता के गलियारों में नहीं, बल्कि संघर्ष के मैदानों में गढ़ा जाता है। उन्होंने भारतीय समाज की आत्मा को पहचाना और बहुजन समाज को उसकी शक्ति का बोध कराया।
वे निःसंदेह भारतीय सामाजिक न्याय आंदोलन के अमर स्तंभ, पिछड़ा वर्ग राजनीति के मूल चिंतक और आधुनिक भारत के सबसे उपेक्षित राष्ट्रनिर्माताओं में से एक थे।




