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गन्ना प्रौद्योगिकी सेमिनार–2026: बिहार में उत्पादन बढ़ाने की रणनीतियाँ तय’

पटना में दो दिवसीय सेमिनार में वैज्ञानिकों और उद्योग प्रतिनिधियों ने मॉडर्न बीज, यंत्रीकरण और जलवायु-अनुकूल तकनीक पर जोर देकर गन्ना क्षेत्र विस्तार तकनीकें सुझाईं।

गन्ना की खेती।

Farm Innovation : पटना और कृषि जगत के प्रतिनिधियों के बीच हाल ही में आयोजित गन्ना प्रौद्योगिकी सेमिनार–2026 में कृषि-विज्ञान, तकनीक और नीति को खेत तक पहुंचाने पर विशेष जोर रहा। इस कार्यक्रम में मुख्य आयोजन स्थल के रूप में उपस्थित थे Patna के गांधी मैदान के समीप स्थित ज्ञान भवन और आयोजन का नेतृत्व कर रही थी Ganna Industry Department; कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता में शामिल थे Anil Jha, P. S. Pandey, और अन्य राष्ट्रीय विशेषज्ञ। शैक्षिक एवं शोध संस्थानों की ओर से भी व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किए गए — इनमें प्रमुख थे Rajendra Prasad Central Agricultural University, Pusa, Indian Sugarcane Research Institute, Lucknow, Sugarcane Breeding Institute, Coimbatore तथा तकनीकी टेक-प्रवर्तन पर IIT Patna की टीम।’

सेमिनार के उद्घाटन और प्राथमिक सत्रों में गन्ना आयुक्त ने स्पष्ट किया कि राज्य में गन्ने की पैदावार और क्षेत्र विस्तार तभी संभव है जब खेत-स्तर पर उन्नत बीज (ब्रीडर सीड), क्षेत्रीय तकनीकी समर्थन और संस्थागत समन्वय का समुचित नेटवर्क बनाया जाए। उन्होंने कहा कि नीति-निर्माताओं, शोध संस्थानों और उद्योग को मिलकर किसान-केंद्रित सेवाओं का त्वरित क्रियान्वयन करना होगा ताकि किसानों के बीच नई तकनीकों का स्वीकार्य विस्तार हो।’

कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पीएस पांडेय ने अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि बिहार में गन्ने के अनुकूल भूमि-क्षेत्रों की पहचान कर वहां उपयुक्त प्रजातियों का विस्तार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शोध-आधारित पैदावार प्राथमिकताओं—जैसे रोग-प्रतिरोधी व उच्च शुगर दोनों गुणों वाले वेरिएंट—पर फोकस करना होगा ताकि चीनी मिलों को स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। केंद्रीय विश्वविद्यालय की टीम ने क्षेत्रीय परीक्षणों और परिणामों का उल्लेख करते हुए किसानों के लिए व्यवहारिक तकनीकी पैकेज सुझाए।’

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. आर. विश्वनाथन ने रोग-परिदृश्य और प्रबंधन पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि बिहार में फसल निगरानी प्रणाली को सुदृढ़ कर समय पर पहचान व लक्षित रासायनिक/जीववैज्ञानिक नियंत्रण अपनाना होगा। उनका कहना था कि केवल रोग नियंत्रण ही उत्पादन नहीं बल्कि गुणवत्ता व उद्योग-स्थिरता का भी निर्धारण करता है। उन्होंने फसलों में जैविक कीट नियंत्रण व रोटेशन तकनीक के संयोजन का सुझाव दिया।’

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गन्ना ब्रीडिंग व उन्नत बीज उत्पादन पर शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट, कोयंबटूर के निदेशक डॉ. पी. गोविंदराज ने विस्तार से बात की। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘ब्रीडर सीड’ का उत्पादन बढ़ाने और उसके वितरण को प्रभावी बनाने के लिए सरकारी-निजी साझेदारी (PPP) मॉडल अपनाने होंगे। गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री ही बेहतर उपज की नींव है, इसलिए बिहार में ब्रीडर नेटवर्क स्थापित करने की सिफारिश की गई।

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तकनीकी सत्रों में आईआईटी पटना के विशेषज्ञों ने कृषि-टेक के आधुनिक उपकरण — एआई-आधारित रोग पहचान, ब्लॉकचेन व क्यूआर कोड आधारित बीज सत्यापन प्रणाली — पर पायलट प्रस्ताव प्रस्तुत किए। इनका उद्देश्य गन्ना प्रजातियों की शुद्धता सुनिश्चित करना, खरीद विक्रय श्रृंखला में पारदर्शिता लाना और किसानों को प्रमाणित बीज उपलब्ध कराना बताया गया। तकनीक से न केवल बीज की प्रमाणिकता बढ़ेगी, बल्कि मिलों व खरीदारों के साथ किसानों के सौदों में भी पारदर्शिता आएगी।’

सेमिनार में जलवायु-अनुकूल खेती पर भी उपयोगी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि जलजमाव-प्रवण और क्षारीयता प्रभावित क्षेत्रों के लिए सहनशील प्रजातियों का विकास और भूमि सुधार उपायों पर भारी निवेश की आवश्यकता है। बेतिया जैसे इलाकों की soil-alkalinity समस्या पर शोध प्रस्तुतियों में कहा गया कि उर्वरता सुधार, जैव-मैटेरियल और उपयुक्त उर्वरक प्रबंधन से भूमि की उत्पादकता में सुधार संभव है।

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कार्यक्रम के दौरान 25 शोध-पत्रों का संग्रह विमोचित किया गया, जिनमें विविध भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप आदर्श कृषि प्रबंधन, यंत्रीकरण के मॉडल, तथा मिल-किसान समन्वय के व्यावहारिक अनुशंसाएँ शामिल थीं। सेमिनार के समापन सत्र में उद्योग प्रतिनिधियों ने बताया कि मिल-आधारित क्रय नीति, संवर्धित प्रोसेसिंग इकाइयां और छोटे किसानों के लिए क्लस्टर-आधारित रोपण योजनाएं लागू की जानी चाहिए।

कुल मिलाकर इस सेमिनार ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार में गन्ना क्षेत्र को अगले चरण में ले जाने के लिए — (1) ब्रिडर-सीड का पैमाना बढ़ाना, (2) यंत्रीकरण व खेत-स्तर पर मशीनरी पहुँचाना, (3) रोग निगरानी व प्रबंधन मजबूत करना, और (4) डिजिटल प्रमाणिकरण व आपूर्ति श्रृंखला पारदर्शिता जैसे कदम अनिवार्य हैं। आयोजकों ने घोषणा की कि आने वाले महीनों में पायलट परियोजनाओं और प्रशिक्षण कार्यशालाओं के माध्यम से प्रस्तावित तकनीकों का परीक्षण व विस्तार किया जाएगा।

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