
मिथिला ज्ञान, संस्कृति और परम्परा की भूमि रही है। पौराणिक काल से लेकर आधुनिक समय तक मिथिला का नाम विद्वता, दर्शन, संस्कृति और साहित्य के कारण विश्व प्रसिद्ध रहा है। मिथिला के राजा जनक का दरबार विद्वानों के साथ-साथ विदुषी स्त्रियों के कारण भी प्रसिद्ध था। लेकिन जब इस गौरवशाली इतिहास से अलग होकर आज की स्त्री की स्थिति पर दृष्टि डालते हैं, तो मन में एक प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में मैथिल नारी अपनी पहचान प्राप्त कर सकी है? विडम्बना यह है कि जिस समाज ने सदैव स्त्री को शक्ति कहा, वही मैथिल नारी आज भी अपनी पहचान तलाशती दिखाई देती है।
मिथिला का पौराणिक इतिहास नारी शक्ति के बिना अधूरा है। उस काल में विदुषी स्त्रियों के अनेक उदाहरण मिलते हैं। गार्गी वाचक्नवी ज्ञान और दर्शन की अद्भुत प्रतीक थीं। मिथिला नरेश जनक के दरबार में आयोजित सभा में गार्गी ने निर्भीक होकर महर्षि याज्ञवल्क्य से अनेक प्रश्न किए थे। यह केवल ज्ञान का परिचय नहीं था, बल्कि स्त्री की बौद्धिक स्वतंत्रता का प्रमाण भी था। उसी काल में मैत्रेयी भी उच्च दार्शनिक चिंतन की प्रतिनिधि थीं। याज्ञवल्क्य के साथ उनका संवाद अमूल्य धरोहर माना जाता है, जहाँ मैत्रेयी स्पष्ट रूप से कहती हैं कि धन-सम्पत्ति से अधिक महत्वपूर्ण आत्मज्ञान है।
उस समय भारती का नाम भी आदर से लिया जाता है। मंडन मिश्र और शंकराचार्य के प्रसिद्ध शास्त्रार्थ में भारती निर्णायक बनी थीं और स्वयं एक प्रखर विदुषी के रूप में सामने आई थीं। ये उदाहरण बताते हैं कि प्राचीन मिथिला में स्त्री केवल घर की सीमाओं में बँधी हुई नहीं थी, बल्कि ज्ञान, तर्क और विचार के केन्द्र में सक्रिय रूप से उपस्थित थी।
लेकिन समय के साथ समाज की संरचना बदलती गई और स्त्री की स्थिति भी बदलती गई। धीरे-धीरे स्त्री की भूमिका घर-परिवार की सीमाओं में सिमटती चली गई। परम्परा और सामाजिक बंधन इतने मजबूत हो गए कि स्त्री का स्वतंत्र अस्तित्व लगभग समाप्त होने लगा। मिथिला का समाज जितना अपनी विद्वता और संस्कृति पर गर्व करता रहा, उतना स्त्री की वास्तविक स्थिति पर गंभीर चिंतन बहुत कम हुआ। परिणाम यह हुआ कि आज मिथिला की अधिकांश स्त्रियाँ अपने श्रम और संघर्ष के बावजूद पहचान से वंचित हैं।
यदि आज ग्रामीण मिथिला की स्थिति पर दृष्टि डालें, तो वास्तविकता अत्यंत निराशाजनक दिखाई देती है। अनुमानतः अस्सी प्रतिशत से अधिक मैथिल महिलाएँ खेत-खलिहान से लेकर ईंट-भट्ठों और घरेलू कार्यों तक में मजदूर के रूप में कार्य करती हैं। भोर के अंधेरे में खेत में रोपनी करती स्त्री, हाथ में हंसुआ लेकर घास काटती स्त्री, सिर पर घास का बोझ उठाती स्त्री, और दिनभर मजदूरी करने के बाद शाम को घर का चूल्हा-चौका और बच्चों की देखभाल करती स्त्री—यह दृश्य मिथिला के गाँवों में सामान्य है। समाज की आर्थिक संरचना में स्त्री का श्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है, परन्तु वह सम्मान और पहचान में परिवर्तित नहीं हो पाता। आर्थिक योगदान के बावजूद निर्णय लेने का अधिकार प्रायः पुरुषों के हाथ में ही रहता है।
शिक्षा के क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में अवश्य कुछ परिवर्तन देखने को मिला है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लड़कियों की संख्या बढ़ी है। बिहार में महिला साक्षरता दर धीरे-धीरे बढ़कर लगभग साठ प्रतिशत तक पहुँच गई है, लेकिन मिथिला के ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा की स्थिति अभी भी कमजोर है। बहुत कम लड़कियाँ स्नातक या उससे ऊपर की शिक्षा प्राप्त कर पाती हैं। अनुमानतः केवल पाँच से दस प्रतिशत मैथिल कन्याएँ ही उच्च शिक्षा का अवसर प्राप्त कर पाती हैं। शिक्षा को स्त्री सशक्तिकरण का मूल आधार माना जाता है, लेकिन जब शिक्षा के अवसर सीमित होंगे तो आत्मनिर्भरता और सामाजिक पहचान भी सीमित ही रहेगी।
राजनीतिक स्तर पर महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से बिहार में पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू किया गया। इस व्यवस्था से हजारों महिलाएँ मुखिया, सरपंच, वार्ड सदस्य और जिला परिषद प्रतिनिधि बनीं। पहली दृष्टि में यह परिवर्तन क्रांतिकारी लगता है, लेकिन जमीनी सच्चाई अक्सर निराशाजनक दिखाई देती है। कई गाँवों में महिला प्रतिनिधि केवल नाममात्र की रह जाती हैं और वास्तविक निर्णय पुरुष लेते हैं। समाज में “मुखियापति” और “सरपंचपति” जैसे शब्द प्रचलित हो गए हैं। ये शब्द स्वयं बताते हैं कि असली सत्ता किसके हाथ में है। जब निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के पास भी निर्णय लेने का अधिकार नहीं होता, तो राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अर्थ अधूरा रह जाता है।
समस्या केवल यहीं तक सीमित नहीं है। सामाजिक मानसिकता अभी भी उतनी ही कठोर है जितनी शायद वर्षों पहले थी। यदि आज कोई मैथिल बेटी गार्गी या भारती की तरह किसी याज्ञवल्क्य या शंकराचार्य जैसे विद्वान के सामने खड़ी होकर प्रश्न पूछे, तो रूढ़िवादी समाज उसकी विद्वता की प्रशंसा करने के बजाय उसके चरित्र, संस्कार और व्यवहार पर प्रश्न उठाने लगेगा। उसकी निर्भीकता को नकारात्मक माना जाएगा और उसके तर्क को नजरअंदाज कर दिया जाएगा। यह मानसिकता स्वयं बताती है कि हम गार्गी और भारती का नाम तो गर्व से लेते हैं, लेकिन उनके जैसा साहस और बौद्धिक स्वतंत्रता आज भी स्वीकार करने का साहस समाज में नहीं है।
खेल के क्षेत्र में स्थिति और भी कमजोर है। जबकि खेल एक ऐसा माध्यम है जो स्त्री को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बनाता है। देश के अन्य भागों में महिलाएँ खेलों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कर रही हैं, लेकिन मिथिला की बेटियों की उपस्थिति राष्ट्रीय स्तर पर लगभग नगण्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में खेल के मैदान, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन का अभाव है। सामाजिक मानसिकता भी एक बाधा बनती है। कई घरों में अभी भी यह मान्यता है कि लड़की की मुख्य जिम्मेदारी घर और परिवार है, खेल नहीं। इस सोच के कारण कई प्रतिभाशाली बेटियों के सपने प्रारम्भ होने से पहले ही समाप्त हो जाते हैं।
मैथिल समाज में दहेज प्रथा भी नारी की पहचान के रास्ते में एक गंभीर बाधा है। बेटी के जन्म के साथ ही कई परिवार आर्थिक चिंता में पड़ जाते हैं। विवाह के समय दहेज का दबाव कई बार बेटियों की शिक्षा और स्वावलंबन को प्रभावित करता है। दहेज के कारण घरेलू हिंसा और सामाजिक उत्पीड़न की घटनाएँ भी सामने आती हैं। यह स्थिति स्त्री के आत्मविश्वास को कमजोर करती है। समय के साथ इस कुप्रथा पर रोक लगाना आवश्यक है।
इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद मैथिल नारी मिथिला की संस्कृति और परम्पराओं को बचाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। लोकगीत, सोहर, समदाउन, विवाह संस्कार गीत, मधुबनी चित्रकला और लोककला—इन सबमें स्त्री का प्रमुख योगदान है। गाँव के आँगन में गूंजते लोकगीत मिथिला की सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखते हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि संस्कृति को बचाने वाली यही स्त्री सामाजिक निर्णय प्रक्रिया में कम दिखाई देती है। दूसरी ओर यह भी देखा जा रहा है कि पहचान बना चुकी कुछ मैथिल महिलाएँ अपनी ही सभ्यता, गीत और संस्कृति से कटती जा रही हैं, और मिथिला के लोक व्यवहार पर सिनेमा संस्कृति का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जो चिंताजनक है।
मैथिली साहित्य के क्षेत्र में स्त्रियों की उपस्थिति पिछले समय में निश्चित रूप से बढ़ी है। कवयित्री, कथाकार और लेखिकाओं की संख्या पहले की तुलना में अधिक हुई है। अनेक महिलाएँ साहित्य सृजन में सक्रिय हैं और अपनी रचनात्मक प्रतिभा से मैथिली साहित्य को समृद्ध कर रही हैं। फिर भी एक प्रश्न उठता है कि आम मैथिल स्त्री का जीवन, उसकी पहचान का संकट, उसका संघर्ष, पीड़ा और व्यथा साहित्य में अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। संभव है कि यह मेरे अध्ययन की सीमा हो, लेकिन सामान्यतः साहित्य में इस यथार्थ का व्यापक चित्रण बहुत कम देखने को मिलता है। जब तक साहित्य समाज की इस मौन पीड़ा को स्वर नहीं देगा, तब तक स्त्री के वास्तविक संघर्ष पूरी तरह सामने नहीं आ सकेंगे।
मीडिया, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में भी महिलाओं की भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन अभी उनकी संख्या बहुत कम है। जब तक स्त्रियाँ नीति निर्माण, प्रशासन, मीडिया और नेतृत्व के केन्द्र में पर्याप्त संख्या में नहीं पहुँचेंगी, तब तक सामाजिक सोच में वास्तविक परिवर्तन कठिन होगा।
हालाँकि समय पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। शिक्षा, इंटरनेट और सामाजिक जागरूकता के कारण नई पीढ़ी में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। मिथिला की अनेक बेटियाँ डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, कलाकार और उद्यमी बन रही हैं। शहरों में पढ़ने वाली लड़कियाँ आत्मविश्वास के साथ अपने भविष्य का निर्माण करने का प्रयास कर रही हैं। धीरे-धीरे समाज की सोच भी बदल रही है।
मिथिला का इतिहास गार्गी, मैत्रेयी, भामति और भारती जैसी विदुषी स्त्रियों के उदाहरणों से भरा हुआ है। आज की चुनौती यह है कि आधुनिक मिथिला की नारी फिर वही आत्मविश्वास प्राप्त करे। केवल अतीत का गौरव गान करने से काम नहीं चलेगा। समाज को वास्तविक अर्थ में स्त्री को समान अवसर, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान देना होगा। जब प्रश्न पूछने का साहस, विचार रखने की स्वतंत्रता और निर्णय लेने का अधिकार स्त्री को सहज रूप से प्राप्त होगा, तब मैथिल नारी निश्चित रूप से अपनी पहचान बना सकेगी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर सभी महिलाओं को यही संदेश देना है कि वे अपनी पहचान स्वयं बनाएँ।
( मूल मैथिली से हिन्दी अनुवाद : टीम गाम घर )





