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BCCI समर्थन के बावजूद वैभव सूर्यवंशी अभी डेब्यू क्यों नहीं कर सकते?

BCCI के चाहने के बावजूद Vaibhav Suryavanshi क्यों नहीं कर सकते भारतीय टीम में डेब्यू? ये है वजह

नई दिल्ली : भारत के उभरते सितारे वैभव सूर्यवंशी (Vaibhav Suryavanshi) ने अंडर-19 वर्ल्ड कप के फाइनल में इंग्लैंड के खिलाफ केवल 80 गेंदों में 175 रन की तूफानी पारी खेलकर सबको दंग कर दिया। 15 चौके और 15 छक्कों की बरसात में वैभव ने अपनी धमाकेदार बल्लेबाजी से युवा क्रिकेट प्रेमियों का दिल जीत लिया। कई क्रिकेट विशेषज्ञ और दर्शक चाहते हैं कि ऐसा बल्लेबाज़ जल्द से जल्द राष्ट्रीय टीम में जगह पाये। फिर भी सवाल उठता है — अगर BCCI वैभव की काबिलियत देख रहा है, तो वे क्यों अभी तक भारतीय टीम में डेब्यू नहीं कर सकते?

सबसे बड़ा कारण है उम्र और दीर्घकालिक विकास रणनीति। खबर के मुताबिक वैभव मात्र 14 साल के हैं — ऐसा बेहद कम देखने को मिलता है कि कोई खिलाड़ी इतने कम उम्र में सीनियर स्तर पर स्थायी रूप से उतरे। राष्ट्रीय चयनकर्ता और बोर्डों की प्राथमिकता आम तौर पर खिलाड़ी के दीर्घकालिक करियर और शारीरिक-मानसिक भलाई होती है। अचानक सीनियर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उतार देना बच्चे के शरीर पर अत्यधिक भार डाल सकता है और उससे चोट का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए प्रबंधन अक्सर युवा प्रतिभाओं को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाता है — पहले घरेलू क्रिकेट, फिर इंडिया ‘A’ या लिमिटेड ओवर श्रृंखलाएँ, उसके बाद अंतरराष्ट्रीय मौका।

दूसरा कारण है अनुभव की कमी और घरेलू परख। राष्ट्रीय टीम में जगह पाने के लिए सिर्फ एक शानदार इनिंग पर्याप्त नहीं मानी जाती। चयन समिति आम तौर पर चाहती है कि खिलाड़ी ने रणजी ट्रॉफी, प्रथम श्रेणी या आईपीएल जैसे प्रतियोगिताओं में लगातार प्रदर्शन दिखाया हो। ये पारंपरिक मंच खिलाड़ियों की धैर्य, तकनीक और परिस्थितियों के साथ मजबूती परखते हैं। वैभव ने विश्व मंच पर चमक दिखाई है, पर घरेलू सीन में लगातार सफल होना चयन में अहम भूमिका निभाता है।

तीसरा कारण है वर्कलोड मैनेजमेंट और करियर प्लानिंग। BCCI और टीम मैनेजमेंट अक्सर युवा खिलाड़ियों का लम्बी अवधि का ट्रैक बनाकर चलते हैं ताकि वे जल्‍दी बर्न-आउट या इंजुरी की समस्या से बचें। तेज-तर्रार खिलाड़ी को चरणबद्ध क्रिकेट खेलने, ट्रेनिंग और रिकवरी का संतुलित कार्यक्रम चाहिए — यही कारण है कि बोर्ड तुरंत अंतरराष्ट्रीय लैंगोट देने से पहले सावधानी बरतता है।

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चौथा पहलू है शैक्षणिक और पारिवारिक प्रतिबद्धताएँ। 14-15 साल की उम्र में अधिकांश खिलाड़ी पढ़ाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ होते हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की मांग वाले लंबे दौरे न केवल खेल-रूटीन बदलते हैं बल्कि पढ़ाई और सामाजिक-सहायता पर भी असर डालते हैं। इसलिए परिवार और संरक्षक मिलकर समय का उचित आकलन करना चाहेंगे।

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अंत में नीतिगत और प्रशासनिक कारण भी काम करते हैं — चयन नीतियाँ, अनुबंध, आयु-सम्बन्धी प्रमाण-पत्र और उम्र-सम्बन्धी पॉलिसियाँ (जहाँ लागू) चयन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। बोर्ड को किसी भी तरह के कानूनी या प्रशासनिक विवाद से बचते हुए फैसले लेने होते हैं।

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निष्कर्षतः वैभव सूर्यवंशी की 175 रन की पारी ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रतिभा अविश्वसनीय है। मगर BCCI और चयनकर्ताओं की भूमिका केवल तत्काल सनसनी मचना नहीं, बल्कि खिलाड़ी के दीर्घकालिक उत्थान और देश के लिए स्थायी उपलब्धि सुनिश्चित करना भी है। वैभव को अब घरेलू मंचों पर और ‘A’ टीम स्तर पर मजबूत प्रदर्शन करके अपने आप को साबित करना होगा — तब राष्ट्रीय टीम में डेब्यू का रास्ता और पक्का होगा।

फैसले की आख़िरी जिम्मेदारी चयनकर्ता और टीम मैनेजमेंट की होगी, पर एक बात निश्चित है: यदि वैभव उसी तरह खाते रहेंगे, तो उनका नाम भविष्य में बड़े मंच पर सुनने को मिलेगा।

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