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बाबा महतो साहब — इतिहास, मेला और आधुनिक महत्व

बाबा महतो साहब के जीवन, आध्यात्मिक साधना, सामाजिक समरसता और प्रणावाँ धाम की ऐतिहासिक परंपरा को दिखाने के लिए एक प्रभावशाली डॉक्यूमेंट्री बननी चाहिए।

बाबा महतो साहबभारत की आध्यात्मिक परंपरा में ऐसे अनेक संत हुए हैं जिनका जीवन केवल साधना तक सीमित नहीं रहा—वे समाज के नैतिक, सांस्कृतिक और एकता-संदेश के वाहक बने। बिहार की धरती पर उपजी लोकश्रद्धा में बाबा महतो साहेब का नाम उसी कड़ी का एक महत्वपूर्ण अंग है। नालंदा जिले के सरमेरा प्रखंड में स्थित प्रणावाँ धाम उनकी साधना-भूमि तथा समाधि स्थल मानी जाती है। लोककथाएँ, मौखिक परंपराएँ और आधुनिक सरकारी अभिलेख—इन सबका मिश्रण ही आज हमारे पास उपलब्ध ज़मीनी जानकारी है।

जीवन का सार और आध्यात्मिक संदेश

लोकश्रुति के अनुसार बाबा महतो साहब (Baba Mahto Sahab) का जन्म सिंध प्रदेश में हुआ। बचपन से आध्यात्मिक झुकाव, गहन साधना और लोकसेवा की प्रवृत्ति प्रबल थी। उनकी प्रमुख शिक्षाएँ—“मानवता सर्वोपरि”, “सेवा ही साधना”, और “सत्य के प्रति निर्भयता”—आज भी उनकी अनुयायी परम्परा में प्रतिध्वनित होती हैं। वे कर्मकांड-निर्वाह से ऊपर उठकर सरल जीवन, सामाजिक मेल-मिलाप और मध्यस्थता के कार्यों के लिए जाने जाते रहे।

लोककथाओं में उनकी सूफी संतों से मित्रता, विशेष रूप से बाबा मखदूम साहब के साथ, हिन्दू-मुस्लिम समरसता का प्रतीक मानी जाती है। यह मित्रता स्थानीय समुदायों के बीच सांस्कृतिक संवाद की लंबी परंपरा को दर्शाती है।

प्रणावाँ धाम: साधना-स्थल से सामुदायिक केन्द्र तक
प्रणावाँ धाम – मंदिर

प्रणावाँ धाम: साधना-स्थल से सामुदायिक केन्द्र तक

जब बाबा महतो साहब बिहार पहुँचे और प्रणव नामक कुटिया बनायी, वही धीरे-धीरे प्रणावाँ धाम बना। यह स्थल न केवल धार्मिक श्रद्धा का केंद्र बना बल्कि आसपास के सामाजिक-आर्थिक जीवन का केंद्र भी बन गया—त्योहार, मेल-जोल, दान-भिक्षा और सामुदायिक विवाद-समाधान का केन्द्र।

प्रणावाँ धाम की भौतिक संरचना (समाधि-स्थान, आश्रमाकार भवन और खुले प्रांगण) ने समय के साथ मेलों और सामुदायिक आयोजन के लिए अनुकूल स्थान प्रदान किया। धानुक समुदाय सहित आस-पास के गांवों ने इस धाम को लोक-देवता और एकता-प्रतीक के रूप में स्वीकार किया।

प्रणावाँ धाम
बाबा महतो साहब – प्रणावाँ धाम  मेला

मेला-परंपरा: छह सौ वर्ष का सांस्कृतिक आग्रह

स्थानीय स्मृति के अनुसार प्रणावाँ धाम में आयोजित मेला लगभग छह सौ वर्षों से चला आ रहा है। कहा जाता है कि 13-14वीं शताब्दी में बाबा महतो साहब ने प्रणावाँ धाम में जीवंत समाधि ले ली। आज भी वहीं उनकी समाधि पर मंदिर बना हुआ है और भक्त श्रद्धा से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

प्रत्येक द्विवार्षिक राजकीय मेला महोत्सव प्रणावाँ धाम में आयोजित होता है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मेलों का समय सामान्यतः वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर निर्धारित रहा है—यह वह समय है जब कृषि-चक्र के आरम्भ के साथ-साथ ग्रामीण समुदाय सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों में सम्मिलित होते हैं।

मेला केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी आवश्यक था: मेले में तिलक-थाना, चन्द्रा-व्यापार, हस्तशिल्प प्रदर्शन और कुश्ती जैसे पारंपरिक खेल स्थानीय शिल्प व कौशल का प्रदर्शन बनते। तब से अब तक यह परंपरा बनी रही और समय-समय पर समुदाय तथा स्थानीय नेतृत्व के योगदान से उसका स्वरूप बदलता भी रहा।

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2016 का मेला: राजनीतिक उपस्थिति और सामुदायिक पहचान

वर्ष 2016 के मेले का उल्लेख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उस वर्ष मेले में राजनीतिक-सामाजिक हस्तियों की बढ़ी हुई उपस्थिति ने इस आयोजन को और अधिक सार्वजनिक और राजनीतिक रूप दे दिया। उस वर्ष भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अनेक नेताओं ने मेले में भाग लिया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि स्थानीय-क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक-धार्मिक परंपराएँ राजनीतिक दृष्टि से भी महत्त्व की विषयवस्तु बन रही थीं।

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(यहाँ संकेतनीय है कि राजनीतिक दलों की उपस्थिति का अर्थ यह नहीं कि मेला केवल राजनीतिक हुआ; बल्कि यह समाज-राजनीति के जटिल परतों में मेल की भूमिका को परिलक्षित करता है—स्थानीय नेताओं के लिए यह एक ऐसा मंच भी बन गया जहाँ वे जनसमूह से संपर्क स्थापित करते हैं।)`

माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रणावाँ धाम में आयोजित मेले में भाग
माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रणावाँ धाम में आयोजित मेले में भाग लिया था.

30 अप्रैल 2018: मुख्यमंत्री की उपस्थिति और प्रभाव

30 अप्रैल 2018 को बिहार के माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रणावाँ धाम में आयोजित मेले में भाग लेकर इसे व्यापक सार्वजनिक मान्यता दी। उनके साथ उस अवसर पर राज्य के अनेक मंत्री और नुमाइंदे उपस्थित थे, जिनमें विशेष उल्लेखनीय है मंत्री श्रवण कुमार की भागीदारी। मुख्यमंत्रि की उपस्थिति से मेले को मीडिया और सार्वजनिक ध्यान मिला और यह मेला न केवल धार्मिक परंपरा बल्कि सांस्कृतिक-राजनीतिक परिदृश्य का भी हिस्सा बन गया।

मुख्यमंत्री-लेवल की भागीदारी से यह संदेश गया कि स्थानीय-पारंपरिक आयोजन अब राज्य-स्तरीय सांस्कृतिक संपत्ति के रूप में देखे जा रहे हैं—और इनके संरक्षण तथा विकास हेतु सरकारी सहयोग आवश्यक माना जाने लगा।

प्रणावाँ धाम के मेले को राजकीय मेला का दर्जा मिला
बिहार सरकार द्वारा जारी अधिसूचना जिसमें प्रणावाँ धाम के बाबा महतो साहेब मेले को मान्यता दी गई है।

राजकीय मेला दर्जा (06/06/2018) — औपचारिक मान्यता और परिणाम

मुख्यमंत्री की उपस्थिति और स्थानीय समुदाय की सक्रियता के बाद बिहार सरकार ने 6 जून 2018 को प्रणावाँ धाम के मेले को राजकीय मेला का दर्जा प्रदान कर दिया। यह निर्णायक कदम कई मायनों में महत्वपूर्ण था:

  1. सरकारी सहायता: राजकीय मेला घोषित होने पर आयोजन के लिए आर्थिक सहायता, पुलिस-प्रबंध, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए बजटीय प्रावधान सहज बनते हैं।
  2. सुरक्षा-व्यवस्था: बड़ी भीड़ के प्रबंधन हेतु पुलिस व आपदा प्रबंधन टीमों की तैनाती का औपचारिक प्रावधान होता है।
  3. पर्यटन विकास: राजकीय दर्जा मिलने पर मेले को पर्यटन-सर्किट में शामिल करने की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
  4. स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: मेले में आने वाले श्रद्धालु व पर्यटक स्थानीय दुकानदारों, खान-पान और परिवहन सेवाओं को आर्थिक रूप से सुदृढ़ करते हैं।
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राजकीय दर्जा प्राप्ति के बाद मेले के ऑडिटोरियम एवं धाम के सौंदर्यीकरण के लिए करीब पौने तीन करोड़ रुपये के व्यय की योजना लागू की गयी, जिसके अंतर्गत मेला-प्रांगण का विकास, शौचालय व पेयजल-व्यवस्था, मंच-स्थापना तथा प्रकाश एवं मार्ग-निवेशन शामिल थे। इस निवेश से मेला का स्वरूप आधुनिक सुविधाओं के अनुरूप आकार लेने लगा, जबकि पारंपरिक भाव और शैली को संरक्षित करने का विशेष ध्यान रखा गया।

प्रणावाँ धाम के मेले और उसके विकास का विषय बिहार विधानसभा में भी उठा
बिहार विधानसभा में बाबा महतो साहेब मेले से संबंधित पूछे गए प्रश्न का दस्तावेज़।

विधानसभा में उठे प्रश्न: संवेदीकरण और उत्तरदायित्व

प्रणावाँ धाम के मेले और उसके विकास का विषय बिहार विधानसभा में भी उठा। प्रश्न संख्या 679 के रूप में अस्थावां विधानसभा के विधायक जितेंद्र कुमार ने सरकार से पूछा कि:

  • क्या मेले को राजकीय दर्जा दिया गया है?
  • राजकीय दर्जा मिल जाने के बाद भी क्या मेले के आयोजन के लिए पर्याप्त सरकारी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं?
  • यदि सुविधाएँ अपर्याप्त हैं, तो सरकार क्या कदम उठाएगी?

यह प्रश्न लोक-प्रतिनिधित्व और स्थानीय आवश्यकताओं को लेकर सरकार की जवाबदेही का प्रतीक है। विधानसभा में उठे ऐसे प्रश्न यह सुनिश्चित करते हैं कि धर्म-सांस्कृतिक कार्यालयों की घोषणा मात्र दिखावटी न रहे, बल्कि वास्तविक धरातल पर सुविधाएँ और विकास परियोजनाएँ लागू हों।

सरकारी अभिलेखों और अधिसूचनाओं को संदर्भित करते हुए (स्थानीय प्रशासनिक परिपत्र, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की अधिसूचना) यह स्पष्ट किया गया कि मेले को मान्यता दिलाने के साथ-साथ उसके सुचारु आयोजन हेतु आवश्यक कदम उठाए जाएँ—परन्तु विधायक के प्रश्न ने यह भी उजागर किया कि घोषणा और जमीन पर संसाधन उपलब्ध कराना दोनों अलग-अलग कार्य होते हैं और दोनों का संतुलन आवश्यक है।

बाबा महतो साहेब
बाबा महतो साहेब – प्रणावाँ धाम

सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव और समकालीन प्रासंगिकता

प्रणावाँ धाम का मेला आज भी एक ऐसा मंच है जहाँ समाज के अलग-अलग तबके—किसान, मजदूर, शिल्पकार, युवा और वृद्ध—एक समान रूप से इकठ्ठा होते हैं। यहाँ न सिर्फ पूजा-अनुष्ठान होते हैं बल्कि गांवों के परस्पर संवाद, विवाह-सम्बंधित परंपराएँ, और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान भी होते हैं।

बाबा महतो साहेब की शिक्षाओं—मानवता, सेवा और सहिष्णुता—का आधुनिक संदर्भ में अर्थ यह है कि इस प्रकार के मेलों को शांति-मेल के तौर पर विकसित किया जाए: जहाँ सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिले, सामाजिक तनावों की मध्यस्थता हो और युवाओं को अपनी लोक-परंपराओं से जोड़ने का अवसर मिले।

राजकीय दर्जा और यात्री-सुविधाओं के बाद बाहरी आगंतुकों की संख्या बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी सुदृढ़ता आई—स्थानीय दुकानदार, हस्तशिल्पकार और खान-पान व्यवसायी मेले से लाभान्वित हुए।

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बाबा महतो साहेब
बाबा महतो साहब – समाधि स्थल

समाज में आस्था

बाबा महतो साहेब को विशेष रूप से धानुक समाज के 108 गाँवों में अत्यंत श्रद्धा और आस्था के साथ पूजा जाता है।
भक्तों का विश्वास है कि बाबा आज भी अपने समाधि स्थल से  कृपा और आशीर्वाद देते हैं।

बाबा महतो साहब का जीवन हमें सिखाता है कि
धर्म का मूल उद्देश्य मानवता, प्रेम और भाईचारा है।

चुनौतियाँ और सुझाव

हालाँकि राजकीय दर्जा मिलने और विकास-निवेश होने के बाद भी कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं:

  1. दस्तावेज़ीकरण का अभाव: संत के जीवन और मेला-परंपरा के ऐतिहासिक अभिलेख सीमित हैं; मौखिक परंपरा पर निर्भरता अध्ययन को कठिन बनाती है।
  2. सतत विकास: मेले के दौरान होने वाले ठहराव, कचरा प्रबंधन और यातायात की समस्याएँ बरकरार रहती हैं—इनके लिये सतत नीतियाँ आवश्यक हैं।
  3. सांस्कृतिक संरक्षण बनाम आधुनिकरण: आधुनिक सुविधाएँ जोड़ते समय पारंपरिक स्वरूप और लोकसंस्कृति का संरक्षण आवश्यक है।

सुझाव:

  • स्थानीय बुजुर्गों और पुजारी-समिति से मौखिक इतिहास का दस्तावेजीकरण किया जाए।
  • बाबा महतो साहेब के जीवन और उनकी महान शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाई जानी चाहिए। इससे लोग उनके इतिहास, आध्यात्मिक साधना, सामाजिक योगदान और हिन्दू–मुस्लिम एकता के संदेश को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे। डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से नई पीढ़ी को भी बाबा महतो साहेब के बारे में जानने का अवसर मिलेगा। साथ ही प्रणावाँ धाम की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता भी देश-दुनिया के सामने आएगी।

  • मेले के लिए पर्यावरणीय प्रबंधन (कचरा, जल, शौचालय) हेतु दीर्घकालिक अनुबंध और बजटीकरण सुनिश्चित किया जाए।
  • पर्यटन-सर्किट में प्रणावाँ धाम को शामिल कर, स्थानीय हस्तशिल्प और सांस्कृतिक कार्यशालाओं को प्रोत्साहन दें।
  • मेले की सुरक्षा और आपातकालीन सेवाएँ राज्य-प्रशासन, स्थानीय पुलिस व वालंटियर समन्वय से सुनिश्चित हों।

बाबा महतो साहेब की विरासत सिर्फ एक धार्मिक स्मारक नहीं है—यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ है जो पीढ़ियों से रहकर आज राज्य-स्तरीय मान्यता प्राप्त कर चुका है। प्रणावाँ धाम में लगने वाला मेला—छह सौ वर्षों के इतिहास के साथ—आज आधुनिक बिहार के सांस्कृतिक नक्शे पर अपनी पहचान बना चुका है।

राजकीय दर्जा, मुख्यमंत्री की आधिकारिक उपस्थिति और विधानसभा में उठे प्रश्न यह संकेत करते हैं कि पारंपरिक-स्थानों को संरक्षित करना केवल आस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर, स्थानीय विकास और सामाजिक एकता का भी प्रश्न है। अगर हम संत की शिक्षा—मानवता, सेवा और सहिष्णुता—को व्यवहारिक रूप से अपनाएँ, तो ऐसे मेलों की महत्ता और भी बढ़ जाएगी।

जय बाबा महतो साहब।
“मानवता, सेवा और भाईचारा ही सच्चा धर्म है।”

N Mandal

Naresh Kumar Mandal, popularly known as N. Mandal, is the founder and editor of Gaam Ghar News. He writes on diverse subjects including entertainment, politics, business, and sports, with a deep interest in the intersection of cinema, politics, and public life. Before founding Gaam Ghar News, he worked with several leading newspapers in Bihar.

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