
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर धर्म, सत्ता और बयानबाज़ी के चौराहे पर खड़ी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिए गए एक बयान में रामायण के पात्र कालनेमि का संदर्भ आने के बाद प्रदेश में सियासी घमासान तेज़ हो गया है। इस बयान पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया आई है ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ओर से, जिन्होंने मुख्यमंत्री के राजनीतिक आचरण और प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
कालनेमि कौन था?
हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कालनेमि रामायण का एक मायावी राक्षस था और रावण का भाई था। उसका काम था हनुमान को भ्रमित करना। वह साधु का वेश धरकर हनुमान को रोकने की कोशिश करता है, लेकिन अंततः हनुमान उसकी सच्चाई पहचान लेते हैं।
राजनीति में कालनेमि का उल्लेख अक्सर पाखंड, छल और भ्रम के प्रतीक के रूप में किया जाता है।
मुख्यमंत्री के बयान पर शंकराचार्य का तीखा हमला
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मुख्यमंत्री योगी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:
“एक मुख्यमंत्री शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और प्रदेश की खुशहाली की बात नहीं करता, बल्कि कालनेमि और धर्म-अधर्म पर बोलता है। यह कहाँ तक उचित है?”
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मुख्यमंत्री को राज्य के विकास और जनता की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि धार्मिक विमर्श में उलझकर राजनीति करनी चाहिए।
उनका कहना था कि:
“धर्म-अधर्म की व्याख्या धर्माचार्यों का काम है, सत्ता में बैठे नेताओं का नहीं।”
सरकार समर्थक संतों की प्रतिक्रिया
हालाँकि राज्य सरकार समर्थक संत रामभद्राचार्य ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के रुख से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि:
“गंगा तक रथ से नहीं जाया जाता, यह नियम है। पुलिस ने रोका तो वह सही था। शंकराचार्य के साथ अन्याय नहीं हुआ।”
इस बयान से साफ हो गया कि संत समाज भी इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बँट गया है।
तीन शंकराचार्यों का समर्थन
द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में कहा:
“तीन शंकराचार्य उनके साथ हैं और प्रशासन द्वारा उनसे प्रमाण माँगना ग़लत है।”
यानी यह मामला अब सिर्फ राजनीति नहीं रहा, बल्कि सनातन परंपरा और धार्मिक अधिकारों से जुड़ा हुआ विवाद बन गया है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद: एक परिचय
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। उनका मूल नाम उमाशंकर पांडेय था।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ में प्राप्त की और आगे की पढ़ाई गुजरात में की। वर्ष 2003 में उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा मिली और वे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बने।
वे जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के प्रमुख शिष्य थे।
ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य कैसे बने?
11 सितंबर 2022 को गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद ने ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड) के शंकराचार्य का कार्यभार संभाला।
हालाँकि, इस पर विवाद हुआ।
15 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने उनके पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी।
याचिका में आरोप लगाया गया कि उन्होंने स्वयं को उत्तराधिकारी घोषित कर अदालत की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की।
उनके समर्थकों का कहना है कि:
“रोक सिर्फ औपचारिक पट्टाभिषेक पर है, न कि शंकराचार्य के रूप में कार्य करने पर।”
अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी के नेता) का बयान:
“अगर कोई अधिकारी शंकराचार्य से उनका प्रमाण पत्र मांगता है तो सनातन धर्म का इससे बड़ा अपमान और कुछ नहीं हो सकता… हम साधुओं और संतों का अपमान करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ खड़े होंगे, चाहे वह सरकार हो या कोई व्यक्ति।”
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का बयान:
“एक राजनेता जो मुख्यमंत्री है, वह शिक्षा की बात नहीं करता, स्वास्थ्य की बात नहीं करता, लॉ एंड ऑर्डर की बात नहीं करता, प्रदेश की खुशहाली की बात नहीं करता, वो कालनेमि और धर्म-अधर्म के बारे में बात करता है। यह कहाँ तक उचित है? मुख्यमंत्री को अपने प्रदेश की खुशहाली के बारे में चर्चा करना चाहिए, धर्म-अधर्म की बात धर्माचार्यों पर छोड़ना चाहिए।”
राजनीतिक सक्रियता और आंदोलन
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सिर्फ धार्मिक नेता नहीं रहे, बल्कि वे छात्र राजनीति से लेकर जन आंदोलनों तक सक्रिय रहे हैं।
- 1994 में सम्पूर्णानंद विश्वविद्यालय में ABVP से छात्रसंघ चुनाव लड़ा
- गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कराने के लिए 2008 में उपवास
- ज्ञानवापी और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मंदिर तोड़े जाने का विरोध
- केदारनाथ मंदिर से 228 किलो सोना गायब होने का आरोप
- अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा का बहिष्कार
उन्होंने कई बार सरकारों से टकराव मोल लिया है।
राहुल गांधी से रिश्ता: समर्थन से बहिष्कार तक
जून 2024 में उन्होंने राहुल गांधी के बचाव में कहा था कि:
“हिंदू धर्म हिंसा का समर्थन नहीं करता।”
लेकिन एक साल बाद उन्होंने राहुल गांधी को हिंदू धर्म से बहिष्कृत करने की घोषणा कर दी।
आरोप था कि राहुल गांधी ने मनुस्मृति का अपमान किया।
यह बदलाव दिखाता है कि अविमुक्तेश्वरानंद का रुख हमेशा सत्ता या विपक्ष के पक्ष में नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक व्याख्या पर आधारित रहता है।
राजनीति बनाम धर्म: असली टकराव
यह पूरा विवाद एक मूल प्रश्न खड़ा करता है:
क्या सत्ता में बैठे नेता धर्म का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए कर सकते हैं?
और क्या धर्माचार्य सत्ता को नैतिकता का पाठ पढ़ा सकते हैं?
योगी बनाम शंकराचार्य की यह टकराहट दरअसल राजनीतिक धर्म बनाम आध्यात्मिक धर्म की लड़ाई है।
कालनेमि का नाम भले ही रामायण से आया हो, लेकिन उसका सियासी उपयोग आज की राजनीति में एक नए संघर्ष को जन्म दे चुका है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद बनाम मुख्यमंत्री योगी की बहस यह साफ करती है कि भारत में धर्म, राजनीति और सत्ता अब एक-दूसरे से अलग नहीं रहे।
अब सवाल यह है कि:
- क्या सरकार जनता की समस्याओं पर लौटेगी?
- या धर्म और प्रतीकों की राजनीति ही भविष्य की दिशा तय करेगी?
आने वाले चुनावी दौर में यह बहस और तेज़ होने वाली है।




