समस्तीपुर : जिले में हाल के दिनों में पाला गिरने और वातावरण में अत्यधिक नमी बढ़ने से आलू की फसल पर झुलसा रोग (ब्लाइट रोग) का खतरा तेजी से बढ़ गया है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यह रोग आलू की फसल के लिए सबसे अधिक नुकसानदायक माना जाता है और यदि समय रहते इसका प्रबंधन नहीं किया गया तो किसानों को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ सकती है।
कृषि विज्ञान केंद्र बिरौली के प्रधान सह वरीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. आर. के. तिवारी ने बताया कि आलू की फसल झुलसा रोग के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती है। यह रोग सामान्यतः दिसंबर और जनवरी के पहले सप्ताह में अधिक सक्रिय होता है, खासकर तब जब वातावरण में नमी अधिक हो, बादल छाए रहें और तापमान में गिरावट हो। वर्तमान मौसम परिस्थितियाँ इस रोग के फैलाव के लिए अत्यंत अनुकूल बन चुकी हैं।
डॉ. तिवारी ने कहा कि झुलसा रोग से बचाव के लिए रोग लगने से पहले और रोग लगते ही किया गया प्रबंधन ही सबसे कारगर उपाय है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे खेतों में जल निकासी की समुचित व्यवस्था बनाए रखें, क्योंकि खेत में पानी जमा रहने से फफूंद जनित रोग तेजी से पनपते हैं। इसके साथ ही नाइट्रोजन उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग न करें, क्योंकि इससे पौधों की पत्तियां कोमल हो जाती हैं और रोग के प्रति अधिक संवेदनशील बनती हैं।
उन्होंने बताया कि जैसे ही वातावरण में नमी बढ़े या बादल छाने लगें, किसानों को निवारक छिड़काव करना चाहिए। इसके लिए मैंकोजेब या क्लोरोथैलोनिल दवा का 0.2 प्रतिशत घोल यानी 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव किया जाए, जिससे फफूंद के बीजाणु पनप न सकें।
यदि खेत में झुलसा रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देने लगें, जैसे पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे पड़ना और किनारों का सूखना, तो तुरंत निवारक दवाओं को रोककर अंतः प्रवाही (Systemic) कवकनाशियों का प्रयोग करना चाहिए। इसके लिए मेटालैक्सिल एवं मैंकोजेब या साइमोक्सानिल एवं मैंकोजेब का 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव अत्यंत प्रभावी होता है। गंभीर संक्रमण की स्थिति में फेनोमेडोन एवं मैंकोजेब का प्रयोग किया जाना चाहिए।
डॉ. तिवारी ने यह भी कहा कि छिड़काव करते समय यह सुनिश्चित करें कि दवा का घोल पत्तियों के निचले हिस्सों तक भी पहुँचे, क्योंकि रोग का प्रकोप अक्सर वहीं से शुरू होता है। साथ ही हल्की-हल्की सिंचाई अंतराल पर करते रहें और खेतों का प्रतिदिन निरीक्षण अवश्य करें।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से अपील की है कि वे आलू की फसल की नियमित निगरानी करें और किसी भी तरह के लक्षण दिखने पर तुरंत कृषि विशेषज्ञों से संपर्क करें, ताकि समय रहते उचित प्रबंधन कर फसल को बचाया जा सके और नुकसान से बचा जा सके।



