
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज आधिकारिक रूप से नए कार्यालय परिसर का उद्घाटन कर रहे हैं — वही परिसर जिसे अब सेवा तीर्थ नाम दिया गया है। इस बड़े फैसले के साथ प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और कई उच्च स्तरीय सचिवालयों का स्थान ऐतिहासिक साउथ ब्लॉक से नए, आधुनिक और एकीकृत परिसर में शिफ्ट हो गया है। यह कदम प्रशासनिक कार्यप्रणाली को केंद्रीकृत करने और डिजिटल-पहचान वाले, भविष्य-तैयार कार्यालय माहौल के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सेवा तीर्थ तीन मुख्य इमारतों और साथ-साथ बने कर्तव्य भवनों का एक समुच्चय है। इस परिसर में अब प्रधानमंत्री कार्यालय — Prime Minister’s Office — के साथ-साथ National Security Council Secretariat और Cabinet Secretariat भी एक ही छत के नीचे काम करेंगे। इसके अलावा, पास में बने Kartavya Bhavan-1 और-2 भवनों में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों के कार्यालय स्थानांतरित किए गए हैं। इस समेकन से नीति निर्माण और कार्यान्वयन में सामंजस्य व गति बढ़ाने की उम्मीद जताई जा रही है।
भवनों की डिज़ाइन और तकनीकी खूबियाँ भी उल्लेखनीय हैं। रिपोर्टों के अनुसार सेवा तीर्थ परियोजना लगभग 2.26 लाख वर्ग फुट में फैली हुई है और अनुमानित लागत करीब ₹1,189-1,200 करोड़ के आसपास बताई जा रही है। नव निर्मित परिसर में हाई-स्पीड कनेक्टिविटी, पेपरलेस वर्कफ्लो के लिए डिजिटल आर्काइव, अत्याधुनिक कॉन्फ्रेंस और कंट्रोल रूम, तथा स्मार्ट एक्सेस-कंट्रोल सिस्टम लगाए गए हैं। साथ ही ऊर्जा दक्षता, जल संरक्षण और अपशिष्ट प्रबंधन के आधुनिक उपाय भी शामिल किए गए हैं ताकि यह परिसर ग्रीन बिल्डिंग मानकों के अनुरूप रहे।
ऐतिहासिक दृष्टि से यह शिफ्ट भी खास मायने रखता है। साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसे प्रतीकात्मक कार्यालय दशकों से भारत की शासन व्यवस्था के केंद्र रहे हैं। आज साउथ ब्लॉक में प्रधानमंत्री की आख़िरी कैबिनेट बैठक बुलाई गई है, जिसके बाद इन ब्रिटिश-कालीन इमारतों को सार्वजनिक उपयोग और संग्रहालय में परिवर्तित करने की योजनाओं पर काम आगे बढ़ेगा। सरकार ने इन ऐतिहासिक ब्लॉकों के रखरखाव और पुनर्प्रयोजन के जरिए उन्हें जनता के लिये खोलने की व्यवस्था करने की घोषणा की है।
यह कदम प्रतीकात्मक रूप से भी बड़ा है — 13 फरवरी जैसी तिथि का चुनाव ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ा हुआ बतलाया जा रहा है, क्योंकि इसी दिन 1931 में नई दिल्ली को औपनिवेशिक राजधानी घोषित किए जाने का इतिहास जुड़ा हुआ है। अधिकारियों का कहना है कि इस शिफ्ट के साथ एक तरह से प्रशासनिक-विरासत के कुछ पहलुओं को आधुनिक आकांक्षाओं से जोड़ा जा रहा है।
नागरिकों और नौकरशाही के लिये इसके तात्कालिक फायदे स्पष्ट हैं — अलग-अलग हिस्सों में फैले महत्वपूर्ण कार्यकारी कार्यालय अब एक केंद्रीकृत हब से समन्वित रूप से काम करेंगे, जिससे बैठकों का समय, सूचना के आदान-प्रदान और सिंगल-विंडो संपर्क में आसानी आएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भूगोलिक समेकन निर्णय-निर्माण प्रक्रिया को तेज कर सकता है, परन्तु साथ ही सुरक्षा, सार्वजनिक पहुंच और पारदर्शिता जैसे आयामों पर भी सतत निगरानी आवश्यक रहेगी।
दूसरी ओर, साउथ-नॉर्थ ब्लॉक जैसे ऐतिहासिक भवनों का नए रोल में रूपांतरण भी संवेदनशील परियोजना होगी — संग्रहालयिकरण, सार्वजनिक प्रदर्शनी और खुला-आम उपयोग सुनिश्चित करने के लिये रखरखाव, संरक्षण और जनता-सुलभता के मानदण्ड तय करना पड़ेंगे। सरकार ने संकेत दिया है कि इन ब्लॉकों में ‘युगे युगेन भरत’ जैसे संग्रहालय परियोजना की रूपरेखा पर भी काम शुरू किया जा चुका है।
अंततः सेवा तीर्थ का उद्घाटन न केवल कागज़ों में पते का बदलना है, बल्कि यह प्रशासनिक कार्यशैली, डिजिटलीकरण और आधुनिक लोकसेवा-सुविधाओं को बढ़ावा देने का संकेत भी है। जैसे-जैसे नई व्यवस्थाएँ अपने ओपरेशन में समायोजित होंगी, जनता और प्रशासनिक तंत्र दोनों के लिए इसके वास्तविक प्रभाव समय के साथ स्पष्ट होंगे। सबकी निगाहें आज के इस ऐतिहासिक पल पर टिकी हैं, जो भारत के शासकीय इंफ्रास्ट्रक्चर के नए अध्याय की शुरुआत मान लिया जा रहा है।





